Thursday, November 07, 2019

जन्मदिन तुम अच्छी रही आज !



आज का दिन भी बड़ा सुहाना था 
हर दिन की तरह प्यार मोहब्बत
इन्हीं सब चीज़ों से भरा पड़ा था 
कितने ही पन्ने किताबों के पढ़ लो 
सफ़ा नयी कहानी नये सिरे से था 
दिल किसी अल्हड की तरह फंसा 
२०-२१ की उम्र-इ-दराज़ पर और 
सफ़ा बड़ी रफ़्तार के संग पलटता 
मगर यहाँ किसको पड़ी है जल्दी  
हमें तो अल्हड़पन का है नशा अभी 
कल जब आये देखेंगे उस कल को
आज को दबोचलें बाँहों में कसके  
गुज़रते लम्हों को सेहलाते मचलाते 
ज़िन्दगी बस यूँही चल गुन -गुनाते 
मस्ती में गाते नाचते झूमते इठलाते 
फ़िज़ा मस्ती में अभी और महकते 
जन्मदिन तुम अच्छी रही आज मुझ से !

~ फ़िज़ा 

Monday, October 28, 2019

दिवाली की हसीन रात है



दिवाली की हसीन रात है 
लालटेन से निकलती रौशनी 
घर के अंधेरों को चीरती हुई 
परिवार को संग रखती हुई 
दीप जलाने की अनुमति नहीं 
आँधियाँ करती है गुस्ताखियाँ 
संग ले जाने की देती हैं धमकियाँ 
उड़े लपटें आग की मशाल बनकर 
जलाकर ध्वंस इंसान का अहम् 
सीखाती है सभी को संयम नम्रता 
कहती है इंसान से आँख मिलाकर 
'तू नहीं किसी से बड़ा, न तेरा धन 
न ही कोई औदा सब है प्रकृति से कम'!! 

#happydiwali #humilitycheck 
#behuman #youcantbeatnature 
#agreeyouarehumanonly

~ फ़िज़ा 

Sunday, September 15, 2019

ढाई अक्षर प्यार के - भाषा


मुझे कुछ कहना है तुमसे 
कहूं तो कैसे 
क्या समझ पाओगे ऐसे 
बोली तो नहीं जानते 
फिर इशारों से ही जैसे 
कहा दिया हाल दिल का 
अब हैं एक दूसरे की बाहों में 
आये अलग जगहों से 
मिले एक किनारे 
बोली जो भी हो अपनी 
भाषा प्यार की समझे 
आज बोल भी लेते हो 
क्यूंकि प्यार जो है मुझसे 
मुझे कुछ कहना है तुमसे 
कहूं तो कैसे 

~ फ़िज़ा 
#हिंदीदिवस #१४सितम्बर१९४९ 

Sunday, July 21, 2019

बस इंतज़ार है के कब दीद हो रंगीन फ़िज़ा में !!



किसी के रहते उसकी आदत हो जाती है 
उसके जाने के बाद कमी महसूस होती है !
हर दिन के चर्ये का ठिकाना हुआ करता है  
अब जब गए तो राह भटके से ताक रहे हैं !
जब साथ रहते हो तब उड़ जाते हैं हर पल
अब काटते नहीं कटते ठहर गए सब पल ! 
महसूस हो गया है तुम्हारे रहने और न रहने में 
बस इंतज़ार है के कब दीद हो रंगीन फ़िज़ा में  !!

~ फ़िज़ा 

Sunday, July 14, 2019

ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?


ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?
जब ज़िन्दगी ही कुछ न कर सके 
बहती धारा की तरह निकलती है 
सरे आम घूम-घाम कर बढ़ती है 
और देखो तो ज़िंदगी मझधार में 
सीखा देती है अपने और पराये 
अपने होते हैं कम होते हैं और 
पराये करीब अपने से लगते हैं
क्यों ज़िन्दगी ऐसा सब सीखाती 
मगर सोचने पर मजबूर करती है 
ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?
जब सोचा था नहीं पड़ना है कहीं 
झमेलों से बचना है आगे बढ़ना है 
जिसे जो चाहे वो ले लेने दो उसे 
न भावनाओं में बेहना है किसी के 
न ही किसी का उद्धार करना है 
अपना जीवन जी लो तो बहुत है 
न मुसीबत को मोलना न झेलना 
जिनसे भी मिलना मिलनसार रहना 
अकेले आये हो अकेले चले जाना 
ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?

~ फ़िज़ा  

Friday, July 05, 2019

कल चौदहवीं की रात नहीं थी, मगर फिर भी!!!!



कल श्याम कुछ थकी थकी सी थी 
कल पटाखों से भरा आसमान था 
जाने -अनजाने लोगों से मुलाकात 
फिर घंटों बातें और सोच में डूबे रहे 
वक़्त दौड़ रही थी और हम धीमे थे 
चाँद श्याम नज़र तो आया था मुझे 
पर रात तक तारों के बीच खो गया 
मगर मोहब्बत की लौ जला चूका था 
रात निकल रही थी कल के लिए और 
हम अब भी सिगार सुलगाते बातें करते 
वो मेरे पैर सहलाता बाते करते हुए 
बीच-बीच में कहता 'I love you'
midnight का वक़्त निकल गया 
मगर यहाँ किसे है कल की फ़िक्र 
घंटों मोहब्बत और भविष्य की बातें
और फिर तारों को अलविदा कर 
चले एक दूसरे की बाहों में सोने 
लगा तो था अब नींद में खो जायेंगे 
मगर दोनों एक दूसरे में ऐसे खोये  
काम-वासना-मोहब्बत-आलिंगन 
की इन मिश्रित रंगों में खोगये 
समझ नहीं आया रात गयी या 
सेहर ठहर सी गयी !!!

~ फ़िज़ा  

परछाइयाँ



सवाल करतीं हैं मुझ से मेरी परछाइयाँ 
जवाब दूँ तो क्या सुनेंगी ये परछाइयाँ ?
कुछ कहते हैं बेजान होती हैं परछाइयाँ 
मौका मिले वहां पीछा करती परछाइयाँ 
कभी डराते पीछे-पीछे चलकर परछाइयाँ 
तो कभी हौसला दे आगे आकर परछाइयाँ 
समय के साथ-साथ ये बदलती परछाइयाँ 
कभी लम्बी तो कभी छोटी बनती परछाइयाँ 
फिर भी मुझ से करतीं सवाल ये परछाइयाँ 
कहो तो क्या कहूं मैं इनसे जो हैं परछाइयाँ 
जानतीं तो हैं ये सब साथ जो हैं परछाइयाँ 
सवाल करतीं हैं मुझ से फिर भी परछाइयाँ 
अब जवाब दूँ भी तो क्या दूँ ऐ परछाइयाँ ?

~ फ़िज़ा 

Tuesday, June 25, 2019

ज़िन्दगी का एकमात्र फार्मूला



आशा जानती थी हमेशा से 
ज़िन्दगी का एकमात्र फार्मूला 
अकेले आना और अकेले जाना 
रीत यही उसने पहले से हैं जाना 
मगर होते-होते वक्त लग गया 
माता-पिता बहिन-भाई-सहेली
वक्त इन्हें साथ ले चलता गया  
धीरे-धीरे सखियाँ और घरवाले 
सभी अपनी-अपनी जगह ठहरे   
और उसे जीवन साथी मिल गया  
चलते-चलते वक़्त याद दिलाता
अकेले आना और अकेले जाना है 
मगर तब भीड़ की आदत पड़ गयी 
तब तक ज़िन्दगी अकेली पड़ गयी !

~ फ़िज़ा 

Thursday, May 09, 2019

डट के रहना निडर होकर नज़रें मिलाना



हलकी सी ही सही राहत मिली मुझे,
गर्दिश में जब हों हमारे सितारे,
आँख से आँख मिलाकर जियो प्यारे 
लोग बुरे दिनों को याद ज़रूर दिलाएं 
मगर आप इन सब से न मुँह मोड़ें 
ग़म न कर किसीका जब खुद हादसों से गुज़रे 
डट के रहना निडर होकर नज़रें मिलाना 
के मौत से ज्यादा क्या गनीमत है और होना ?

~ फ़िज़ा 

Tuesday, April 30, 2019

केसरी रंग ये शाम की



केसरी रंग ये शाम की 
करती है बातें इशारे की 
कभी कहती है रुक जाओ 
के अभी ढलने में वक़्त है 
तो अभी ढल रही है शाम 
कल आने की लेती है कसम
इस जाने आने के सफर में 
इस ढलने में और बहलने में 
कितने अरमानों का आना 
कितने अंजामों का जाना 
हर रंग के रंगों में ढलकर 
देती है संदेसा बदलकर 
देख लो आज जी भरकर 
कल का रंग फिर नया होगा 
नए रंगों से नया श्रृंगार होगा 

~ फ़िज़ा 

Monday, April 29, 2019

अब कोई दर्द नहीं होता

मुझे अब कोई दर्द नहीं होता 
किसी बात का न लफ्ज़ का 
न किसी रवैये का नज़रअंदाज़ का 
मुझे जितना भी चाहो हराना 
मुझ से जितनी भी कर लो नफरत 
मेरी न करो इज्जत न इजाजत 
सामने होकर भी अनदेखा करलो 
कोई सवाल पर जवाब भी न दो 
मैं इन सब से आगे निकल गयी हूँ 
अब सबकुछ सुन्न सा पड़ गया है 
मुझे दर्द नहीं होता न ही कोई गिला
शायद तुम लाख कोशिश कर रहे हो 
अफ़सोस ये सब व्यर्थ है परिश्रम 
इसका एहसास दिलाया तुम्हीं ने 
और अब मैं आज़ाद हूँ हर ख़याल से 
अब कोई दर्द नहीं न आकांशा मेरी 
अब सब ठीक है और अत्यंत शांति है 


~ फ़िज़ा 

जन्मदिन तुम अच्छी रही आज !

आज का दिन भी बड़ा सुहाना था  हर दिन की तरह प्यार मोहब्बत इन्हीं सब चीज़ों से भरा पड़ा था  कितने ही पन्ने किताबों के पढ़ लो  सफ़...