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काश! कुछ कर पाते...

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  हर तरफ कोरोना का शोर है  हर तरफ वैक्सीन का भी नारा  कोई ये लो कहता तो कोई वो  कोल्हाहल सा मचा है हर तरफ  कोई मास्क पहनता है कोई नहीं  किसी को बहुत आत्मविश्वास है  कोविड नहीं होगा बस घूम रहे हैं  अपना नहीं औरों का ही सोचते  खुद बेहाल औरों का भी ये हाल   हर दिन साथियों के जाने की खबर  कोई कोविड से ग्रस्त हस्पताल में  मुझे मिले वैक्सीन अपराध सा लगे  मगर मैं फिर भी तो नहीं आज़ाद  दोस्तों के बारे में सोचूं तो उनको  वैक्सीन भी नहीं, दवा-दारू भी नहीं  मौत से लड़ते हुए तो किसी अपने को  कांधा दिए आँखों में आंसू ,लाचारी  धैर्य देते-देते अब खुद धैर्य को थामे  के जाओ नहीं छोड़कर साथ हमारा  तुम नहीं तो कैसे देंगे हम हौसला  एक-एक करके सभी छोड़े जा रहे   इस उम्र में जब सोचा मिलेंगे अब के  याद करेंगे स्कूल के मस्ती वाले दिन मगर अब श्रद्धांजलि देते थक गए हम  काश! कुछ कर पाते साथियों के लिए !!!!! ~ फ़िज़ा 

सेहर होने का वादा...!

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शाम जो ढलते हुए ग़म की चादर ओढ़ती है  वहीं सेहर होने का वादा भी वोही करती है  आज ये दिन कई करीबियों को ले डूबा है  दुःख हुआ बहुत गुज़रते वक़्त का एहसास है  दिन अच्छा गुज़रे या बुरा साँझ सब ले जाती है  ख़ुशी-ग़म साथ हों हमेशा ये भी ज़रूरी नहीं है  सेहर क्या लाये कल नया जैसे आज हुआ है  एक पल दुआ तो अगले पल श्रद्धांजलि दी है  इस शाम के ढलते दुःख के एहसास ढलते हैं  राहत को विदा कर 'फ़िज़ा' दिल में संजोती हैं  ~ फ़िज़ा 

क्यों जुड़ जाते हैं हम ...!

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कोरोना के दिन हैं और उस पर आज शुक्रवार की शाम, इरफ़ान खान की फिल्म "क़रीब क़रीब सिंगल" देखी, जो फिल्म पहली बार में हंसी-मज़ाक ले आयी थी वही दोबारा देखने पर हंसी तो ले आयी मगर दो आंसूं भी.. ! इस ग़म को भगाने के लिए दिल बेचारा - सुशांत सींग राजपूत की फिल्म भी देख ली ! अलविदा बहुत ही मुश्किल होता है, मगर लिखना आसान !!!! ये कविता उन सभी के नाम जो अपनों को खोकर अलविदा नहीं कह पाते !!! क्यों जुड़ जाते हैं हम  जाने-अनजाने लोगों से  न कोई रिश्ता न दोस्ती  फिर भी घर कर लेते हैं  दिल में जैसे कोई अपने  ख़ुशी देते हैं जैसे सपने  चंद फिल्में ही देखीं थीं  बस दिल से अपना लिया  कहानी को सच समझ कर  उनके साथ हंस-रो लिया  हकीकत की ज़िन्दगी सब  अलग अपनी-अपनी होती हैं  आज उनकी फिल्मों को देख  उनके अपनों को सोच कर  उनकी ज़िन्दगी के खालीपन  और उनके बीते गुज़रे कल  की यादों में रहकर जीने वाले  सोचकर बहुत रो दिए! ~  फ़िज़ा 

"मैं हूँ भी और नहीं भी "!

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दुबले-पतले सांवले से रूप में  बड़ी-बड़ी आँखों से कहने-सुनने वाले  तन के जैसे भी थे तुम मन के धनी रहे  गहराई में जा बैठे हैं सभी के दिल में  किरदार के अंदर घुसकर रेहा जानेवाले  बहुत कम होते हैं मगर तुम नहीं न रहे  अदाओं से अभिनय से आवाज़ से कातिल  खो दिया संसार ने तुम्हें अब भी नहीं यकीन  अफ़सोस न देख पाएंगे नए किरदार तुम्हारे  नए चोंचले नए सहारे नए करतूतों से हँसते हँसाते  एक दिव्यचरित्र भांति सदियाँ याद रखेंगी  शुन्य स्थान रहगया अभिनय जगत में इरफ़ान  ठीक ही कहा गए आखिर तुम "मैं हूँ भी और नहीं भी "! ~ फ़िज़ा 

मुलाकात अभी बाकी है ....!

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ज़िन्दगी में बहुत दोस्त मिलते हैं  मगर ऐसे बहुत कम मिलते हैं   जो खुद को बहुत छोटा और   दूसरों को बहुत ऊपर देखते हैं   ऐसा महसूस कराने वाले   ज़िन्दगी में कम मिलते हैं   दोस्ती कैसे निभाते हैं कोई   आपसे सीखे जो मीलों दूर   महीनों बिना बतियाये फिर भी   हाल-चाल की खबर रखते   सफर जब घर की तरफ हो   घर ठहराए बिना नहीं भेजते   हमेशा छोटे बच्चों की तरह   हर ख्वाइश पूरी करते रहते   गर अकेला महसूस भी किया   तो परिवारों के बारे में सोचा उनके   जो काम करते थे दफ्तर में आपके   जीवन से हताश न होना और साहस   औरों को देना ज़िन्दगी की यही   परिभाषा अपनायी आपने जाने लोग कितनी भी उम्र लगालें   आप उस मासूम बच्चे की तरह   उत्सुक और नयी तरकीबों को   सोचते रहे और फिल्म बनाते रहे   आज भी सभी को इस कदर छोड़ा   के सब ज़िन्दगी की यादों में   बहक गए ! वाह ! नीरज,   यहाँ भी अपने अंदाज़ में चले चलो कोई नहीं मुलाकात   अभी...

मेरा बचपन खो गया कहीं!

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आज कहीं मेरा बचपन खो गया  एक बहुत बड़ा हिस्सा बचपन का  जिसे संवारने में मामा का प्यार था  शांत किन्तु गंभीर स्वाभाव के थे  मगर दिल के प्यारे और गुनी थे  उनकी दुलारी सबसे प्यारी भांजी  कोई और नहीं मगर मैं थी! जहाँ भी रहे हम पास या दूर  दिल में प्यार की गर्मी नहीं हुई कम  वक़्त मिले जब भी मिलने आये हम  फिर एक ऐसा भी वक़्त आया  अस्वस्थ की खबर ले गया हमें फिर  वहीं उनसे पुराने दिनों की यादों को  संग लिए दिल में मिलने चले थे  खुश था दिल वक़्त बे वक़्त ही सही  नज़रों के सामने थे तो सही मगर  ज़िन्दगी का भी एक ऐसा खेल है  जब सब कुछ अच्छा हो ऐसा लगे  तभी उसकी चाल बेहाल करे ! आज विदाई का दिन है ऐसा  कहा जब मुझ से सवेरे सवेरे  दिल एक पल के लिए हो गया  बोझल, मेरा बचपन खो गया कहीं! अब तो बस रहा गयीं यादें जो  सताएंगी हमेशा मुझे! ~ फ़िज़ा 

मौसम की तरह वो बहार बनके आया

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मौसम की तरह वो बहार बनके आया खिलता हुआ तो कभी फलता हुआ आया जिसे देखता वो उन्हें अपने पास लाता गया  मिलनसार था वो मौसमों की तरह लेहराता गया  फिर ना चाहते एक वो मौसम भी आया  पतझड की तरह वो उसे भी साथ ले गया  दरख्त की तरह तो दरस की तरह यादें छोड़ गया  बैठें हैं उसकी छाँव में आज यादें ही सिर्फ  रेहा गया  ~ फ़िज़ा