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बिखर गया है जीवन सारा...

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बिखर गया है जीवन सारा ऐसा ही कुछ लगता है अब  जन्में कहीं पले -बढे भी वहीं  किसका रास्ता ढूंढ रहे थे  जाने-अनजाने चले आये यहाँ  रोटी, कपडा और मकान तलाशे  जैसे-तैसे बसाया घर अपना  अपने घर को ही भूल गए  सदियों हुए फले -फुले  यहीं शायद बिखर भी जाएं  किसको है मंज़िल का पता आये हैं तो जायेंगे भी फिर  बस बारी-बारी जाना है  बिखर गया है जीवन सारा ऐसा ही कुछ लगता है अब  ऐसा ही कुछ लगता है अब ! ~ फ़िज़ा 

कली का जीवन भुला नहीं ...!

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था कली के रूप में मैं भी  फूल बनने से पहले ही  छू लिया था किसी ने  तोड़ मगर नहीं सका मुझे  सोच मगर थी कली जैसी  सो हुआ नहीं मेरा फूल  फूल बनकर जब आयी मैं  कली का जीवन भुला नहीं  लोग देखें फूल को मगर  फूल को देखा किसी ने नहीं  था कली के रूप में मैं भी  अक्स न देख पाया कोई भी  खुशबु थी बस मुस्कान जैसी  खुशबु मगर ली किसी ने नहीं  था कली के रूप में मैं भी  फूल बनने से पहले ही  छू लिया था किसी ने  तोड़ मगर नहीं सका मुझे ! ~ फ़िज़ा 

आवाज़ बनो !

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मसले ढूंढो तो मिलेंगे हज़ार  कहीं महंगाई है तो कोई बेकार  खाने को है कम बिमारी हज़ार  मसले ढूंढो तो मिलेंगे हज़ार ! कभी सबकुछ हो तब भी कमी है  हरदम तलाश उसकी जो नहीं है  भरपेट भोजन पर शराब में धुत हैं  कभी सबकुछ हो तब भी कमी है ! सबकुछ देखकर भी करना अनदेखा  जानकर भी के अन्याय है चुप रहना  जहाँ चले घूसखोरी से काम चलाना  सबकुछ देखकर भी करना अनदेखा ! कब तक सब देखकर रखेंगे आँखें मूंदे ? जागना आज नहीं तो कल इंसान जो हैं बगावत की लपटें आग की तरह फैलेंगी  कब तक सब देखकर रखेंगे आँखें मूंदें?   बहुत कम हैं जो औरों के लिए सोचते हैं  बहुत ज्यादा लोग चुप रहकर सहते हैं  उनकी आवाज़ बनो न्याय के लिए लड़ो  बहुत कम हैं जो औरों के लिए सोचते हैं ! ~ फ़िज़ा 

दिनचर्या

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सेहर की लहर में थी रवि की लालिमा  सुनहरे बालों में जैसे फूल गुलाब का चहकती पक्षियाँ संगीत का समां बांधे  दूर से जैसे बुलाती हुई रेल की सिट्टियाँ  सुबह की हलचल हर तरह की जल्दी  ऐसे में एक गरम -गरम प्याली चाय की  नाश्ते के दो अंडे फिर गड़बड़ी में भागे गाड़ियों की टोली उनमें हरी-लाल बत्ती  जो पहुंचाए हर किसी को उनकी मंज़िल  शुरू होती है सेहर से और ख़त्म शाम पर  दिन-रात की ये पहेली चले यहाँ से वहां तक ! ~ फ़िज़ा

ज़मीन और बादलों का मिलन देखो

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ख्वाबों की कश्ती पर सवार  लहराते गोते खाते हुए पतवार  थिरकते उड़ते हवा से बातें करते  किसी हलके से रुमाल की तरह  समाने लगे पहाड़ों से दरख्त से होकर  उसे कोई न दे सका आसरा हवे पर  ख़ुशी - ख़ुशी लोट गए सब ज़मीं पर  ज़मीन ने कमीं न की उनके सत्कार में  यूँ देखते हो गए एक, हसीं वादियां  ज़मीन और बादलों का मिलन देखो  इंसान-इंसान से न मिल पाए ऐसे  अफ़सोस फ़ज़ा दिखा के नमूना हमें  हमीं न सीख पाए अपनों से मिलनसार ! ~ फ़िज़ा

क्यों न मोहब्बत के रंग में खेलें होली

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अब के सर्दियाँ तो गयीं नहीं  सावन और बसंत का मिलन  कुछ इस तरह रंग लाया है  फूलों को खिलने का तो  बरखा को उसे सँवारने का  जैसे कोई अनहोनी सी सही  मगर इनका मिलन तो होगया  कहीं शुष्क सेहर दिल गुदगुदाए  तो बसंत के फूल बिखेरें खुशबु माहौल तो जैसे बन जाये संयोग  फ़ज़ा भी राज़ी ये दिल भी राज़ी  क्यों न मोहब्बत के रंग में खेलें होली  ~ फ़िज़ा 

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस

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बच्ची हूँ नादाँ भी शायद  तब तक जब तक देखा नहीं  और देखा भी तो क्या देखा  सिर्फ अत्याचार और कुछ नहीं  कभी बात-बात पर टोका-तानी  तो कभी ये कहना लड़की हो तुम  बात-बात पर दायरे में रखना  कहकर बस में नहीं तेरे जानी  तुम लड़की हो तुमसे नहीं होनी  बरसों का ये रिवाज़ यूँही बनी  और हर पीढ़ी ये सोच चुप रही  है रीती यही है निति चुप रहो  लड़की में वाक़ई है कुछ बात  जो वो कुछ भी नहीं कर सकती  वक्त आया है भ्रम तोड़ने का  इतिहास गवाह है पन्ने -पन्ने का  नारी में है जो बात शायद वो सही है  आदमियों से कुछ खास वोही है  जो निडर, कोमल शालीन सही  मौका लेकर दिखलाये रंग नया  तोड़ दो भेद-भाव का ये ज़ंजीर  समाज में चलना कदम बढ़ाये  एक साथ और एक समान  चाहे फिर वो हो नर या नारी ! ~ फ़िज़ा