जड़ों की पुकार
उम्र की सीढ़ियाँ
चाहे जितनी ऊँची क्यों न हो जाएँ,
मन का एक कोना
हमेशा लौटना चाहता है—
उस बचपन की ओर,
जहाँ सपनों ने पहली बार आँखें खोली थीं।
वही स्कूल,
वही मिट्टी की सौंधी महक,
वही आँगन, वही गलियाँ,
जहाँ हमारे होने की
पहली इबारत लिखी गई थी।
जड़ें...
कभी हमसे बिछड़ती नहीं।
नब्बे वर्ष की उम्र में
पिताजी की बस एक ही चाह थी—
एक बार फिर
वेलियानकोड की धरती को छूना,
मूक्कुथला के उस विद्यालय को देखना,
जिसकी पाँच एकड़ ज़मीन
मेरे पति के पकारावूर परिवार ने
सिर्फ़ एक रुपये में
सरकार को समर्पित कर दी थी।
समय भी कैसे-कैसे रिश्ते बुनता है—
मेरे पति के दादाजी
मेरे पिताजी के गुरु थे,
और वर्षों बाद
उसी गुरु के पोते ने
अपने शिष्य की बेटी का हाथ थाम लिया।
जीवन सचमुच
एक पूर्ण वृत्त है।
गाँव की उन पगडंडियों से गुज़रते हुए
पिताजी की स्मृतियाँ बोल उठीं—
"हर रोज़ नदी नाव से पार करता था,
फिर कई मील पैदल चलकर
स्कूल पहुँचता था।"
कार की खिड़की से
उन रास्तों को देखते हुए
मैंने महसूस किया—
उस समय शिक्षा
सिर्फ़ किताबों का नाम नहीं थी,
वह पसीने, संघर्ष
और अटूट हौसले का दूसरा नाम थी।
विद्यालय का द्वार खुला,
और पिताजी का चेहरा
मानो वर्षों बाद फिर खिल उठा।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
"यहीं आए थे बापू...
दांडी यात्रा के दिनों में।"
फिर मैदान की ओर देखकर बोले—
"यहीं दौड़ा करता था मैं..."
उनकी मुस्कान के साथ
मैं भी लौट गई
अपने बचपन में—
केंद्रीय विद्यालय, खड़कवासला, पुणे,
दौड़ती हुई,
ट्रॉफियाँ जीतती हुई।
कुछ यादें
सिर्फ़ यादें नहीं होतीं,
वे पीढ़ियों के बीच
एक अदृश्य पुल बन जाती हैं।
वह चुपचाप
चारों ओर देखते रहे।
मुझे लगा,
मेरे सामने
नब्बे वर्ष का वृद्ध नहीं,
एक छोटा-सा बालक खड़ा है—
अपने शिक्षकों,
अपने मित्रों,
अपने बीते हुए कल से
धीरे-धीरे बातें करता हुआ।
पास खड़े एक नन्हे विद्यार्थी से
जब मैंने कहा—
"मेरे पिताजी भी
कभी इसी विद्यालय के छात्र थे,"
तो उसकी विस्मित आँखों में
मैंने समय को ठहरते देखा।
लौटते हुए
मैं उसी छोटे-से बालक को
अपने साथ ले आई—
जो कभी मेरे पिताजी थे।
संसाधन भले कम थे,
पर सपनों की कोई कमी न थी।
सुविधाएँ भले सीमित थीं,
पर हौसले आसमान से बड़े थे।
इस यात्रा ने मुझे
सबसे अनमोल उपहार दिया—
अपने पिता को
एक बार फिर
अपने बचपन में मुस्कुराते हुए देखना।
और तब जाना...
हम बड़े तो हो जाते हैं,
पर हमारे भीतर का बच्चा
कभी बूढ़ा नहीं होता। ❤️
~ फ़िज़ा

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