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बरसाती एहसास

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 बारिश की बूंदों में अश्क़ उतर आते है दोस्तों के साथ से ग़म संवर जाते हैं ! आग दिल में जले तो नूर भी साथ लाती है, हद से बढ़े तो ख़ुद को ही राख़ कर जाती है। कभी लम्स बनकर बारिश रूह को छू जाए, कभी सैलाब बनकर हर वहम बहा ले जाए। ज़िंदगी की कश्ती मौजों के दरमियाँ चले, कभी सजदे में झुके, कभी खुद में संभले। बरसाती छाते सी हालत, उलट-पुलट का सफ़र, फिर भी चलती रहती है साँसों की ये डगर। साल आते हैं, जाते हैं, वक़्त का क्या गिला, ज़िंदगी मुख़्तसर सही, इश्क़ से हो सिलसिला। सूरज पैग़ाम-ए-हयात दे, चाँद भी ‘फ़िज़ा’ नूर लुटाए, ज़िंदादिली में जो जी ले, वही मुकम्मल कहलाए। ~ फ़िज़ा 

भीगा मौसम भीगी अँखियाँ

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भीगा मौसम भीगी अँखियाँ  जाने किस-किस की दास्ताँ  सुनाएं नितदिन झर -झर वर्षा  किसी के ख्वाब टपकते जैसे  किसी के अरमान बेह गए जैसे  भीगा मौसम भीगी अँखियाँ  जाने किस-किस की दास्ताँ  सुनाएं नितदिन झर -झर वर्षा किसी का मिलना या बिछड़ना  मोहब्बत और विरह की दास्ताँ  तरसना- तड़पाना मिलन की घड़ियाँ  भीगा मौसम भीगी अँखियाँ  जाने किस-किस की दास्ताँ  सुनाएं नितदिन झर -झर वर्षा ये बारिश ले आये सबकी कहानियां  पहाड़ों से लेकर गली, तालाब  खेत-खलियानों में अनाज जैसे  भीगा मौसम भीगी अँखियाँ  जाने किस-किस की दास्ताँ  सुनाएं नितदिन झर -झर वर्षा लहर हरियाली की जैसे क्रांति  खुशहाली तो कहीं तबाही बाढ़ की  सुख की दुःख की गुलाबी चादर लिए  भीगा मौसम भीगी अँखियाँ  जाने किस-किस की दास्ताँ  सुनाएं नितदिन झर -झर वर्षा ~ फ़िज़ा 

क्यों न मोहब्बत के रंग में खेलें होली

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अब के सर्दियाँ तो गयीं नहीं  सावन और बसंत का मिलन  कुछ इस तरह रंग लाया है  फूलों को खिलने का तो  बरखा को उसे सँवारने का  जैसे कोई अनहोनी सी सही  मगर इनका मिलन तो होगया  कहीं शुष्क सेहर दिल गुदगुदाए  तो बसंत के फूल बिखेरें खुशबु माहौल तो जैसे बन जाये संयोग  फ़ज़ा भी राज़ी ये दिल भी राज़ी  क्यों न मोहब्बत के रंग में खेलें होली  ~ फ़िज़ा 

हरियाली फैलाते ये बूँदें...!

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ज़मीन पर गिरतीं हैं बूँदें  जाने कितने ऊंचाइयों से  कितने सपने संग लिए  क्या-कुछ देने के लिए  मचलती छलकाती हुई  एक से दो, दो से हज़ार  लड़ियाँ घनघोर बरसते  कहलाते बरखा रानी  जो जब झूम के बरसते  ज़मीन को मोहित करते  पेड़ों-गलियों में बसकर  फूलों के गालों को चूमकर  रसीले भवरों से बचाकर  जैसे-तैसे गिरकर-संभलकर  हरियाली फैलाते ये बूँदें  कभी वर्षा, कभी वृष्टि  बनकर सामने आते ! ~ फ़िज़ा 

कहीं आग तो कहीं है पानी ...!

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कहीं आग तो कहीं है पानी प्रकृति की कैसी ये मनमानी हर क़स्बा, प्रांत है वीरानी फैला हर तरफ पानी ही पानी कहीं लगी आग जंगल में रानी वहीं चाहिए बस थोड़ा सा पानी मगर प्रकृति की वही मनमानी संतुलन रहे पर ये है ज़िंदगानी कहीं लगी है आग तो कहीं पानी  दुआ करें बस ख़त्म हो ये अनहोनी कभी नहीं देखी-सुनी ऐसी कहानी कहीं आग तो कहीं है पानी प्रकृति की कैसी ये मनमानी ! ~ फ़िज़ा

वर्षा की बौछार...!

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शाम अकेली थी थकी-जीती ज़िन्दगी, हारी नहीं थी ;) बच्चों से बतियाकर, अपने कुत्ते के संग खेलकर, जब ख़याल आया, गरम-गरम फुल्के, और वसंत-प्याज़ की सब्ज़ी, मारे भूख के दौड़ने लगे चूहे, फिर एक न देखा इधर-या उधर, जैसे ही खाने बैठी, वर्षा की बौछार, लगी भूमि को तृप्त करने में, जब तक प्यास रहे अंतर्मन में, तब तक ही रहे कीमत सब में ! ~ फ़िज़ा

मचलते हैं अरमान मेरे दिल में जवां ...!

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अंगड़ाई लेते हुए बादलों का कारवाँ  चले हैं बरसाते हुए झरने कई यहां  मचलते हैं अरमान मेरे दिल में जवां   सौंधी खुशबु गिली मिटटी नहरें यहाँ  हरियाली हर तरफ गुलाबी दिल कहाँ   भीगे रुत में भीगे अरमान भीगे ये समां  मुझे कायल करते हैं पिया की अदा  बेबस हूँ आज बस निकल जाने दो  भीगना है मुझे जैसे भीगे हैं अरमां    कोई केहदो जहाँ से न आये यहाँ  हम हैं ग़ुम अपने ही खवाबों में जहाँ  सिर्फ हम हैं वो है और ये समां  अंगड़ाई लेते हुए बादलों का कारवाँ  चले हैं बरसाते हुए झरने कई यहां  मचलते हैं अरमान मेरे दिल में जवां  ~ फ़िज़ा 

हाय! कैसे कोई कहे ये है बरखा का खेल !!

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बारिशों का मौसम और वो मन की चंचलता  क्यों लगे मुझे जैसे पाठशाला की हो बुट्टी  या फिर दफ्तर से लेते हैं चलो छुट्ठी  सफर का एक माहौल सजाता है चित्तचोर  निकल पड़ो यूँही राह में दूर कहीं बहुत दूर  जहाँ न हम होने का हो ग़म, न तुम होने का  निकल पड़ो बरसात में भीगते हुए कुछ पल  संगीत को करने दो उसकी अठखेलियाँ  फिर तुम चाहे हो जाओ बावले दीवाने कहीं  भूल जाओ कोई है इस जहाँ में या उस जहाँ में  मदमस्त होकर मंद हो जाओ मूंदकर आँखें  प्रकृति के संग हो जाये वो संगम मोहब्बत का  आलिंगन हो ख्वाबों और हकीकत का  प्यार करो इस कदर के हर पत्ता हर कण कहे  मैं वारि जाऊँ बलिहारी जाऊँ इस दीवानेपन पर  जहाँ सिर्फ बारिश की बूँदें नज़र आये पर्दा बनके  बारिशों का मौसम और वो मन की चंचलता हाय! कैसे कोई कहे ये है बरखा का खेल !! ~ फ़िज़ा