तब आयी एक नन्ही कली...
जहां में थी जब मैं अकेली तब आयी एक नन्ही कली सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! बस यकीन था खुद पर चलना,सफर गर ज़िन्दगी सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! तो साथ में हो मेरी सखी छोटी थी मेरी राजदार मगर सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! हर सुख-दुःख में निभानेवाली मेरी नन्ही कली, चंचल मतवाली सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! कभी हम ज़िंदादिली सीखाएं तो कभी वो हमें सीखाएं सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! है तो मेरी ही विस्तार मगर मैं मुड़कर देखूं पीछे सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! अपनी उम्र न कभी गिनी मैंने कब हो गयी ये फूल मेरी कली सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! फिर सोचूं क्यों मैं गिनूँ साल अब तो है मेरी बराबर की सखी सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली ! ~ फ़िज़ा