कली ने लिया था नूर


 नाज़ों से जो लाए थे हम एक गमला-ए-हयात,

वक़्त ने सिखाया कि सब्र ही असली ज़ात।


पत्तों में भी छुपा होता है इक राज़-ए-रहमत,

हर ख़ामोशी में होती है ख़ुदा की कोई बात।


माली बनकर करते रहे हम ख़िदमत-ए-इश्क़,

पानी भी, दुआ भी दी—बस वही थी हमारी सौग़ात।


जब दिल ने छोड़ दी थी हर उम्मीद-ए-बहार,

तब रब ने चुपके से दिखलाई अपनी करामात।


बैंगनी फूलों में जो कली ने लिया था नूर,

‘फ़िज़ा’ समझ आई—सब्र में ही है उसकी मुलाक़ात।


फ़िज़ा 

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