बशीर बद्र साहब को श्रद्धांजलि 🤲💐🤲
आज अल्फ़ाज़ उदास हैं, ग़ज़लें ख़ामोश हैं और शायरी की महफ़िल एक अज़ीम फ़नकार के बिछड़ जाने का मातम मना रही है। बशीर बद्र साहब सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, वे एहसासों के तर्जुमान थे। उन्होंने मोहब्बत को लफ़्ज़ दिए, जुदाई को आवाज़ दी और इंसानी रिश्तों की नाज़ुकियों को ऐसी सादगी से बयां किया कि हर दिल को अपनी कहानी उनमें नज़र आई। उनके शेर किताबों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि लोगों की ज़िंदगी, बातचीत और यादों का हिस्सा बन गए। दर्द को उन्होंने कभी शिकायत नहीं बनाया, बल्कि उसे ख़ूबसूरत शायरी में ढालकर दुनिया को सौंप दिया। आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनकी आवाज़ उनके अशआर में गूंजती रहेगी। उनकी शायरी हमें याद दिलाती रहेगी कि लफ़्ज़ मरते नहीं, वे लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं। "दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।" अलविदा बशीर बद्र साहब। आप चले गए, मगर आपकी शायरी हमेशा हमारी रूहों में उजाला करती रहेगी। इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन। ~ फ़िज़ा