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रास्तों का सवाल

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  रास्ते हैं हर जगह— यहाँ, वहाँ, हर जहाँ, कहीं ऊपर उठते हुए, कहीं नीचे उतरते हुए। आसमान को छूते ये फ्लाईओवर, कितनी तेज़ी से दौड़ते कदम— पर कहाँ जा रहे हैं हम? किन हदों को लांघते, किन सपनों को जोड़ते, इन ऊँचाइयों पर चढ़ते हुए— क्या सच में मंज़िल करीब है? या ये खाली पड़े रास्ते किसी खोई हुई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? कल शायद ये भी न रहें— बमों की गूंज में, सब कुछ जब राख हो जाएगा। इंसान— अपनी ही बनाई दुनिया को ख़ुद ही मिटाता जा रहा है। इतनी मेहनत, इतनी रचना— फिर क्यों? क्या फिर से आदि मानव बनकर जीने की तैयारी है ये? ~ फ़िज़ा

अच्छा लगता है।

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  अपने संग रहना, अपने संग वक़्त बिताना अच्छा लगता है, ख़ुद से बातें करना, ख़ुद को समझाना अच्छा लगता है। जगह नई हो या पुरानी, अनजानों का भी साथ कभी, भीड़ में खोकर भी दिल को बहलाना अच्छा लगता है। चारों ओर नफ़रत, द्वेष की आग भले ही फैली हो, दिल में थोड़ी सी मोहब्बत बचाना अच्छा लगता है। सिर्फ़ बेजान पुतलों में ढूँढें जब लोग दोस्ती, ऐसे रिश्तों से दूरी बनाना अच्छा लगता है। कैसा वक़्त ये आ पहुँचा है दुनिया के आँगन में, सच को कह देना भी अब तो सताना अच्छा लगता है। खुशहाली, साफ़दिल और प्यार अगर हो दरमियाँ, एक-दूजे के लिए दिल से निभाना अच्छा लगता है। ‘फ़िज़ा’ जाने क्यों आजकल इंसानों से ज़्यादा, ख़ामोश पुतलों का साथ निभाना अच्छा लगता है। ~ फ़िज़ा

पाँच बजे का इंतज़ार

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  रास्तों की गलियों की आवाज़ें जगाकर रखती हैं पहरेदार, जब घर में सब चले जाते हैं अपने काम और अपने विचार। उनके आने का इंतज़ार बेसब्री से रहता है हमेशा, आते-जाते, और कुत्ते भी नज़र आते हैं, जो मेरी राह में चिड़ा कर जाते हैं। मगर मैं भी तो इंतज़ार करती हूँ  अपने समय का, अपने पल का। शाम होती है, पाँच बजे… मुझे भी लीश डाल कर ले जाते हैं घूमने, हवा में सांस लेने। कब बजेंगे पाँच के घंटे? कब आएंगे मुझे घुमाने वाले? ये सवाल हर दिन के साथ मेरे दिल में गूँजते रहते हैं। ~ फ़िज़ा

युद्ध की पाठशाला

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  बचपन में स्कूल की किताबों में युद्ध के किस्से पढ़े थे हमने— ख़ून, तबाही, और इंसानियत की हार के अध्याय। इतिहास था वो— बीते ज़माने की सीख, जहाँ अध्यापिका कहती थीं— “इतिहास से सीखो, ताकि वही ग़लतियाँ दोहराई न जाएँ।” पर आज— वही पन्ने जैसे फिर खुल गए हैं। तब भी थे नाम— इंडिया-पाकिस्तान, अमेरिका-इराक, इज़राइल-फ़िलिस्तीन। और आज— रूस-यूक्रेन, फिर अमेरिका-ईरान। कहाँ गए वो लोग जो इतिहास पढ़ते और पढ़ाते थे? क्यों नहीं कोई इनके कान खींचकर सीखाता इन्हें— कि ये ग़लत है! ये खेल नहीं— इंसानियत का अंत है, वंशजों के लिए दर्दनाक विरासत है। क्यों नहीं कोई कहता— गरीबी मिटाओ, लोगों को जीने दो एक सादा, सुकून भरा जीवन। ये कैसी दुनिया है— जहाँ सब जानते हैं क्या सही है, क्या ग़लत, फिर भी युद्ध छिड़ते हैं, लोग मरते हैं। कान सुन्न हो गए हैं, आँखें जैसे मर चुकी हैं— अब कोई चीख़, कोई तबाही हमें चौंकाती नहीं। हम इंसान हैं— या अंदर से शैतान? या फिर ज़िंदा लाश बन चुके हैं? क्यों नहीं कोई इन नेताओं को भी प्रिंसिपल के दफ़्तर ले जाए, सज़ा दे— ताकि वे समझें क्या होता है दर्द। ताकि एक दिन— इस युद्धग्रस्त द...

ये इश्क़ चाँद से

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  ज़िंदगी की चाह ने कुछ ऐसा कर दिया है, चाँद को बचपन से ही अपना हमसफ़र बना लिया है। किसी की दोस्ती का हो या न हो एहसास, चाँद के  मोहब्बत ने रूह तक छू लिया है। बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन, हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है। आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे, लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है। उम्मीद है एक दिन वो खुद चले आएगा यहाँ, जैसे मैं हर गली-नुक्कड़ उसका पीछा करती आई हूँ। ‘फ़िज़ा’ ये इश्क़ चाँद से यूँ ही नहीं हुआ, हर रात उसे देखकर दिल को समझा लिया है। ~ फ़िज़ा 

कली ने लिया था नूर

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  नाज़ों से जो लाए थे हम एक गमला-ए-हयात, वक़्त ने सिखाया कि सब्र ही असली ज़ात। पत्तों में भी छुपा होता है इक राज़-ए-रहमत, हर ख़ामोशी में होती है ख़ुदा की कोई बात। माली बनकर करते रहे हम ख़िदमत-ए-इश्क़, पानी भी, दुआ भी दी—बस वही थी हमारी सौग़ात। जब दिल ने छोड़ दी थी हर उम्मीद-ए-बहार, तब रब ने चुपके से दिखलाई अपनी करामात। बैंगनी फूलों में जो कली ने लिया था नूर, ‘फ़िज़ा’ समझ आई—सब्र में ही है उसकी मुलाक़ात। फ़िज़ा 

जीते रहो।

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  ज़िंदगी— कोई किताब नहीं जो एक बार पढ़ ली और सब समझ आ गया। हम सोचते थे— स्कूल, कॉलेज, डिग्री… बस, यहीं तक है सीखना। लेकिन— ज़िंदगी ने सिखाया, कि असली क्लासरूम तो हर दिन है। हर गिरना— एक लेसन। हर संभलना— एक जवाब। हम बड़े तो हो गए— पर समझदार? अभी भी बन रहे हैं। और हाँ— ये सफ़र रुकता नहीं… जब तक साँस है, सीखना जारी है। मंज़िल? शायद मौत। पर तब तक— सीखते रहो, जीते रहो। ~ फ़िज़ा