कुछ शामें हमें यादों के उस सफ़र पर ले जाती हैं, जहाँ बचपन आज भी साँस लेता है… ❤️📚
पिछले सप्ताहांत मलयालम के सुप्रसिद्ध लेखक ज़कारिया जी से मिलना किसी Déjà vu से कम नहीं था। ऐसा लगा, जैसे वक़्त की सुइयाँ पीछे घूम गई हों और मैं फिर से अपने स्कूल के दिनों में पहुँच गई हूँ। मुझे याद है, स्कूल में जिन लेखकों की रचनाएँ पढ़ाई जाती थीं, उनके परिचय में सबसे पहले यह देखती थी कि वे जीवित हैं या नहीं! मन में उत्सुकता होती थी कि जिनकी रचनाएँ हम पढ़ रहे हैं, उनसे कुछ सवाल पूछे जाएँ। फिर शुरू होता था पत्र लिखने का सिलसिला। और जब कभी उनके जवाब इनलैंड लेटर में मिलते, तो वह खुशी शब्दों में बयाँ करना मुश्किल था। सोचिए, अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़े किसी लेखक का ख़ुद जवाब मिलना कितना रोमांचक अनुभव रहा होगा! वे पत्र हमारे लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थे। ज़कारिया जी से मिलकर वही पुरानी अनुभूति फिर से जीवंत हो उठी। फ़र्क़ बस इतना था कि इस बार सवाल पूछने के लिए न पत्र लिखने की ज़रूरत थी, न जवाब का इंतज़ार करने की। लेखक हमारे सामने थे, और हम उनसे सीधे संवाद कर सकते थे। सच कहूँ तो मैंने उनकी किताबें अभी तक नहीं पढ़ी हैं, क्योंकि उनकी अधिकांश रचनाएँ मलयालम में हैं। मैं मलयालम बोल और...