“गम वॉल”
ये तब की बात है, जब आलस भी एक आदत था,
मन भर जाने पर च्युइंग गम का यूँ दीवारों से रिश्ता था।
दिन ढले तो दीवारें भर जातीं रंग-बिरंगे निशानों से,
सुबह होते ही कोई आकर, उन्हें साफ़ करता अरमानों से।
ये दिनचर्या चलती रही, लोग यूँ ही दोहराते गए,
साफ़ करने वाले थकते रहे, पर हाथ न रुक पाए।
धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई,
बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई।
जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा,
लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा।
आज भी चाहे शहर वाले इसे फिर से साफ़ कर जाएँ,
पर अगले ही दिन ये दीवारें, फिर उसी रंग में रंग जाएँ।
“गम वॉल” के नाम से अब ये दुनिया भर में जानी जाए,
देखो आलस की ये कहानी, कैसे रंग नए दिखलाए।
~ फ़िज़ा

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