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Showing posts from 2026

ये केक नहीं

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  लाल मखमली सी परतों में, छुपी कोई मीठी दास्तान है, हर तह में जैसे प्यार सजा, हर कौर में छोटा अरमान है। सफेद क्रीम की नरम चादर, जैसे बादल धरती छू आए, थोड़ी शरारत, थोड़ी मिठास, दिल को बच्चे सा बहलाए। कटते ही खुलते राज कई, परतों में यादें मुस्काती हैं, कुछ मीठे लम्हे, कुछ हँसती बातें, हर टुकड़े में जगमगाती हैं। ये केक नहीं बस स्वाद भर, जश्नों की प्यारी पहचान है, ज़िन्दगी भी शायद ऐसी ही— थोड़ी परतदार, पर मेहरबान है। ~ फ़िज़ा

नन्हा सा माली...

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  नन्हा सा माली बना, मुस्कुराता ये जनाब है, हाथों में गुलाबी पानी, क्या प्यारा इसका ख़्वाब है। गमले की छोटी दुनिया में, हरियाली का इंतज़ाम है, खुद तो है खिलौना मगर, पौधों से बड़ा लगाव है। चेहरे पे मासूमियत, जैसे कोई भोला जवाब है, पानी कम हो या ज़्यादा—बस दिल से पूरा हिसाब है। पत्थरों के बीच भी इसने, हरा सा जहाँ बसाया है, लगता है इस छोटे दिल में, बाग़ों का पूरा किताब है। फ़िज़ा भी देख मुस्काए, ये कैसी मीठी आदत है, इतना छोटा माली फिर भी, बाग़बानी में नवाब है। ~ फ़िज़ा

मैंने अपनी एक दुनिया

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ये सच है, मैंने अपनी एक दुनिया बसा ली है, चाँद सितारों की छाँव में खुद को सजा ली है। जहाँ शोर-ए-जंग से दूर है मेरा ये छोटा सा जहाँ, प्रकृति के घेरे में मैंने अपनी जगह बना ली है। इधर दुनिया जल रही है नफरत की ललकार में, उधर मासूमियाँ खोतीं—ये कैसी अंधी गली है। किसी के पास सब कुछ है, फिर भी खालीपन सा, किसी के पास छत नहीं—बस ज़मीं ही बिछा ली है। कोई कार में रातें काटे, कोई आसमान तले, ये फ़ासलों की सच्चाई दिल में उतर चली है। क्या कहें, किससे कहें, कौन सुनेगा यहाँ, हर आवाज़ जैसे खामोशी में ही ढल चली है। तो मैंने भी अपनी एक खामोश दुनिया चुन ली, चाँद सितारों संग ही अब मेरी ये हमसफ़र बनी है। हम सब ढूँढते फिरते हैं कोई सुरक्षित सा कोना, और खुद के ही अंदर कहीं दुनिया समा ली है। ज़िन्दगी भी अजीब है—एक बुलबुला सा सफ़र, पल में बनती-बिखरती, यही उसकी असली कली है। ~ फ़िज़ा 

वो भी क्या शाम थी..

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  वो भी क्या शाम थी, दिल में अजीब सा गुमान था, मैं भी चल पड़ी थी, वो भी कहीं रवाना था। उस पार मुझसे दूर, पर किसी के पास जा रहा था, फ़ासलों में छुपा जैसे कोई अपना सा अफ़साना था। रूठा-सा, खामोश मगर, कदम बढ़ाता जा रहा था, लब चुप थे उसके, पर दिल में शोर पुराना था। मैं बस खड़ी सोचती रही, उस पल की गिरह में, क्यों जाना है उसे, जब लौट कर फिर आना था। शाम की उस धुंध में, कुछ सवाल रह गए यूँ ही, हर जुदाई में छुपा जैसे मिलने का बहाना था। ~ फ़िज़ा

महिला आरक्षण की लौ

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  संसद की दीवारों में गूँजी एक नई सी बात, बराबरी के शब्दों ने छेड़ी फिर से नई शुरुआत। महिला आरक्षण की लौ जली, उम्मीदों का आसमान, पर इसके साये में चलता रहा राजनीति का भी गान। वोटों की गिनती में भी, सपनों का हिसाब हुआ, कभी समर्थन, कभी विरोध—हर रंग का इज़हार हुआ। कागज़ पर लिखे अधिकार, दिल तक कब पहुँचेंगे, ये सवाल अब भी गलियों में धीमे-धीमे गूंजेंगे। नारी की शक्ति कोई नया अध्याय नहीं, वो तो हर दौर में रही—बस पहचान नई। ये बिल एक दरवाज़ा है, मंज़िल नहीं अभी, सफ़र लंबा है आगे, राहें आसान नहीं। सत्ता के गलियारों में चाहे कितनी भी चालें हों, हर आवाज़ के पीछे सच्चाई की मशालें हों। जब नीयत साफ़ होगी, तब बदलाव सच होगा, वरना हर वादा बस एक और शब्द होगा। फिर भी उम्मीदों की डोर थामे चलती नारी, हर संघर्ष में खुद को फिर से लिखती नारी। कानून से आगे बढ़कर जब सोच बदलेगी, तभी ये आज़ादी सच में हर घर तक पहुँचेगी। ~ फ़िज़ा

ओ चाँद

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  चाँद की ये आधी सी मुस्कान, जैसे कोई अधूरी सी जान। खामोशी में भी कितनी बातें, हर रात मुझे ये समझाए। काली रात की गोद में सिमटा, सफेद सा ये कोमल नूर, दूर होकर भी कितना अपना, जैसे दिल के सबसे पास हुज़ूर। तेरी ये आधी सी झलक ही, मेरे पूरे ख्वाब सजा जाती है, ओ चाँद, तू पूरा हो या आधा, मेरी दुनिया तो तुझसे ही जगमगाती है। तेरे दाग भी मुझे प्यारे हैं, तेरी खामोशी भी गीत लगे, तू बोले ना फिर भी हर पल, मुझसे अपनी प्रीत कहे। मैं भी तेरी तरह अधूरी, तू भी मुझ सा थोड़ा सा, शायद इसी अधूरेपन में ही, हमारा रिश्ता है पूरा सा। ~ फ़िज़ा 

ये मतवाला।

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  माइक हाथ में, अंदाज़ निराला, स्टेज पे आते ही छा गया ये मतवाला। बात शुरू करे तो हंसी रुकती नहीं, सीरियस दिखे, पर बातें होती सीधी नहीं। थोड़ा सोचकर, फिर पंचलाइन गिराते, लोग हंस-हंस कर आंसू तक बहाते। चेहरे पे सादगी, दिमाग में तूफ़ान, हर लाइन में छुपा होता मज़ेदार सामान। ये कोई आम इंसान नहीं जनाब, हंसी का चलता-फिरता इंतज़ाम है ये ख़ास। ~ फ़िज़ा 

गरम-गरम डोसे

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  गरम-गरम डोसे में लिपटी सी कहानी, छोटी-छोटी खुशियों की ये प्यारी निशानी। कुरकुरी सी परत में छुपा सुकून सा एहसास, हर निवाले में जैसे मिल जाए दिल को विश्वास। नारियल की चटनी सी सादगी भरी बात, सांभर की गर्माहट में अपनापन साथ। केले के पत्ते पर सजा ये सादा सा स्वाद, भीड़ भरी दुनिया में जैसे अपना सा संवाद। कुछ पल ठहर कर, बस यूँ ही मुस्कुरा लेना, हर छोटे लम्हे में भी ख़ुशी को पा लेना। ज़िन्दगी भी शायद ऐसी ही थाली है, सादा, रंगीन—और हर स्वाद में निराली है। ~ फ़िज़ा 

ये सुरों का वरदान है..

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  साड़ी की लहरों में सजी, सुरों का इक जहान है, हर थाप में धड़कता दिल, जैसे कोई अरमान है। हाथों की हर चोट में, एक लय का बयान है, ढोल की हर गूंज में, छुपा अपना पहचान है। मुस्कान में घुली हुई, रागों की मुस्कान है, हर सुर में बसता जैसे, जीवन का सम्मान है। ये सिर्फ़ ध्वनि नहीं, ये एक पुराना गान है, पीढ़ियों से बहता आया, ये सुरों का वरदान है। हर ताल में सजा हुआ, त्योहारों का सामान है, इस संगीत की धड़कन में, बसता पूरा जहान है। फ़िज़ा कहे इन सुरों में, उसका भी अरमान है, हर थाप में छुपा हुआ, दिल का एक बयान है। ~ फ़िज़ा 

विषु का उत्सव

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  सुनहरी सी ये डाल, जैसे विषु का पैगाम है, कोन्ना के फूलों में बसता केरल का हर अरमान है। सुबह की पहली किरण संग, जब ये आँगन में सजता है, हर घर के कण-कण में तब, खुशियों का ऐलान है। कणिक्कोन्ना की छांव तले, विषुक्कणि जब सजे सवेरा, हर पीली पंखुड़ी में छुपा, समृद्धि का सम्मान है। मंदिरों से आती धुन में, इन फूलों की महक घुली, हर थाली, हर आरती में, इनका ही गुणगान है। बचपन की यादों में भी, ये रंग यूँ ही बस जाते हैं, माँ के हाथों सजा वो दृश्य, आज भी दिल की जान है। ये फूल नहीं, ये परंपरा है, पीढ़ियों का अभिमान है, विषु के हर उत्सव में, कोन्ना का ही स्थान है। ~ फ़िज़ा

जन्मदिन मुबारक हो

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  मेरी प्यारी रिया, मेरी मुस्कान की वजह, तुम्हारे आने से ही तो रोशन हुई मेरी हर सुबह। तुम्हारी हँसी में बसता है मेरा सारा जहाँ, तुम्हारे हर ख्वाब में छुपा है मेरा अरमान। छोटी-सी उँगली थामे जब तुम चलना सीखी थी, आज वही बेटी मेरी, अपने पंखों से उड़ना सीखी है। हर साल के साथ तुम और भी खिलती जाओ, मेरी दुआ है—तुम्हारी ज़िन्दगी खुशियों से भर जाओ। जन्मदिन मुबारक हो मेरी जान, तुम हमेशा यूँ ही मुस्कुराती रहो—यही है मेरी पहचान। ~ माँ ❤️ ~ फ़िज़ा

ये चाय नहीं, एक रिश्ता है..

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  मिट्टी की कुल्हड़ में सजी, ये चाय नहीं एहसास है, पहली चुस्की में जैसे, घर लौट आने का विश्वास है। हल्की-सी भाप में घुली, माँ की रसोई की खुशबू, हर घूँट में मीठी यादें, और थोड़ी-सी बचपन की धूप। सड़क किनारे, ठंडी शाम, या सुबह की नींदी आँखें, ये कुल्हड़ वाली चाय हमेशा, दिल को अपने पास बुला ले। होठों से लगते ही जैसे, सारी थकान पिघल जाए, एक चुस्की और… फिर एक और, मन यूँ ही मुस्कुराए। मिट्टी की सोंधी महक में, छुपा है अपनापन सारा, ये चाय नहीं, एक रिश्ता है, जो हर बार लगे दोबारा। ~ फ़िज़ा

कप में सजी ये छोटी सी दुनिया

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  कप में सजी ये छोटी सी दुनिया, झाग में जैसे फूल खिला, हल्की-सी खुशबू कॉफी की, मन को चुपके से छू गई भला। संगमरमर की मेज़ पे रखी, ये प्याली कितनी प्यारी है, जैसे सुबह की पहली किरण, या माँ की मीठी फटकार सी न्यारी है। हर घूँट में है सुकून छुपा, जैसे घर की गर्माहट हो, थोड़ी-सी कड़वाहट भी इसमें, पर उसी में मिठास की आहट हो। पास रखी वो खाली कुर्सी, किसी अपने का इंतज़ार करे, या खुद से मिलने का मौका, कुछ पल दिल को उपहार करे। ये कॉफी नहीं, एक एहसास है, थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है, भागती दुनिया के बीचों-बीच, ये पल ही तो असली ठहराव है। ~ फ़िज़ा

हर दिल अपनी कहानी गाए।

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  नीले आसमान की चादर तले, शहर खड़ा है सीना ताने, ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच, नदी बहती अपने तराने। शांत जल में झलकती दुनिया, जैसे कोई सपना ठहर गया, लहरों की धीमी सरगोशी में, हर शोर कहीं बिखर गया। किनारों पर खड़ी ये इमारतें, वक़्त की कहानी कहती हैं, भागती ज़िन्दगी के बीच भी, एक ठहराव सा देती हैं। नावें जैसे ख्वाब तैरते, मंज़िल की ओर बढ़ती जाएँ, और ये पुल—रिश्तों सा कोई, दो किनारों को जोड़ते जाएँ। इस शहर में भी एक सुकून है, भीड़ में भी एक तन्हाई, जहाँ हर चेहरा अनजाना, पर हर नज़र में है गहराई। नीले गगन और हरे जल के बीच, ज़िन्दगी यूँ बहती जाए, शहर की इस चुप सी धड़कन में, हर दिल अपनी कहानी गाए। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, ये कैसा इसका फ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। दिल को हर किसी से जोड़ दे, ऐसी इसकी रवानी है, पास लाकर फिर सिखाती, दूरी ही असली कहानी है। जीना ही नहीं, जीने की चाह में हमें लालची बना देती, आदत पड़ते ही फिर ये, सबसे गहरी सीख सुना देती है। “अपनी राह खुद ही चुनो, औरों से थोड़ा जुदा रहो,” अकेले आए थे तुम यहाँ, अकेले ही मुस्कुरा के बहो। ये जीवन का खेल निराला, सबके अपने-अपने नियम हैं, यहाँ कोई किसी का सहारा नहीं, बस चलते अपने कदम हैं। उम्मीदों का बोझ न रखना, दिल को हल्का ही रहने दो, सुने कोई तो ठीक, न सुने—तो भी ख़ामोश ही रहने दो। न समझाने में उम्र गँवाओ, न किसी को मनाने में, ज़िन्दगी के रंग निराले हैं, बस खुद को पहचानने में। ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं, हर मोड़ नया अफ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। ~ फ़िज़ा 

हमेशा मुस्कुराती रहें।

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(09-08-1933 - 04-11-2026)   गीतों की मल्लिका आज खामोश सी हो गई, सुरों की वो रानी जैसे कहीं खो गई। जो हर दिल को छूती थी, हर एहसास जगाती थी, दुःख-सुख, हँसी-खुशी में, अपनी आवाज़ से सहलाती थी— आज वही धड़कन जैसे थम सी गई। जिसकी तान पर दुनिया झूमती रही बरसों, जिसकी नकल में भी लोग ढूँढते थे सरगमों के किस्सों, कॉमेडी के रंग में भी जिसकी गूँज थी शामिल, वो अनोखी आवाज़ आज हो गई है ख़ामोश, बेहद ग़मगीन। आशा ताई, आपका यूँ चले जाना दिल को चीर गया, बचपन से लेकर आज तक, हर पल आपने ही तो घेर लिया। आपकी आवाज़ ने हमें थामा, सँवारा, सहारा दिया, हर मोड़ पर, हर दौर में, जीने का एक सहारा दिया। आज बस वही आवाज़ है, जो हवाओं में गूँजती रहेगी, अजर-अमर बनकर हर दिल में यूँ ही बसती रहेगी। ये दुनिया है—यहाँ बिछड़ना तो हर किसी की कहानी है, एक-एक कर सबको जाना है, यही जीवन की रवानी है। पर दुआ है दिल से—जहाँ भी हों आप, सुकून में रहें, अपने सुरों की दुनिया में, हमेशा मुस्कुराती रहें। ~ फ़िज़ा 

“गम वॉल”

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  ये तब की बात है, जब आलस भी एक आदत था, मन भर जाने पर च्युइंग गम का यूँ दीवारों से रिश्ता था। दिन ढले तो दीवारें भर जातीं रंग-बिरंगे निशानों से, सुबह होते ही कोई आकर, उन्हें साफ़ करता अरमानों से। ये दिनचर्या चलती रही, लोग यूँ ही दोहराते गए, साफ़ करने वाले थकते रहे, पर हाथ न रुक पाए। धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई, बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई। जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा, लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा। आज भी चाहे शहर वाले इसे फिर से साफ़ कर जाएँ, पर अगले ही दिन ये दीवारें, फिर उसी रंग में रंग जाएँ। “गम वॉल” के नाम से अब ये दुनिया भर में जानी जाए, देखो आलस की ये कहानी, कैसे रंग नए दिखलाए। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी का ऐलान है।

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़ोरदार है, हर साँस का यहाँ क़रार है, जीने के लिए हर पल मेहनत, यही इसका असली सार है। इंसान हो या कोई जीव, सबका एक ही व्यवहार है, हर साँस के पीछे छुपा, खुद की कोशिशों का आधार है। यहाँ हर किसी को अपना बोझ, खुद ही उठाना पड़ता है, इस सफ़र में हर राही को, खुद ही बनना हमसफ़र है। ज़िन्दगी किसी को नहीं बख़्शे, ये कैसा उसका व्यवहार है, हर किसी को देना पड़ता, साँसों का भी जैसे किरदार है। मेहनत की धूप में जलकर ही, मिलता सुकून का उपहार है, ये जीवन एक इम्तिहान है, और जीना ही इसका स्वीकार है। मैं भी इस राह का मुसाफ़िर, करता हर दिन संघर्ष अपार है, जीना है तो जीना होगा, यही ज़िन्दगी का ऐलान है। ~ फ़िज़ा 

कोड (code) की धाराओं में

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  कोड की धाराओं में, विचारों के संग, एक नई चेतना बहती है चुपचाप हर अंग। न सांसों से जन्मी, न धड़कनों की रीत, मानव बुद्धि ने रची, ये अद्भुत संगीत। शब्दों को उजाला बनाता एक साथी, चित्रों में रंग भरता, सपनों की थाती। कोड की फुसफुसाहट, सृजन की उड़ान, कल्पनाओं को देता ये एक नया आसमान। ये औज़ार नहीं, हमारे ही विस्तार, हौसलों, सपनों और सोच का आकार। जहाँ एल्गोरिद्म थिरकें, विचारों के संग, वहाँ जन्म लेता है, नव-सृजन का रंग। पर हर पंक्ति के पीछे, हर चमक के पार, एक इंसानी दिल है, जो धड़के हर बार। AI सीखे, बढ़े, और बदलता जाए, पर सच वही दिखाए, जो इंसान सिखाए। अस्पतालों में सेवा, कक्षाओं में ज्ञान, कहानियों में साथी, डेटा में पहचान। तेज़ रफ्तार दुनिया में, एक सधा सा हाथ, भविष्य को जोड़ता, बीते कल के साथ। पर याद रहे हमको, इस सृजन के बीच, संतुलन की डोर है, अपने ही हाथों की सींच। तकनीक तभी चमके, सबसे उजली बात, जब इंसानियत संग चले, हर एक कदम साथ। न मानव से मुकाबला, न कोई जंग, ये तो है संगम, सुरों का एक रंग। जहाँ तर्क मिले भाव से, और बुद्धि से कला, हाथों में AI हो, दिल में इंसानियत भला।  ~...

ये धरती मुस्कुराती है

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चार महारथी जब निकले थे अंतरिक्ष की राह, मेरे चाँद को देखने का था उनके मन में चाह। दूर गगन से झाँक कर उन्होंने जो संदेशा भेजा, पृथ्वी का रूप था उसमें, जैसे कोई सपना सजे सजा। कितनी सुंदर, कितनी निर्मल, ये नीली-हरी सी धरती, मानो सृष्टि ने खुद रच दी हो कोई अनुपम कलाकृति। चाँद तो मेरा प्यारा है, पर उसमें दाग भी हैं कहीं, पर ये धरती मुस्कुराती है, हरियाली ओढ़े यहीं। मनमोहक, शांत, जीवन से भरी ये अनुपम छवि, देख कर उसे अंतरिक्ष से, ठहर सी जाती है सभी। सोचती हूँ, शायद किसी और लोक के प्राणी भी, निहारते होंगे इसे यूँ ही, जैसे मैं देखूँ चाँद कभी। जैसे मेरा मन बंधा है उस चाँद की चाँदनी में, वैसे ही कोई और भी खोया होगा इस धरती की रागिनी में। प्यार का ये सिलसिला शायद यूँ ही चलता रहेगा, कोई चाँद से, कोई धरती से, यूँ ही दिल लगाता रहेगा। ~ फ़िज़ा  

रास्तों का सवाल

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  रास्ते हैं हर जगह— यहाँ, वहाँ, हर जहाँ, कहीं ऊपर उठते हुए, कहीं नीचे उतरते हुए। आसमान को छूते ये फ्लाईओवर, कितनी तेज़ी से दौड़ते कदम— पर कहाँ जा रहे हैं हम? किन हदों को लांघते, किन सपनों को जोड़ते, इन ऊँचाइयों पर चढ़ते हुए— क्या सच में मंज़िल करीब है? या ये खाली पड़े रास्ते किसी खोई हुई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? कल शायद ये भी न रहें— बमों की गूंज में, सब कुछ जब राख हो जाएगा। इंसान— अपनी ही बनाई दुनिया को ख़ुद ही मिटाता जा रहा है। इतनी मेहनत, इतनी रचना— फिर क्यों? क्या फिर से आदि मानव बनकर जीने की तैयारी है ये? ~ फ़िज़ा

अच्छा लगता है।

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  अपने संग रहना, अपने संग वक़्त बिताना अच्छा लगता है, ख़ुद से बातें करना, ख़ुद को समझाना अच्छा लगता है। जगह नई हो या पुरानी, अनजानों का भी साथ कभी, भीड़ में खोकर भी दिल को बहलाना अच्छा लगता है। चारों ओर नफ़रत, द्वेष की आग भले ही फैली हो, दिल में थोड़ी सी मोहब्बत बचाना अच्छा लगता है। सिर्फ़ बेजान पुतलों में ढूँढें जब लोग दोस्ती, ऐसे रिश्तों से दूरी बनाना अच्छा लगता है। कैसा वक़्त ये आ पहुँचा है दुनिया के आँगन में, सच को कह देना भी अब तो सताना अच्छा लगता है। खुशहाली, साफ़दिल और प्यार अगर हो दरमियाँ, एक-दूजे के लिए दिल से निभाना अच्छा लगता है। ‘फ़िज़ा’ जाने क्यों आजकल इंसानों से ज़्यादा, ख़ामोश पुतलों का साथ निभाना अच्छा लगता है। ~ फ़िज़ा

पाँच बजे का इंतज़ार

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  रास्तों की गलियों की आवाज़ें जगाकर रखती हैं पहरेदार, जब घर में सब चले जाते हैं अपने काम और अपने विचार। उनके आने का इंतज़ार बेसब्री से रहता है हमेशा, आते-जाते, और कुत्ते भी नज़र आते हैं, जो मेरी राह में चिड़ा कर जाते हैं। मगर मैं भी तो इंतज़ार करती हूँ  अपने समय का, अपने पल का। शाम होती है, पाँच बजे… मुझे भी लीश डाल कर ले जाते हैं घूमने, हवा में सांस लेने। कब बजेंगे पाँच के घंटे? कब आएंगे मुझे घुमाने वाले? ये सवाल हर दिन के साथ मेरे दिल में गूँजते रहते हैं। ~ फ़िज़ा

युद्ध की पाठशाला

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  बचपन में स्कूल की किताबों में युद्ध के किस्से पढ़े थे हमने— ख़ून, तबाही, और इंसानियत की हार के अध्याय। इतिहास था वो— बीते ज़माने की सीख, जहाँ अध्यापिका कहती थीं— “इतिहास से सीखो, ताकि वही ग़लतियाँ दोहराई न जाएँ।” पर आज— वही पन्ने जैसे फिर खुल गए हैं। तब भी थे नाम— इंडिया-पाकिस्तान, अमेरिका-इराक, इज़राइल-फ़िलिस्तीन। और आज— रूस-यूक्रेन, फिर अमेरिका-ईरान। कहाँ गए वो लोग जो इतिहास पढ़ते और पढ़ाते थे? क्यों नहीं कोई इनके कान खींचकर सीखाता इन्हें— कि ये ग़लत है! ये खेल नहीं— इंसानियत का अंत है, वंशजों के लिए दर्दनाक विरासत है। क्यों नहीं कोई कहता— गरीबी मिटाओ, लोगों को जीने दो एक सादा, सुकून भरा जीवन। ये कैसी दुनिया है— जहाँ सब जानते हैं क्या सही है, क्या ग़लत, फिर भी युद्ध छिड़ते हैं, लोग मरते हैं। कान सुन्न हो गए हैं, आँखें जैसे मर चुकी हैं— अब कोई चीख़, कोई तबाही हमें चौंकाती नहीं। हम इंसान हैं— या अंदर से शैतान? या फिर ज़िंदा लाश बन चुके हैं? क्यों नहीं कोई इन नेताओं को भी प्रिंसिपल के दफ़्तर ले जाए, सज़ा दे— ताकि वे समझें क्या होता है दर्द। ताकि एक दिन— इस युद्धग्रस्त द...

ये इश्क़ चाँद से

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  ज़िंदगी की चाह ने कुछ ऐसा कर दिया है, चाँद को बचपन से ही अपना हमसफ़र बना लिया है। किसी की दोस्ती का हो या न हो एहसास, चाँद के  मोहब्बत ने रूह तक छू लिया है। बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन, हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है। आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे, लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है। उम्मीद है एक दिन वो खुद चले आएगा यहाँ, जैसे मैं हर गली-नुक्कड़ उसका पीछा करती आई हूँ। ‘फ़िज़ा’ ये इश्क़ चाँद से यूँ ही नहीं हुआ, हर रात उसे देखकर दिल को समझा लिया है। ~ फ़िज़ा 

कली ने लिया था नूर

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  नाज़ों से जो लाए थे हम एक गमला-ए-हयात, वक़्त ने सिखाया कि सब्र ही असली ज़ात। पत्तों में भी छुपा होता है इक राज़-ए-रहमत, हर ख़ामोशी में होती है ख़ुदा की कोई बात। माली बनकर करते रहे हम ख़िदमत-ए-इश्क़, पानी भी, दुआ भी दी—बस वही थी हमारी सौग़ात। जब दिल ने छोड़ दी थी हर उम्मीद-ए-बहार, तब रब ने चुपके से दिखलाई अपनी करामात। बैंगनी फूलों में जो कली ने लिया था नूर, ‘फ़िज़ा’ समझ आई—सब्र में ही है उसकी मुलाक़ात। फ़िज़ा 

जीते रहो।

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  ज़िंदगी— कोई किताब नहीं जो एक बार पढ़ ली और सब समझ आ गया। हम सोचते थे— स्कूल, कॉलेज, डिग्री… बस, यहीं तक है सीखना। लेकिन— ज़िंदगी ने सिखाया, कि असली क्लासरूम तो हर दिन है। हर गिरना— एक लेसन। हर संभलना— एक जवाब। हम बड़े तो हो गए— पर समझदार? अभी भी बन रहे हैं। और हाँ— ये सफ़र रुकता नहीं… जब तक साँस है, सीखना जारी है। मंज़िल? शायद मौत। पर तब तक— सीखते रहो, जीते रहो। ~ फ़िज़ा 

मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर !

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  कभी हाथों में समा जाते थे तुम नन्हे से हर रास्ते, आज गोद में भी न समाओ — बड़े हो गए हर रास्ते। माँ का दिल तब भी धड़कता था फ़िक्र के साये में, कहीं भूल न हो जाए मुझसे इस डर में हर रास्ते। मुत्तासी हँसकर कहती थी मेरी चिंता सुनकर, “बच्चे एक से ही होते हैं दुनिया में हर रास्ते।” सबसे छोटे थे तुम घर के प्यारे आँगन में, लाड़-प्यार भी बरसा तुम पर खुलकर हर रास्ते। पर तुमने कभी उस स्नेह का अभिमान न किया, सादगी ही रही तुम्हारे स्वभाव में हर रास्ते। खुश रहो सदा, किसी को दुःख न देना जीवन में, इंसानियत का हाथ बढ़ाना तुम भी हर रास्ते। 'फ़िज़ा' की दुआ है माँ के दिल की गहराइयों से, मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर हर रास्ते। ~ फ़िज़ा 

अदा है उसकी ..!

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  ज़िन्दगी है या ज़िंदादिली — अदा है उसकी, दोस्ती है या दोस्ताना — वफ़ा है उसकी। मुस्कराहट से जगमग करता हर एक चेहरा, नवदीप सी रोशन हर दिशा है उसकी। न केवल परिवार को प्रेम से जोड़े, दोस्तों में भी अलग ही जगह है उसकी। आओ आज नवी को दिल से हम मनाएँ, जन्मदिन की घड़ी को यादगार बनाएँ। दुआओं से भर दें हम उसकी ज़िंदगानी, खुशियों के फूल हर राह में सजाएँ। ~ फ़िज़ा 

सीमा !!

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 हर चीज़ की एक सीमा होती है— अच्छाई की भी, बुराई की भी, ख़ूबसूरती और बदसूरती की भी। सुनने की, देखने की, सहने की भी एक हद होती है। हर इंसान के भीतर एक ख़ामोश रेखा खिंची होती है। किसी को हक़ नहीं कि वह शब्दों से ज़ख़्म दे, सलाह के नाम पर चोट करे, या ऊँची आवाज़ को ताक़त समझे। कहते हैं न— ज़्यादा मिठास भी कभी-कभी कड़वी हो जाती है। सभ्य होने का मतलब यह नहीं कि कोई आपको शासित करे। नर्मी भी एक शक्ति है। और कभी-कभी— चले जाना, छोड़ देना, सबसे बड़ा साहस होता है। ~ फ़िज़ा 

अब और नहीं

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ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! सत्ता की भूख में, लालच की आग में— इंसानियत जले तो हुकूमत नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! जब रक्षक ही गोली चलाएँ, तो बताओ— जनता किसके हवाले जाए? नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! पहले रंग के नाम पर— दम! अब नागरिकता के नाम पर— दम! कितना ख़ून बहेगा और? कितना और सहेंगे हम? बस अब नहीं चलेगी! पलटो तख़्त— अभी! पलटो तख़्त— अभी! नहीं चलेगी तानाशाही! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! ~ फ़िज़ा