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युद्ध की पाठशाला

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  बचपन में स्कूल की किताबों में युद्ध के किस्से पढ़े थे हमने— ख़ून, तबाही, और इंसानियत की हार के अध्याय। इतिहास था वो— बीते ज़माने की सीख, जहाँ अध्यापिका कहती थीं— “इतिहास से सीखो, ताकि वही ग़लतियाँ दोहराई न जाएँ।” पर आज— वही पन्ने जैसे फिर खुल गए हैं। तब भी थे नाम— इंडिया-पाकिस्तान, अमेरिका-इराक, इज़राइल-फ़िलिस्तीन। और आज— रूस-यूक्रेन, फिर अमेरिका-ईरान। कहाँ गए वो लोग जो इतिहास पढ़ते और पढ़ाते थे? क्यों नहीं कोई इनके कान खींचकर सीखाता इन्हें— कि ये ग़लत है! ये खेल नहीं— इंसानियत का अंत है, वंशजों के लिए दर्दनाक विरासत है। क्यों नहीं कोई कहता— गरीबी मिटाओ, लोगों को जीने दो एक सादा, सुकून भरा जीवन। ये कैसी दुनिया है— जहाँ सब जानते हैं क्या सही है, क्या ग़लत, फिर भी युद्ध छिड़ते हैं, लोग मरते हैं। कान सुन्न हो गए हैं, आँखें जैसे मर चुकी हैं— अब कोई चीख़, कोई तबाही हमें चौंकाती नहीं। हम इंसान हैं— या अंदर से शैतान? या फिर ज़िंदा लाश बन चुके हैं? क्यों नहीं कोई इन नेताओं को भी प्रिंसिपल के दफ़्तर ले जाए, सज़ा दे— ताकि वे समझें क्या होता है दर्द। ताकि एक दिन— इस युद्धग्रस्त द...

ये इश्क़ चाँद से

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  ज़िंदगी की चाह ने कुछ ऐसा कर दिया है, चाँद को बचपन से ही अपना हमसफ़र बना लिया है। किसी की दोस्ती का हो या न हो एहसास, चाँद के  मोहब्बत ने रूह तक छू लिया है। बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन, हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है। आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे, लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है। उम्मीद है एक दिन वो खुद चले आएगा यहाँ, जैसे मैं हर गली-नुक्कड़ उसका पीछा करती आई हूँ। ‘फ़िज़ा’ ये इश्क़ चाँद से यूँ ही नहीं हुआ, हर रात उसे देखकर दिल को समझा लिया है। ~ फ़िज़ा 

कली ने लिया था नूर

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  नाज़ों से जो लाए थे हम एक गमला-ए-हयात, वक़्त ने सिखाया कि सब्र ही असली ज़ात। पत्तों में भी छुपा होता है इक राज़-ए-रहमत, हर ख़ामोशी में होती है ख़ुदा की कोई बात। माली बनकर करते रहे हम ख़िदमत-ए-इश्क़, पानी भी, दुआ भी दी—बस वही थी हमारी सौग़ात। जब दिल ने छोड़ दी थी हर उम्मीद-ए-बहार, तब रब ने चुपके से दिखलाई अपनी करामात। बैंगनी फूलों में जो कली ने लिया था नूर, ‘फ़िज़ा’ समझ आई—सब्र में ही है उसकी मुलाक़ात। फ़िज़ा 

जीते रहो।

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  ज़िंदगी— कोई किताब नहीं जो एक बार पढ़ ली और सब समझ आ गया। हम सोचते थे— स्कूल, कॉलेज, डिग्री… बस, यहीं तक है सीखना। लेकिन— ज़िंदगी ने सिखाया, कि असली क्लासरूम तो हर दिन है। हर गिरना— एक लेसन। हर संभलना— एक जवाब। हम बड़े तो हो गए— पर समझदार? अभी भी बन रहे हैं। और हाँ— ये सफ़र रुकता नहीं… जब तक साँस है, सीखना जारी है। मंज़िल? शायद मौत। पर तब तक— सीखते रहो, जीते रहो। ~ फ़िज़ा 

मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर !

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  कभी हाथों में समा जाते थे तुम नन्हे से हर रास्ते, आज गोद में भी न समाओ — बड़े हो गए हर रास्ते। माँ का दिल तब भी धड़कता था फ़िक्र के साये में, कहीं भूल न हो जाए मुझसे इस डर में हर रास्ते। मुत्तासी हँसकर कहती थी मेरी चिंता सुनकर, “बच्चे एक से ही होते हैं दुनिया में हर रास्ते।” सबसे छोटे थे तुम घर के प्यारे आँगन में, लाड़-प्यार भी बरसा तुम पर खुलकर हर रास्ते। पर तुमने कभी उस स्नेह का अभिमान न किया, सादगी ही रही तुम्हारे स्वभाव में हर रास्ते। खुश रहो सदा, किसी को दुःख न देना जीवन में, इंसानियत का हाथ बढ़ाना तुम भी हर रास्ते। 'फ़िज़ा' की दुआ है माँ के दिल की गहराइयों से, मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर हर रास्ते। ~ फ़िज़ा 

अदा है उसकी ..!

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  ज़िन्दगी है या ज़िंदादिली — अदा है उसकी, दोस्ती है या दोस्ताना — वफ़ा है उसकी। मुस्कराहट से जगमग करता हर एक चेहरा, नवदीप सी रोशन हर दिशा है उसकी। न केवल परिवार को प्रेम से जोड़े, दोस्तों में भी अलग ही जगह है उसकी। आओ आज नवी को दिल से हम मनाएँ, जन्मदिन की घड़ी को यादगार बनाएँ। दुआओं से भर दें हम उसकी ज़िंदगानी, खुशियों के फूल हर राह में सजाएँ। ~ फ़िज़ा 

सीमा !!

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 हर चीज़ की एक सीमा होती है— अच्छाई की भी, बुराई की भी, ख़ूबसूरती और बदसूरती की भी। सुनने की, देखने की, सहने की भी एक हद होती है। हर इंसान के भीतर एक ख़ामोश रेखा खिंची होती है। किसी को हक़ नहीं कि वह शब्दों से ज़ख़्म दे, सलाह के नाम पर चोट करे, या ऊँची आवाज़ को ताक़त समझे। कहते हैं न— ज़्यादा मिठास भी कभी-कभी कड़वी हो जाती है। सभ्य होने का मतलब यह नहीं कि कोई आपको शासित करे। नर्मी भी एक शक्ति है। और कभी-कभी— चले जाना, छोड़ देना, सबसे बड़ा साहस होता है। ~ फ़िज़ा