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मैंने अपनी एक दुनिया

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ये सच है, मैंने अपनी एक दुनिया बसा ली है, चाँद सितारों की छाँव में खुद को सजा ली है। जहाँ शोर-ए-जंग से दूर है मेरा ये छोटा सा जहाँ, प्रकृति के घेरे में मैंने अपनी जगह बना ली है। इधर दुनिया जल रही है नफरत की ललकार में, उधर मासूमियाँ खोतीं—ये कैसी अंधी गली है। किसी के पास सब कुछ है, फिर भी खालीपन सा, किसी के पास छत नहीं—बस ज़मीं ही बिछा ली है। कोई कार में रातें काटे, कोई आसमान तले, ये फ़ासलों की सच्चाई दिल में उतर चली है। क्या कहें, किससे कहें, कौन सुनेगा यहाँ, हर आवाज़ जैसे खामोशी में ही ढल चली है। तो मैंने भी अपनी एक खामोश दुनिया चुन ली, चाँद सितारों संग ही अब मेरी ये हमसफ़र बनी है। हम सब ढूँढते फिरते हैं कोई सुरक्षित सा कोना, और खुद के ही अंदर कहीं दुनिया समा ली है। ज़िन्दगी भी अजीब है—एक बुलबुला सा सफ़र, पल में बनती-बिखरती, यही उसकी असली कली है। ~ फ़िज़ा 

वो भी क्या शाम थी..

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  वो भी क्या शाम थी, दिल में अजीब सा गुमान था, मैं भी चल पड़ी थी, वो भी कहीं रवाना था। उस पार मुझसे दूर, पर किसी के पास जा रहा था, फ़ासलों में छुपा जैसे कोई अपना सा अफ़साना था। रूठा-सा, खामोश मगर, कदम बढ़ाता जा रहा था, लब चुप थे उसके, पर दिल में शोर पुराना था। मैं बस खड़ी सोचती रही, उस पल की गिरह में, क्यों जाना है उसे, जब लौट कर फिर आना था। शाम की उस धुंध में, कुछ सवाल रह गए यूँ ही, हर जुदाई में छुपा जैसे मिलने का बहाना था। ~ फ़िज़ा

महिला आरक्षण की लौ

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  संसद की दीवारों में गूँजी एक नई सी बात, बराबरी के शब्दों ने छेड़ी फिर से नई शुरुआत। महिला आरक्षण की लौ जली, उम्मीदों का आसमान, पर इसके साये में चलता रहा राजनीति का भी गान। वोटों की गिनती में भी, सपनों का हिसाब हुआ, कभी समर्थन, कभी विरोध—हर रंग का इज़हार हुआ। कागज़ पर लिखे अधिकार, दिल तक कब पहुँचेंगे, ये सवाल अब भी गलियों में धीमे-धीमे गूंजेंगे। नारी की शक्ति कोई नया अध्याय नहीं, वो तो हर दौर में रही—बस पहचान नई। ये बिल एक दरवाज़ा है, मंज़िल नहीं अभी, सफ़र लंबा है आगे, राहें आसान नहीं। सत्ता के गलियारों में चाहे कितनी भी चालें हों, हर आवाज़ के पीछे सच्चाई की मशालें हों। जब नीयत साफ़ होगी, तब बदलाव सच होगा, वरना हर वादा बस एक और शब्द होगा। फिर भी उम्मीदों की डोर थामे चलती नारी, हर संघर्ष में खुद को फिर से लिखती नारी। कानून से आगे बढ़कर जब सोच बदलेगी, तभी ये आज़ादी सच में हर घर तक पहुँचेगी। ~ फ़िज़ा

ओ चाँद

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  चाँद की ये आधी सी मुस्कान, जैसे कोई अधूरी सी जान। खामोशी में भी कितनी बातें, हर रात मुझे ये समझाए। काली रात की गोद में सिमटा, सफेद सा ये कोमल नूर, दूर होकर भी कितना अपना, जैसे दिल के सबसे पास हुज़ूर। तेरी ये आधी सी झलक ही, मेरे पूरे ख्वाब सजा जाती है, ओ चाँद, तू पूरा हो या आधा, मेरी दुनिया तो तुझसे ही जगमगाती है। तेरे दाग भी मुझे प्यारे हैं, तेरी खामोशी भी गीत लगे, तू बोले ना फिर भी हर पल, मुझसे अपनी प्रीत कहे। मैं भी तेरी तरह अधूरी, तू भी मुझ सा थोड़ा सा, शायद इसी अधूरेपन में ही, हमारा रिश्ता है पूरा सा। ~ फ़िज़ा 

ये मतवाला।

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  माइक हाथ में, अंदाज़ निराला, स्टेज पे आते ही छा गया ये मतवाला। बात शुरू करे तो हंसी रुकती नहीं, सीरियस दिखे, पर बातें होती सीधी नहीं। थोड़ा सोचकर, फिर पंचलाइन गिराते, लोग हंस-हंस कर आंसू तक बहाते। चेहरे पे सादगी, दिमाग में तूफ़ान, हर लाइन में छुपा होता मज़ेदार सामान। ये कोई आम इंसान नहीं जनाब, हंसी का चलता-फिरता इंतज़ाम है ये ख़ास। ~ फ़िज़ा 

गरम-गरम डोसे

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  गरम-गरम डोसे में लिपटी सी कहानी, छोटी-छोटी खुशियों की ये प्यारी निशानी। कुरकुरी सी परत में छुपा सुकून सा एहसास, हर निवाले में जैसे मिल जाए दिल को विश्वास। नारियल की चटनी सी सादगी भरी बात, सांभर की गर्माहट में अपनापन साथ। केले के पत्ते पर सजा ये सादा सा स्वाद, भीड़ भरी दुनिया में जैसे अपना सा संवाद। कुछ पल ठहर कर, बस यूँ ही मुस्कुरा लेना, हर छोटे लम्हे में भी ख़ुशी को पा लेना। ज़िन्दगी भी शायद ऐसी ही थाली है, सादा, रंगीन—और हर स्वाद में निराली है। ~ फ़िज़ा 

ये सुरों का वरदान है..

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  साड़ी की लहरों में सजी, सुरों का इक जहान है, हर थाप में धड़कता दिल, जैसे कोई अरमान है। हाथों की हर चोट में, एक लय का बयान है, ढोल की हर गूंज में, छुपा अपना पहचान है। मुस्कान में घुली हुई, रागों की मुस्कान है, हर सुर में बसता जैसे, जीवन का सम्मान है। ये सिर्फ़ ध्वनि नहीं, ये एक पुराना गान है, पीढ़ियों से बहता आया, ये सुरों का वरदान है। हर ताल में सजा हुआ, त्योहारों का सामान है, इस संगीत की धड़कन में, बसता पूरा जहान है। फ़िज़ा कहे इन सुरों में, उसका भी अरमान है, हर थाप में छुपा हुआ, दिल का एक बयान है। ~ फ़िज़ा