Posts

Showing posts with the label kam-vasna

कल चौदहवीं की रात नहीं थी, मगर फिर भी!!!!

Image
कल श्याम कुछ थकी थकी सी थी  कल पटाखों से भरा आसमान था  जाने -अनजाने लोगों से मुलाकात  फिर घंटों बातें और सोच में डूबे रहे  वक़्त दौड़ रही थी और हम धीमे थे  चाँद श्याम नज़र तो आया था मुझे  पर रात तक तारों के बीच खो गया  मगर मोहब्बत की लौ जला चूका था  रात निकल रही थी कल के लिए और  हम अब भी सिगार सुलगाते बातें करते  वो मेरे पैर सहलाता बाते करते हुए  बीच-बीच में कहता 'I love you' midnight का वक़्त निकल गया  मगर यहाँ किसे है कल की फ़िक्र  घंटों मोहब्बत और भविष्य की बातें और फिर तारों को अलविदा कर  चले एक दूसरे की बाहों में सोने  लगा तो था अब नींद में खो जायेंगे  मगर दोनों एक दूसरे में ऐसे खोये   काम-वासना-मोहब्बत-आलिंगन  की इन मिश्रित रंगों में खोगये  समझ नहीं आया रात गयी या  सेहर ठहर सी गयी !!! ~ फ़िज़ा  

ऐ चाँद, दिलबर मेरे हमनशीं

Image
चित्र अशांक सींग के सौजन्य से चाँद की अठखेलियां देख  आज कविहृदय जाग गया उसकी चंचल अदाओं से  मेरा दिल घायल हो गया  अपना पूर्ण मुख प्रतिष्ठा  और हलकी सी मुस्कान से  घायल को ही बेहाल किया  न चैन से सोने दिया रात भर  न चैन से जगने दिया दिन में  कामदेव की सूरत में चाँद  प्यार में रत रहे फ़िज़ा संग  हर वक़्त एक वासना सी  सम्भोग का वो आलम जैसे  हर ख़ुशी दर्शाये रंग से ऐसे  मानो कभी परदे में छिपके  तो अँधेरे की आड़ में ऐसे  एक-दूसरे को समर्पण ऐसे  तृप्ति मिली आलिंगन भर से  सदियों से सताए रखा दूर से  उस रात की रासलीला ने  उम्मीद जगा दिया अब से  हो न हो तुम हो उस जहाँ में  इंतज़ार करूंगी इस जहाँ में  अब तो मिलन है ज़रूरी  आशा जिज्ञासा बढ़ गयी है  ऐ चाँद, दिलबर मेरे हमनशीं  तू मिलने आ इस चमन में  तख्ती है राह तेरी फ़िज़ा  फिर एक रात दोनों जवाँ  बसेरा हो एक रात का  जीवनभर का रहे फिर नाता ! ~ फ़िज़ा...

विस्मरणिया है संगम ऐसा ...

Image
शुष्क मखमल सी बूँदें  मानो ओस की मोती  लड़ियाँ बनाके बैठीं हैं  एक माला में पिरोये हुए  सुन्दर प्रकृति की शोभा में  बढ़ाएं चार चाँद श्रृंगार में  मचल गया मेरा दिल यहीं  लगा सिमटने उस से यूँ  जैसे काम-वासना में लुत्प  विस्मरणिया है संगम ऐसा  हुआ मैं तृप्त कामोन्माद  मंद मुस्कान छंद गाने मल्हार  प्रकृति का मैं बांवरा हुआ रे  श्रृंगार रस में डूबा दिया मुझे  ~ फ़िज़ा