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सीमा !!

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 हर चीज़ की एक सीमा होती है— अच्छाई की भी, बुराई की भी, ख़ूबसूरती और बदसूरती की भी। सुनने की, देखने की, सहने की भी एक हद होती है। हर इंसान के भीतर एक ख़ामोश रेखा खिंची होती है। किसी को हक़ नहीं कि वह शब्दों से ज़ख़्म दे, सलाह के नाम पर चोट करे, या ऊँची आवाज़ को ताक़त समझे। कहते हैं न— ज़्यादा मिठास भी कभी-कभी कड़वी हो जाती है। सभ्य होने का मतलब यह नहीं कि कोई आपको शासित करे। नर्मी भी एक शक्ति है। और कभी-कभी— चले जाना, छोड़ देना, सबसे बड़ा साहस होता है। ~ फ़िज़ा 

अब और नहीं

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ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! सत्ता की भूख में, लालच की आग में— इंसानियत जले तो हुकूमत नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! जब रक्षक ही गोली चलाएँ, तो बताओ— जनता किसके हवाले जाए? नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! पहले रंग के नाम पर— दम! अब नागरिकता के नाम पर— दम! कितना ख़ून बहेगा और? कितना और सहेंगे हम? बस अब नहीं चलेगी! पलटो तख़्त— अभी! पलटो तख़्त— अभी! नहीं चलेगी तानाशाही! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! ~ फ़िज़ा 

बरसाती एहसास

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 बारिश की बूंदों में अश्क़ उतर आते है दोस्तों के साथ से ग़म संवर जाते हैं ! आग दिल में जले तो नूर भी साथ लाती है, हद से बढ़े तो ख़ुद को ही राख़ कर जाती है। कभी लम्स बनकर बारिश रूह को छू जाए, कभी सैलाब बनकर हर वहम बहा ले जाए। ज़िंदगी की कश्ती मौजों के दरमियाँ चले, कभी सजदे में झुके, कभी खुद में संभले। बरसाती छाते सी हालत, उलट-पुलट का सफ़र, फिर भी चलती रहती है साँसों की ये डगर। साल आते हैं, जाते हैं, वक़्त का क्या गिला, ज़िंदगी मुख़्तसर सही, इश्क़ से हो सिलसिला। सूरज पैग़ाम-ए-हयात दे, चाँद भी ‘फ़िज़ा’ नूर लुटाए, ज़िंदादिली में जो जी ले, वही मुकम्मल कहलाए। ~ फ़िज़ा 

हर ‘फ़िज़ा’ की पहचान अलग होती है

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  हँसता-खिलता एक बीज, पौधे का रूप धर लेता है, और उसी पौधे की गोद से, फिर एक नया बीज जन्म लेता है। बीज से पौधा, पौधे से फिर बीज— यही तो जीवनचक्र का शांत, अनवरत संगीत है। ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही पहेलियों से भरी है, हर मोड़ सरल नहीं होता, हर राह सीधी नहीं होती। पतझड़ भी आता है अपने समय पर, और कभी-कभी टहनियाँ वक़्त से पहले साथ छोड़ जाती हैं। कौन किसका है यहाँ, कौन किसका नहीं — एक ही जड़ से उगकर भी, हर ‘फ़िज़ा’ की पहचान अलग होती है। ~ फ़िज़ा 

क्या हम अंदर से ही मरचुके

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देखा तो नन्हे-नन्हे पैर  एक दूसरे पर लदे हुए  मासूम सुन्दर और कोमल से  एक तरफ देखा नन्हे पैर  मैदान में दौड़ते व  खेलते हुए  खिलखिलाते चिल्लाते हुए  बच्चे जो ख़ुशियाँ बिखेरते हैं  हमारा कल हमारे बाद भी रहेगा  वही कल आज लहूलुहान है  खून से रंगे लथपथ शरीर  बेज़ुबान लहुलुहान बेजान  हमारा कल हमीं से बर्बाद  क्या हम अंदर से ही मरचुके  आँखों से देखकर भी नहीं चुके  जानवर भी बच्चों का संरक्षण करते  इंसानियत का क़त्ल हो चला है  स्वार्थ ने जगड़ लिया है जहां  ज़िन्दगी फिर वो बच्चों की सही  नफरत और द्वेष में हम सब  यूँही ख़त्म हो जायेंगे हम  मुर्ख, अपने ही पैर मारे कुल्हाड़ी  मगर ज़िन्दगी? पीढ़ी दर पीढ़ी  क्या सीख हैं आनेवाले कल को  ख़त्म करो सभी को सत्ते के लिए  जब अपने पोते-पोती पूछेंगे तुमसे  क्या जवाब दोगे उनको क्या कहोगे? आँख के लिए आँख लोगे अंधे हो जाओगे !! ~ फ़िज़ा   

जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची !

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  तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ धर्म न था तब कोई बँटवारा । सबको मानें एक ही धारा ॥ दीवाली की मिठाई मिलती । ईद की सेवइयाँ भी खिलती ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ सुनने का था सबमें धैर्य । मन में न था छल कपट न वैर्य ॥ थाली एक, नज़रिया भिन्न । हँसी हटा देती सब क्षुब्ध मन ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ भाषाएँ अलग, पर मुस्कान । इशारों में मिलता सम्मान ॥ न भय किसी का, न दूरी थी । बस आदर ही आदर छायी थी ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ चोरी को मजबूरी कहते । करुणा से ही सारे हल लेते ॥ उषा-फ़रज़ाना संग खेल । मानवता का था जीवन मेल ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ ~ फ़िज़ा 

करना है आरंभ !

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ज़िन्दगी में कुछ हसीन पल  यूँही चले आते हैं बिखेरने   खुशियां ! कभी कुछ सोचकर नहीं  यूँही एक पल में लिया हुआ  फैसला ! वो वक़्त भी आ गया जब  सीखे हुए कला का करना है   प्रदर्शन ! कई भावनायें हैं मन में गुरु दक्षिणा  एवम गुरु के आशीर्वाद से करना है  आरंभ !  ~ फ़िज़ा