ये धरती मुस्कुराती है
चार महारथी जब निकले थे अंतरिक्ष की राह,
मेरे चाँद को देखने का था उनके मन में चाह।
दूर गगन से झाँक कर उन्होंने जो संदेशा भेजा,
पृथ्वी का रूप था उसमें, जैसे कोई सपना सजे सजा।
कितनी सुंदर, कितनी निर्मल, ये नीली-हरी सी धरती,
मानो सृष्टि ने खुद रच दी हो कोई अनुपम कलाकृति।
चाँद तो मेरा प्यारा है, पर उसमें दाग भी हैं कहीं,
पर ये धरती मुस्कुराती है, हरियाली ओढ़े यहीं।
मनमोहक, शांत, जीवन से भरी ये अनुपम छवि,
देख कर उसे अंतरिक्ष से, ठहर सी जाती है सभी।
सोचती हूँ, शायद किसी और लोक के प्राणी भी,
निहारते होंगे इसे यूँ ही, जैसे मैं देखूँ चाँद कभी।
जैसे मेरा मन बंधा है उस चाँद की चाँदनी में,
वैसे ही कोई और भी खोया होगा इस धरती की रागिनी में।
प्यार का ये सिलसिला शायद यूँ ही चलता रहेगा,
कोई चाँद से, कोई धरती से, यूँ ही दिल लगाता रहेगा।
~ फ़िज़ा

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