Wednesday, January 08, 2020

हिंसा नहीं आवाज़ से विरोध करते हैं !



सहने को तो लोग यूँ भी दर्द सहते हैं
एक हद्द से ज्यादा हो तो काट देते हैं 
इलाज़ भी देखिये कभी ऐसा होता है !
जुल्म का आलम देखिए कैसा होता है 
सहते तो सब हैं मगर उसकी भी हद्द है 
हिंसा नहीं आवाज़ से विरोध करते हैं !
जानें, शासन करने वाला भी इंसान हैं 
शासन में लाने वाला भी इंसान ही है 
देखिये,एकता में सत्ता पलटने की ताक़त है !
अनपढ़ शासक अन्धविश्वास जैसा है 
सच को छुपाना और सब बहकावा है 
पढ़े-लिखे बेहके दुःख इसी बात का है !
वक़्त आगया अब एकजुट हो जाना है 
खुली आँख है मगर हकीकत दिखाना है 
खाली करो सिंहासन जनता को जगाना है !
इंसान बनकर इंसान को शासन करना है 
जब शासक ही शोषण करें तो डटना है 
निडरता से आज़ादी का नारा लगाना है !
हम देखेंगे किसका पलड़ा अभी भारी है 
क्रांति भी क्या इसी विरोध का चेहरा है 
अब बहुत हुआ, शासन नए नस्ल की है 
नयी सोच से सबका भला होना है !

~ फ़िज़ा

Sunday, December 22, 2019

क्यों न हम जानें प्यार की ज़ुबान


मुझे छूह लेतीं हैं उसकी यादें 
कुछ यूँ जिस तरह हवा में जल 
मेहकाते हुए उन पलों की यादें 
जैसे रेहतीं हैं खुशबु और फूल 
हो न हों अजीब मिलन की यादें 
के सिर्फ यादों से जी लें वो पल 
मानों अब भी हैं साथ उनकी यादें 
जैसे चाँद गगन में बीच में बादल 
खुली आँख इन यादों से लेकिन 
आँखों ने जो बस देखा वो दलदल 
लगे मोर्चे हर तरफ खून-खलबल  
मरने-मारने की धमकियों के बल 
मन हुआ जाता है प्यार से दुर्बल
जो जान से भी प्यारे साथी निर्बल 
आज लगे उगलने नफरत फ़िज़ूल 
क्यों न हम जानें प्यार की ज़ुबान 
है सभी के लिए सहज और सरल 
मिलजुल कर रहना था संस्कार कभी 
आज वोही सीखने आये लेकर ढाल 
धर्म-जाती का अंतर बताकर हाल 
क्यों सीखते नहीं देखकर गुलाल 
कई रंगों से भरे हैं न कोई मलाल 
क्यों इंसान भेद करे अपनों के संग 
मुझे छूह लेतीं हैं उसकी यादें 
कुछ यूँ जिस तरह हवा में जल 
मेहकाते हुए उन पलों की यादें 
जैसे रेहतीं हैं खुशबु और फूल 

~ फ़िज़ा 

Wednesday, December 18, 2019

जाग उठ कहीं बहुत देर न हो जाये



कौन हैं हम कहाँ से आये हैं 
क्या लेकर आये हैं साथ हम 
जो आया है वो जायेगा भी 
न कुछ तेरा है न ही कुछ मेरा 
किस हक़ से मैं लूँ ये जगह 
दिया नहीं मुझे किसी ने ये 
कौन हूँ मैं तुझे हटाऊँ यहाँ से 
जब ये धरती है हर किसी की 
न सूरज न चाँद बांटे आसमां 
न पेड़-पौधे न पशु-पक्षियां 
सभी रहते  मिल-जुलकर 
फिर हम इंसान को क्या हुआ ?
जो अधिकार जताने लगे यहाँ 
धर्म के नाम पर तो देश के नाम 
कहाँ से आये कहाँ ले जाएंगे सब 
इंसान कब आएगा इंसान के काम 
कब वो करेगा एक दूसरे से प्यार 
कब वो समझेगा अपनी सीमाएं 
इंसान कब करेगा इंसान से प्यार 
छोड़कर नफरत की दहशत की 
फितरत ये इंसान की अहंकार की  
खुद से खुदा हो जाने की ग़लतियाँ 
जाग उठ कहीं बहुत देर न हो जाये 
के पछताने के लिए भी न रहे समां !

~ फ़िज़ा 

Monday, December 16, 2019

फिर से बनाते हैं चाहतों का सुरूर यूँही !



जो चाहा था ज़िन्दगी भर वो मिला नहीं 
जो मिला उसी से चाहत पूरी करनी चाही 
मगर वो चाहत रखनी भी ठीक लगी नहीं 
सोचते रहते हैं उम्र भर क्या करें क्या नहीं 
ज़िन्दगी घुमाकर ले आयी फिर उसी डगर 
अब जाएं तो जाएं किधर जब वक्त नहीं 
समय का पलड़ा है बहुत भारी अभी भी 
वक्त है कम, गर साथ दो तो चलो कहीं 
फिर से बनाते हैं चाहतों का सुरूर यूँही 
चल पड़ेगी हमारी रही-सही हयात वहीँ 

~ फ़िज़ा 

Friday, November 29, 2019

ढूंढ़ने निकला हूँ मैं अपने ही सफर में खुद को !


ढूंढ़ने निकला हूँ मैं अपने ही सफर में 
खुद को !
बदल जाती हैं मेरी राहें दूसरों  के सफर में 
खुद को भुलाकर उस राह निकल गया मैं 
कभी किसी के तो कभी किसी को सफर में 
पहुँचाने के बहाने ही सही अपनी राह से हुआ 
बेखबर !
ढूंढ़ने निकला हूँ मैं अपने ही सफर में खुद को !
क्यों मैं भटक जाता हूँ अपने ही सफर से फिर
लगता है जैसे मेरा होना शायद है इसी के लिए  
किसी के लिए बनो सहारा तो किसी को दो यूँही 
हौसला !
ढूंढ़ने निकला हूँ मैं अपने ही सफर में खुद को !
कहाँ हैं मेरे ख्वाबों का वो कम्बल जिसे पहने 
होगये बरसों मगर कभी यूँही हिंडोले लेता हुआ 
कभी -कभी कर जाते हैं मेरे होने न होने का ये 
एहसास !
ढूंढ़ने निकला हूँ मैं अपने ही सफर में खुद को !

~ फ़िज़ा 

Thursday, November 07, 2019

जन्मदिन तुम अच्छी रही आज !



आज का दिन भी बड़ा सुहाना था 
हर दिन की तरह प्यार मोहब्बत
इन्हीं सब चीज़ों से भरा पड़ा था 
कितने ही पन्ने किताबों के पढ़ लो 
सफ़ा नयी कहानी नये सिरे से था 
दिल किसी अल्हड की तरह फंसा 
२०-२१ की उम्र-इ-दराज़ पर और 
सफ़ा बड़ी रफ़्तार के संग पलटता 
मगर यहाँ किसको पड़ी है जल्दी  
हमें तो अल्हड़पन का है नशा अभी 
कल जब आये देखेंगे उस कल को
आज को दबोचलें बाँहों में कसके  
गुज़रते लम्हों को सेहलाते मचलाते 
ज़िन्दगी बस यूँही चल गुन -गुनाते 
मस्ती में गाते नाचते झूमते इठलाते 
फ़िज़ा मस्ती में अभी और महकते 
जन्मदिन तुम अच्छी रही आज मुझ से !

~ फ़िज़ा 

Monday, October 28, 2019

दिवाली की हसीन रात है



दिवाली की हसीन रात है 
लालटेन से निकलती रौशनी 
घर के अंधेरों को चीरती हुई 
परिवार को संग रखती हुई 
दीप जलाने की अनुमति नहीं 
आँधियाँ करती है गुस्ताखियाँ 
संग ले जाने की देती हैं धमकियाँ 
उड़े लपटें आग की मशाल बनकर 
जलाकर ध्वंस इंसान का अहम् 
सीखाती है सभी को संयम नम्रता 
कहती है इंसान से आँख मिलाकर 
'तू नहीं किसी से बड़ा, न तेरा धन 
न ही कोई औदा सब है प्रकृति से कम'!! 

#happydiwali #humilitycheck 
#behuman #youcantbeatnature 
#agreeyouarehumanonly

~ फ़िज़ा 

Sunday, September 15, 2019

ढाई अक्षर प्यार के - भाषा


मुझे कुछ कहना है तुमसे 
कहूं तो कैसे 
क्या समझ पाओगे ऐसे 
बोली तो नहीं जानते 
फिर इशारों से ही जैसे 
कहा दिया हाल दिल का 
अब हैं एक दूसरे की बाहों में 
आये अलग जगहों से 
मिले एक किनारे 
बोली जो भी हो अपनी 
भाषा प्यार की समझे 
आज बोल भी लेते हो 
क्यूंकि प्यार जो है मुझसे 
मुझे कुछ कहना है तुमसे 
कहूं तो कैसे 

~ फ़िज़ा 
#हिंदीदिवस #१४सितम्बर१९४९ 

Sunday, July 21, 2019

बस इंतज़ार है के कब दीद हो रंगीन फ़िज़ा में !!



किसी के रहते उसकी आदत हो जाती है 
उसके जाने के बाद कमी महसूस होती है !
हर दिन के चर्ये का ठिकाना हुआ करता है  
अब जब गए तो राह भटके से ताक रहे हैं !
जब साथ रहते हो तब उड़ जाते हैं हर पल
अब काटते नहीं कटते ठहर गए सब पल ! 
महसूस हो गया है तुम्हारे रहने और न रहने में 
बस इंतज़ार है के कब दीद हो रंगीन फ़िज़ा में  !!

~ फ़िज़ा 

Sunday, July 14, 2019

ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?


ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?
जब ज़िन्दगी ही कुछ न कर सके 
बहती धारा की तरह निकलती है 
सरे आम घूम-घाम कर बढ़ती है 
और देखो तो ज़िंदगी मझधार में 
सीखा देती है अपने और पराये 
अपने होते हैं कम होते हैं और 
पराये करीब अपने से लगते हैं
क्यों ज़िन्दगी ऐसा सब सीखाती 
मगर सोचने पर मजबूर करती है 
ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?
जब सोचा था नहीं पड़ना है कहीं 
झमेलों से बचना है आगे बढ़ना है 
जिसे जो चाहे वो ले लेने दो उसे 
न भावनाओं में बेहना है किसी के 
न ही किसी का उद्धार करना है 
अपना जीवन जी लो तो बहुत है 
न मुसीबत को मोलना न झेलना 
जिनसे भी मिलना मिलनसार रहना 
अकेले आये हो अकेले चले जाना 
ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?

~ फ़िज़ा  

Friday, July 05, 2019

कल चौदहवीं की रात नहीं थी, मगर फिर भी!!!!



कल श्याम कुछ थकी थकी सी थी 
कल पटाखों से भरा आसमान था 
जाने -अनजाने लोगों से मुलाकात 
फिर घंटों बातें और सोच में डूबे रहे 
वक़्त दौड़ रही थी और हम धीमे थे 
चाँद श्याम नज़र तो आया था मुझे 
पर रात तक तारों के बीच खो गया 
मगर मोहब्बत की लौ जला चूका था 
रात निकल रही थी कल के लिए और 
हम अब भी सिगार सुलगाते बातें करते 
वो मेरे पैर सहलाता बाते करते हुए 
बीच-बीच में कहता 'I love you'
midnight का वक़्त निकल गया 
मगर यहाँ किसे है कल की फ़िक्र 
घंटों मोहब्बत और भविष्य की बातें
और फिर तारों को अलविदा कर 
चले एक दूसरे की बाहों में सोने 
लगा तो था अब नींद में खो जायेंगे 
मगर दोनों एक दूसरे में ऐसे खोये  
काम-वासना-मोहब्बत-आलिंगन 
की इन मिश्रित रंगों में खोगये 
समझ नहीं आया रात गयी या 
सेहर ठहर सी गयी !!!

~ फ़िज़ा  

हिंसा नहीं आवाज़ से विरोध करते हैं !

सहने को तो लोग यूँ भी दर्द सहते हैं एक हद्द से ज्यादा हो तो काट देते हैं  इलाज़ भी देखिये कभी ऐसा होता है ! जुल्म का आलम देखिए कै...