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हताश मन

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  मन बहुत प्रताड़ित है कई दिनों से  हाथरस के हादसे की खबर ने जैसे  अंदर ही एक कबर खुदवा रखी ऐसे  उसमें न समा पाती है लाश भी ऐसे  जब उसके चिथड़े-चिथड़े हो गए हों  जानवर की परिभाषा से भी नहीं मेल  ऐसे भी इंसान रेहते हैं गाँव-शहर में  जहाँ स्त्री को केवल मांस का ढेर  समझने वाले कुछ उच्च जाती के  खूंखार हैवान जो मांस को नौचते  मगर नीच जात बताके न छूने का  झूठ भी बोलते कायर हैवान ये होते  इंसान आये दिन मर रहे हैं दुनिया में  हैवानों का बोल-बाला है आजकल  बेटी-बहिन -पत्नी और माँ कहाँ जायेंगे  जब हैवानों की बस्ती में आज़ाद घूमेंगे  इनसे भले तो जानवर जो शिकार करते  किन्तु अपनी जात से हिंसा नहीं करते  जितना अधिक ये सोचे हताश मन होये ! ~ फ़िज़ा 

आसमान से गिरे और खजूर पे अटके

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रोते हुए मैं निकली तो थी मगर मस्तिष्क  पहेलियों को सुलझाने की लड़ी खोज रहा था  अब तक मैं ज्यादा लोगों को तो नहीं जानती थी अगर जानती थी तब भी मदत की गुंजाईश कम थी   किसी वजह यमुना को तंग नहीं करना चाहती थी  एक ही नियोक्ता है सो मराठी महिला को फ़ोन लगाया  बड़ी मिन्नत करके कहा मुझे किराये पर कमरा चाहिए  किसी से भी केहा कर मेरे लिए किराये का एक कमरा  कहीं से दिला सकती हैं अपने दोस्तों या अपने ही घर में? मैं किराये के अलावा आपकी बेटी की देखभाल करुँगी  मराठी महिला पहले तो बोलीं के नहीं-नहीं मेरे घर में नहीं  मेरे पति अलग हैं अपनी बेहन का भी यहाँ रहना पसंद नहीं  अपनी सहेली से पूछती हूँ वो किराये पर कमरा देती है देखें  मैंने मिन्नत की देखिएगा पादरी के घर पर रहना मुश्किल है  वो निकाल देंगे या धर्म का ज़ोर देंगे मुझे मेरी सुरक्षा ज़रूरी है  मैं तुम्हारे घर रेहा लूँ किराया तुम्हें दे दूँगी तुमसे जान-पहचान है  मगर उन्होंने मना कर दिया साफ़, उस वक्त गला सूखने को आया  इस उम्मीद में के स...

नारी जाती का कोई सम्मान नहीं है!

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किताबों में पढ़ा था ऐसा भी एक ज़माना था औरत से ही जीवन चलता और घर भी संभलता था ! फिर एक ज़माना वो भी आया नारी शक्ति, नारी सम्मान का एक चलन ऐसा भी आया ऊँचा दर्ज़ा और सम्मान दिया ! फिर भी नारी का ये हाल रहा "अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी आँचल में है दूध, आँखों में पानी" हाड-मांस की वस्तु बनी नारी! फिर ये भी ज़माना आया एक समान एक इंसान का नारा आया जवान-बूढ़े-बच्चे सभी एक समान फिर बलात्कार क्यों स्त्री पर ढाया? मेहनत औरत भी करे, जिम्मेदारी भी ले औरत कंधे से कन्धा मिलाकर चले बस एक ही वजह से वो शिकार बने दरिंदे औरत को हवस की नज़र से देखे ! पढ़ा है बन्दर से इंसान बना पर बन्दर हमसे अक्कलमंद निकला बोलना नहीं सीखा तो क्या हुआ प्यार-मोहब्बत का इज्ज़्हार तो आया ! इंसान अपनी बुद्धि से मात खाया अपने ही लोगों को समझ न पाया औरत को समझने का भाग्य न पाया बन्दर से इंसान दरिंदे का सफर पाया! किसको दोश दें ऐसा वक़्त आया बलात्कारी या उसको आश्रय देने वाला गुनहगारों को सज़ा दें तो क्या दें हर शहर हर गली की कहानी है ! "अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी आँचल में है दूध, आँखों में पानी" मैथिलि जी का लि...

क्यों? किस लिए? क्या पाया? क्या मिला?

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एक आवाज़ और गोली ने भून दिया  सबको छलनी-छलनी कर दिया  हर तरफ लहू का गलीचा बिछा दिया  चीखते-चिल्लाते, बिलखते बचते-बचाते  सुर्ख़ियों में लरजते कुछ ज़िन्दगियाँ  मरने वाला भी न रहा और मारने वाला भी  जाने कौन देस से था वो हाड़ -मांस का  किस बात की तमन्ना पूरी कर गया यूँ  के बचे लोगों में सवाल बनके रहा गया  क्यों? किस लिए? क्या पाया? क्या मिला? सृष्टि का खेल या दिमागी असमंजस  हैवानियत का एक और प्रदर्शन दूरदर्शन पर था!    ~ फ़िज़ा