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मेरी भाषा हिन्दी !

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  मेरे ख्वाब, मेरी सोच, मेरे बोल, मेरे ख्याल , सभी कुछ जेहन में मेरे , यूँ सजकर संवरकर हैं, वो प्रेम हो या क्रोध, एहसास हो या भावना, कविता हो या गद्य या  हो कहानियाँ दिल में  सभी आते हैं हिंदी में  आत्मविश्वास जगाता  हिन्दी भाषा है वो दाता  मधुर, सरल, सहज है  बोलने, समझने में है  बदलती सबकी काया ! ~ फ़िज़ा  हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं !

कमरों से कमरों का सफर

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सेहर से शाम शाम से सेहर तक  ज़िन्दगी मानों एक बंद कमरे तक  कभी किवाड़ खोलकर झांकने तक  तो कभी शुष्क हवा साँसों में भरने तक  ज़िन्दगी मानों अपनी सीमा के सीमा तक  बहुत त्याग मांगती  रहती हैं जब तक  है क्या इस ज़िन्दगी का लक्ष्य अब तक  इसके मोल भी चुकाएं हो साथ जब तक  ये जीना भी कोई जीना सार्थक कब तक  खिलने की आरज़ू बिखरने का डर कब तक  एहसासों की लड़ियों में उलझा सा मन कब तक  आखिर नियति का ये खेल कोई खेले कब तक? तोड़ बेड़ियों को सीखा स्वतंत्र जीना अब तक  इस नये मोड़ के ज़ंजीरों में जकड कर कब तक  यूँहीं आखिर कमरों से कमरों का सफर कब तक? ~ फ़िज़ा  #हिंदीदिवस #१४सितम्बर१९४९   

ढाई अक्षर प्यार के - भाषा

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मुझे कुछ कहना है तुमसे  कहूं तो कैसे  क्या समझ पाओगे ऐसे  बोली तो नहीं जानते  फिर इशारों से ही जैसे  कहा दिया हाल दिल का  अब हैं एक दूसरे की बाहों में  आये अलग जगहों से  मिले एक किनारे  बोली जो भी हो अपनी  भाषा प्यार की समझे  आज बोल भी लेते हो  क्यूंकि प्यार जो है मुझसे  मुझे कुछ कहना है तुमसे  कहूं तो कैसे  ~ फ़िज़ा  #हिंदीदिवस #१४सितम्बर१९४९ 

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं

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दूर क्षितिज पर निखरा -निखरा  काले-काले अक्षरों जैसा  भैंसों के झुंड को आते देखा  आँखें मल -मल देखूं जैसे  मानो सब जानू मैं ऐसे  किन्तु पढ़ न पाँऊं  ये कैसे   कोस रहा अपने ही किस्मत को  जब दिखा काले अक्षरों में  स्वागत का परचम ! कहता दिवस है हिंदी का आज  लिखो-पढ़ो-कहो कुछ हिंदी में  जब हो अपनी जननी की भाषा  एक दिवस ही क्यों न हो  जिस किनारे भी हो भूमि के  करो याद उन मात्राओं को  उन लफ़्ज़ों को उन अक्षरों को  जिन से कभी मिली मॉफी  तो कभी शाबाशी या फिर  खुशियों की फव्वारों सा  स्नेहपूर्ण आज़ादी जहाँ   निडर बनके केहदी हो  अपने मन की व्यथा-कथा   जय-हिंदी ! ~ फ़िज़ा