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जिंजर की अदा ..

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  मासूम सी आँखों में कितनी प्यारी शरारत है, जिंजर की हर अदा में बसती मेरी मोहब्बत है। कानों को यूँ खड़ा करके, जैसे कुछ कहना चाहती, खामोशी में भी उसकी अपनी मीठी इबारत है। छोटी-सी गेंदों संग बैठी, दुनिया से बेख़बर सी, उसकी सादगी में ही छुपी खुशियों की दौलत है। ना ताज चाहिए उसको, ना कोई बड़ी फरमाइश, बस थोड़ा प्यार मिल जाए—यही उसकी हुकूमत है। घर के हर कोने में उसकी मासूम चाल बसती, जिंजर नहीं, वो दिल की धड़कन, मेरी राहत है। ~ फ़िज़ा

अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो।

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  सड़क यूँ ही चुपचाप चली, जैसे कोई सफ़र अधूरा हो, बादलों ने आसमान ओढ़ लिया, मानो दिल थोड़ा सा भरा हो। धूप कहीं बादलों में छुपकर, धीरे से झाँकना चाहती है, जैसे मुश्किलों के इस मौसम में, उम्मीद अभी भी मुस्काती है। पेड़ों की खामोश कतारें, वक़्त के संग झूम रही हैं, कुछ सूखी शाखें भी शायद, नई बहारें ढूँढ रही हैं। रास्ते खाली सही मगर, मंज़िलें फिर भी रहती हैं, हर धुंधली सी राह के आगे, रोशनियाँ भी बहती हैं। ये मौसम भी कहता जैसे— रुकना नहीं, बस चलते रहो, बादल चाहे जितने घने हों, अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो। ~ फ़िज़ा

ये पकोड़ों की महफ़िल

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  कुरकुरी सी हर अदा में, स्वाद का ऐलान है, ये पकोड़ों की महफ़िल भी क्या ग़ज़ब मेहमान है। मसालों की चादरों में लिपटा हर इक जज़्बात है, हर निवाले में छुपा जैसे दिल का अरमान है। अदरक की वो खुशबुएँ, हरी धनिया का साथ भी, इस सुनहरी थाल में मौसम बड़ा जवान है। चाय की प्याली मिले तो बात कुछ और ही बने, वरना ये तन्हा मज़ा भी अपने आप में शान है। फ़िज़ा कहे—ये स्वाद भी छोटी खुशी का जश्न है, ज़िन्दगी की भागदौड़ में ये सुकूँ की दास्तान है। ~ फ़िज़ा 

ये केक नहीं

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  लाल मखमली सी परतों में, छुपी कोई मीठी दास्तान है, हर तह में जैसे प्यार सजा, हर कौर में छोटा अरमान है। सफेद क्रीम की नरम चादर, जैसे बादल धरती छू आए, थोड़ी शरारत, थोड़ी मिठास, दिल को बच्चे सा बहलाए। कटते ही खुलते राज कई, परतों में यादें मुस्काती हैं, कुछ मीठे लम्हे, कुछ हँसती बातें, हर टुकड़े में जगमगाती हैं। ये केक नहीं बस स्वाद भर, जश्नों की प्यारी पहचान है, ज़िन्दगी भी शायद ऐसी ही— थोड़ी परतदार, पर मेहरबान है। ~ फ़िज़ा

नन्हा सा माली...

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  नन्हा सा माली बना, मुस्कुराता ये जनाब है, हाथों में गुलाबी पानी, क्या प्यारा इसका ख़्वाब है। गमले की छोटी दुनिया में, हरियाली का इंतज़ाम है, खुद तो है खिलौना मगर, पौधों से बड़ा लगाव है। चेहरे पे मासूमियत, जैसे कोई भोला जवाब है, पानी कम हो या ज़्यादा—बस दिल से पूरा हिसाब है। पत्थरों के बीच भी इसने, हरा सा जहाँ बसाया है, लगता है इस छोटे दिल में, बाग़ों का पूरा किताब है। फ़िज़ा भी देख मुस्काए, ये कैसी मीठी आदत है, इतना छोटा माली फिर भी, बाग़बानी में नवाब है। ~ फ़िज़ा

मैंने अपनी एक दुनिया

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ये सच है, मैंने अपनी एक दुनिया बसा ली है, चाँद सितारों की छाँव में खुद को सजा ली है। जहाँ शोर-ए-जंग से दूर है मेरा ये छोटा सा जहाँ, प्रकृति के घेरे में मैंने अपनी जगह बना ली है। इधर दुनिया जल रही है नफरत की ललकार में, उधर मासूमियाँ खोतीं—ये कैसी अंधी गली है। किसी के पास सब कुछ है, फिर भी खालीपन सा, किसी के पास छत नहीं—बस ज़मीं ही बिछा ली है। कोई कार में रातें काटे, कोई आसमान तले, ये फ़ासलों की सच्चाई दिल में उतर चली है। क्या कहें, किससे कहें, कौन सुनेगा यहाँ, हर आवाज़ जैसे खामोशी में ही ढल चली है। तो मैंने भी अपनी एक खामोश दुनिया चुन ली, चाँद सितारों संग ही अब मेरी ये हमसफ़र बनी है। हम सब ढूँढते फिरते हैं कोई सुरक्षित सा कोना, और खुद के ही अंदर कहीं दुनिया समा ली है। ज़िन्दगी भी अजीब है—एक बुलबुला सा सफ़र, पल में बनती-बिखरती, यही उसकी असली कली है। ~ फ़िज़ा 

वो भी क्या शाम थी..

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  वो भी क्या शाम थी, दिल में अजीब सा गुमान था, मैं भी चल पड़ी थी, वो भी कहीं रवाना था। उस पार मुझसे दूर, पर किसी के पास जा रहा था, फ़ासलों में छुपा जैसे कोई अपना सा अफ़साना था। रूठा-सा, खामोश मगर, कदम बढ़ाता जा रहा था, लब चुप थे उसके, पर दिल में शोर पुराना था। मैं बस खड़ी सोचती रही, उस पल की गिरह में, क्यों जाना है उसे, जब लौट कर फिर आना था। शाम की उस धुंध में, कुछ सवाल रह गए यूँ ही, हर जुदाई में छुपा जैसे मिलने का बहाना था। ~ फ़िज़ा