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Suraj

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  Dhalte suraj ko dekh, Umeed lagate hain kal ka, Vo phir aayega shaam ke vaste ! Kaun hai vo mera jo, Is umeed ko nibhata hai, Haan, vo aayega phir jayega, Magar thode na mere vaaste ! Uska kaam hai, shayad vajah bhi, Kisi se na rishta na lagaav itna, Masti mein rehta jaisa chaahe chamakta, Phailata gulabi rang jaane ki khushi ke vaaste !  ~ fiza 

सेहर

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 सुबह की सर्द हवाओं से  एक हलकी सी मुस्कान  जैसे सूरज की किरणें  फैलतीं हैं रौशनी ऐसे  लगे गुलाबी सा गाल  एक सादगी और शर्म  दोनों ही साथ रहकर  नज़रों को बेहाल करे  पहली मोहब्बत का  नज़ारा सेहर दिखाए  ~ फ़िज़ा 

सेहर होने का वादा...!

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शाम जो ढलते हुए ग़म की चादर ओढ़ती है  वहीं सेहर होने का वादा भी वोही करती है  आज ये दिन कई करीबियों को ले डूबा है  दुःख हुआ बहुत गुज़रते वक़्त का एहसास है  दिन अच्छा गुज़रे या बुरा साँझ सब ले जाती है  ख़ुशी-ग़म साथ हों हमेशा ये भी ज़रूरी नहीं है  सेहर क्या लाये कल नया जैसे आज हुआ है  एक पल दुआ तो अगले पल श्रद्धांजलि दी है  इस शाम के ढलते दुःख के एहसास ढलते हैं  राहत को विदा कर 'फ़िज़ा' दिल में संजोती हैं  ~ फ़िज़ा 

दिनचर्या

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सेहर की लहर में थी रवि की लालिमा  सुनहरे बालों में जैसे फूल गुलाब का चहकती पक्षियाँ संगीत का समां बांधे  दूर से जैसे बुलाती हुई रेल की सिट्टियाँ  सुबह की हलचल हर तरह की जल्दी  ऐसे में एक गरम -गरम प्याली चाय की  नाश्ते के दो अंडे फिर गड़बड़ी में भागे गाड़ियों की टोली उनमें हरी-लाल बत्ती  जो पहुंचाए हर किसी को उनकी मंज़िल  शुरू होती है सेहर से और ख़त्म शाम पर  दिन-रात की ये पहेली चले यहाँ से वहां तक ! ~ फ़िज़ा

जीवन का नाम है सिर्फ चलना !

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उसके अपने आज़ाद ख्याल थे  फिर भी वो सिमटी हुई दुनिया के  उसूलों पे रहने लगी थी मगर फिर भी  जीने की चाह उसके अंदर दबी थी ! क्या उड़ना इतना मुश्किल है? या ऐसा सोचना भी पाप है?  और ऐसा सोचना कौन तै करता है? क्यों कोई आज़ाद नहीं इस संसार में? जब वो आया नहीं किसी दायरे में? मैं हूँ एक ज़िन्दगी, जीना चाहती हूँ  अपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी ! क्यों कोई रोके या टोके मुझे ? कोशिशें लाख करूँ मैं फिर भी  गर कोई बर्बादी की तरफ ही बढे  तब छोड़ भी देना चाहिए ये ज़िद  रहने दो बिन क्यारियों के सबको  के ज़िन्दगी का नाम है आज़ादी ! ज़िन्दगी है जिंदादिलों की! जियो गर कोई साथ दे या न दे  ज़िन्दगी, तू जीने के लिए ही है आयी  तो जियो ख़ुशी से ! तबाह कर हर उस वहम को उस  रिवाजों को और हर दया को  जो रोके हैं तुझे किसी बांध की तरह  क्योंकि तेरा काम है बेहना और  जीवन का नाम है सिर्फ चलना ! चलते जाना! न रुकने का नाम है  ज़िन्दगी!!!! ~ फ़िज़ा 

शाम की मदमस्त लेहर

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आशाओं से भरी सेहर  निकल पड़ी जैसे लहर  जाना था मुझे शहर-शहर  खुशियों ने रोक ली पहर  निकल पड़ी करने फिर सफर  घुमते-घुमते होगयी फिर सेहर ! शाम की मदमस्त लेहर  हवा की शुष्क संगीत मधुर  लहराता मेरा मन निरंतर  किरणों की जाती नहर  चहचहाट पंछियों के पर  मानो करे कोई इंतज़ार  घर  पर !! ~ फ़िज़ा