Tuesday, April 07, 2020

इंतज़ार रहता है मुझे उसका




इंतज़ार रहता है मुझे उसका 
जिसे हर कोई देखता है तख्ता 
जो शायद है गुमशुदा खुद भी 
रखता है मुझे भी जुदा -जुदा  
प्यार करने की कोई हद्द नहीं 
प्यार करनेवालों को मिलाने 
जान उसकी भी कोई हद्द नहीं 
गुमशुदा हो हुए जाते हैं हमसे 
दूर-दूर से खबरें आतीं हैं उसके 
चाहतों के रास्ते कभी कम नहीं 
दुआओं की भी कमी होती नहीं 
देखलो आज उनको जी भरके 
वो गुल से गुलिस्तां हुए जाते हैं 

~ फ़िज़ा 

Monday, April 06, 2020

ये पल भी गुज़र जायेंगे ऐसे !



रोशनी जो दबी रही हलकी-हलकी सी 
हौसला देती रही बादलों के दायरे से  
लगा शायद कहीं बादलों से गिरेंगी बूँदें 
जब पंछींयों को भी देखा पनाह लेते हुए 
कुछ देर सोच ने घेर रखा था यूँही मुझे 
शायद किसी और सोच से बचाना था 
पंछियों के घर-बेघर होने की बात से 
जब देखा चुभती हुई किरणें गगन से 
आँखों को चकाचौंद करते हुए रोशन 
एक नयी आशा की किरण जैसे मन में 
बादलों के बीच से निकलकर आयी धुप 
ये कहने के ये पल भी गुज़र जायेंगे ऐसे ! 

~ फ़िज़ा 

Sunday, April 05, 2020

ख़ुशी हमेशा अपने अंदर है




बहुत दिनों की बात है 
अक्सर बचपन साथ है 
कभी बचपन के बीते दिन 
बचपन में परिवार संग 
कुछ रीती-रिवाज़ जो 
बनी हमारी आदतें तो 
कुछ अनुशासन बनकर 
जीवन में आजतक रहे 
काम की मसरूफियत 
कभी आलस की वजह 
साथ कभी होने न पाए 
घर से बाहर सैर पर 
सब निकलते घूमते 
मगर घर के अंदर कभी 
एक साथ बैठकर खाना 
एक साथ बैठकर खेलना 
नसीब नहीं होता हरपल 
मगर देख लो ! अब सब 
करोना की महामारी से 
नियम का पालन करते
घर पर सिमित जब रहे 
तो हर कोई परिवार में 
अपनों के संग हरपल 
बिताये सारा दिन एक साथ  
कभी कैरम खलेते तो 
कभी लूडो मोनोपोली 
गर इन सबसे ऊब गए 
तो साथ वाकिंग पर चलते 
उठना-बैठना वो भी प्यार से 
मानों प्रकृति खुद कहने लगी 
क्या भूल गए वो दिन?
बुरा ही सही मगर फिर भी 
करोना के शुक्र तो सभी है 
जो एक-दूसरे को साथ लायी 
पुराने सिलसिलों को दोहराने 
याद कराने जैसे चली आयी 
यही उम्मीद है के ये सीख 
करोना की बदौलत रखें याद 
ख़ुशी हमेशा अपने अंदर है 
बाहर तो केवल भटकते हैं 


~ फ़िज़ा 

Saturday, April 04, 2020

करोना की भारी बंदिशें



मौसम की हलकी बूँदें 
करोना की भारी बंदिशें 
अरमान होते नहीं कभी पूरे
खवाब ही सही खवाब के 
बादलों की उदास साजिशें 
मगर दिल की आजमाइशें 
इन सभी की हो रही रंजिशें 
मगर मोहब्बत का क्या है  
हर तरफ गुलाबी-गुलाबी 
कब पूरी होतीं हैं गुंजाइशें 
जब बुलंद हैं आजमाइशें 
करोना लाये नयी बंदिशें !

~ फ़िज़ा 

Friday, April 03, 2020

मन का अँधेरा



दिया जलाकर उसने 
अँधेरा लाख मिटाना 
चाहा,
कहीं से तो रौशनी 
आये तो किस्मत का 
हो खुलासा,
मगर बाहर का अँधेरा 
मिटाकर उजाला भी 
किया तो,
उस अँधेरे का क्या 
जो अन्दर से अन्धकार 
में है ढला !

~ फ़िज़ा 

Thursday, April 02, 2020

करोना मेरी किस्मत


उसको मैं तकता रहा यूँही 
लगा सालों बीत गए यूँही 
दिल के अरमान रहे जवां 
बस ख्यालों में जुड़ा रहा 
हर पल रहा उसके संग 
उठता-बैठता ख्यालों में 
एक पल भी न रहा दूर 
फिर ख़याल आया मुझे 
क्यों न प्रोपोज़ ही करदूँ 
यही सोचते-सोचते मैंने 
बात उससे करने की ठानी 
बस इसी ख़याल में था मैं 
के कोरोना ने मेरा ये सपना 
साकार होने से रोक दिया 
अब न वो दिखती है मुझे  
और न ही उसकी वो चमक 
क्यूंकि हरदम वो उस मुये 
मास्क से चिपकी रहती है ! 

~ फ़िज़ा  

Wednesday, April 01, 2020

केवल इंसान हैं


ज़िन्दगी चाहती क्या है ?
कुछ भी तो नहीं हमसे 
फिर भी जाने क्यों बोझ 
ढोये चलते हैं हम इंसान 
सामान पुराना कांधों पर
फिर ग़मों का क्यों न हो 
अहंकार का ही क्यों न हो 
हम बोझ ढाये जाते हैं और 
फिर एक महामारी आती है 
और सबको, सभी को वो 
अपनी औकात दिखाती है 
केवल इंसान हैं जो सिर्फ 
जी कर मर सकते हैं !

~ फ़िज़ा 

Sunday, March 29, 2020

देखो न छूना न मुझे यूँही तुम


देखो न छूना न मुझे यूँही तुम 
कहीं प्यार के बहाने दे न दो 
मुझे कुछ तोहफे में वायरस
जो  मुझे रखे दूर तुम से भी 
और मेरे सभी अपनों से भी  
मैं भी खो  दूँगी मेरा सवेरा 
मेरा आसमान ज़मीन साया 
खुदा आज़ादी कारण्टीन से 
कहीं आजीवन बंदी न बना दे 
हुज़ूर मेरे तस्सवुर की कसम है 
मुझे ख़यालों में चाहो दिल में
मगर छुओना इस कदर के मैं 
रहूं  दूर  इस  जहाँ से भी और 
जाऊ यूँही बिना वजह हुज़ूर  !

~ फ़िज़ा 

Saturday, March 21, 2020

आओ संग दूर बहुत दूर हमें जाना है


दूर बहुत दूर मुझे जाना है 
बादलों के उस पार जाना है 
सफर लम्बा है मगर हौसला है 
कठिन रास्ते दूर मंज़िल जाना है 
ज़िन्दगी के खेल में चलते जाना है 
संग साथ हों तो सफर चल जाना है 
आओ संग दूर बहुत दूर हमें जाना है 

~ फ़िज़ा 

Tuesday, March 17, 2020

कॅरोना ने आज सभी को ज़ब्त कर लिया


बचपन में सुनी थी कई कहानियां 
कभी नानी कभी मासी की ज़ुबानियाँ 
जब पड़ा  पृथ्वी पर ज़ुल्म की बौछारियाँ  
और कई कारणवश हुए भी बरबादियाँ 
तब निःसंवार करने पैदा हुए अवतरणियां 
काल का क्या बदलना है समय के साथ 
और इंसान की बदलती नियति के समक्ष  
बिगड़ने लगा संतुलन और संयम प्रकृति का 
एक बलवान रूप विषाणु हुआ पैदा इस बार 
लगा मचलाने इंसान को हर कोने-कोने पर 
रंगीला, फूलों सा सुन्दर खिला-खिला सा 
नाम जिसका कॅरोना लगे हैं मोहब्बत सा 
किसी के छूने से तो छींख से जकड ले ये 
कमसिन मोहब्बत का बुखार हो किसी का 
जो चढ़े तो फिर आग का दरिया सा ही लगे 
पार जिसने भी लगाया जान लेकर ही रहा है 
इंसान के अहंकार को प्रकृति की ललकार है 
बहुत ऊँचा न उड़ रख तो डर किसी का नादाँ 
इंसान और प्रकृति में बढ़ गया अस्मंजसियां  
बिगड़ गया संतुलन प्रकृति और इंसान का 
 कॅरोना ने आज सभी को ज़ब्त कर लिया 
सिमित दीवारों के बीच जैसे कालकोठरियाँ 
फासले बनाये रखें सबसे सभी के दरमियाँ 
शुक्र है उसका जो जान गया और संभल गया 
जो न समझा है न समझेगा अपने गुरुर से 
वो भला कहाँ कभी किसी के काम आएगा
वक़्त हर किसी को परखता है हर पल हमेशा 
तू इंसान हैं, सुधर जा अब भी है तुझे ये मौका 
बिता वक़्त उस घर में उस परिवार संग अपने 
जिसे बनाते-बनाते उम्र गुज़र गयी साथ छूठ गए 
मौका है तू इसे अपना ले कॅरोना के बहाने ही सही 
इंसान तू, ज़मीन का है ज़मीन से ही जुड़ जा संभल जा !

~ फ़िज़ा 

Sunday, March 08, 2020

मेरे नन्हे फ़रिश्ते!


तुम्हारी चंचल अठखेलियों से 
वक़्त अच्छा गुज़र गया जैसे 
याद तो है मुझे, माँ तो हूँ वैसे 
मगर कब तुम संग खेलते ऐसे 
मैं रेह गयी बच्ची तुम संग जैसे 
जाने कब, तुम हुए तेरह के ऐसे 
बस आँखों के सामने ही जैसे  
देखते बढ़ गए वो नन्हे हाथ-पैर 
जल्दी ही छू भी लोगे मेरे काँधे 
और बढ़ भी जाओगे वहां से आगे 
थोड़ा धीरे बढ़ो, थोड़ा खेलने दो 
कुछ देर और मेरा बचपन सेहला दो 
मेरे नन्हे फ़रिश्ते!
तुम रहोगे सदा इस दिल में वही  
नादाँ, भोले, प्यारे सभी को भाते 
नन्हें राही ! जन्मदिन मुबारक हो!!!

~ फ़िज़ा 

इंतज़ार रहता है मुझे उसका

इंतज़ार रहता है मुझे उसका  जिसे हर कोई देखता है तख्ता  जो शायद है गुमशुदा खुद भी  रखता है मुझे भी जुदा -जुदा   प्यार करने की...