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जन्मदिन मुबारक हो

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  मेरी प्यारी रिया, मेरी मुस्कान की वजह, तुम्हारे आने से ही तो रोशन हुई मेरी हर सुबह। तुम्हारी हँसी में बसता है मेरा सारा जहाँ, तुम्हारे हर ख्वाब में छुपा है मेरा अरमान। छोटी-सी उँगली थामे जब तुम चलना सीखी थी, आज वही बेटी मेरी, अपने पंखों से उड़ना सीखी है। हर साल के साथ तुम और भी खिलती जाओ, मेरी दुआ है—तुम्हारी ज़िन्दगी खुशियों से भर जाओ। जन्मदिन मुबारक हो मेरी जान, तुम हमेशा यूँ ही मुस्कुराती रहो—यही है मेरी पहचान। ~ माँ ❤️ ~ फ़िज़ा

ये चाय नहीं, एक रिश्ता है..

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  मिट्टी की कुल्हड़ में सजी, ये चाय नहीं एहसास है, पहली चुस्की में जैसे, घर लौट आने का विश्वास है। हल्की-सी भाप में घुली, माँ की रसोई की खुशबू, हर घूँट में मीठी यादें, और थोड़ी-सी बचपन की धूप। सड़क किनारे, ठंडी शाम, या सुबह की नींदी आँखें, ये कुल्हड़ वाली चाय हमेशा, दिल को अपने पास बुला ले। होठों से लगते ही जैसे, सारी थकान पिघल जाए, एक चुस्की और… फिर एक और, मन यूँ ही मुस्कुराए। मिट्टी की सोंधी महक में, छुपा है अपनापन सारा, ये चाय नहीं, एक रिश्ता है, जो हर बार लगे दोबारा। ~ फ़िज़ा

कप में सजी ये छोटी सी दुनिया

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  कप में सजी ये छोटी सी दुनिया, झाग में जैसे फूल खिला, हल्की-सी खुशबू कॉफी की, मन को चुपके से छू गई भला। संगमरमर की मेज़ पे रखी, ये प्याली कितनी प्यारी है, जैसे सुबह की पहली किरण, या माँ की मीठी फटकार सी न्यारी है। हर घूँट में है सुकून छुपा, जैसे घर की गर्माहट हो, थोड़ी-सी कड़वाहट भी इसमें, पर उसी में मिठास की आहट हो। पास रखी वो खाली कुर्सी, किसी अपने का इंतज़ार करे, या खुद से मिलने का मौका, कुछ पल दिल को उपहार करे। ये कॉफी नहीं, एक एहसास है, थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है, भागती दुनिया के बीचों-बीच, ये पल ही तो असली ठहराव है। ~ फ़िज़ा

हर दिल अपनी कहानी गाए।

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  नीले आसमान की चादर तले, शहर खड़ा है सीना ताने, ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच, नदी बहती अपने तराने। शांत जल में झलकती दुनिया, जैसे कोई सपना ठहर गया, लहरों की धीमी सरगोशी में, हर शोर कहीं बिखर गया। किनारों पर खड़ी ये इमारतें, वक़्त की कहानी कहती हैं, भागती ज़िन्दगी के बीच भी, एक ठहराव सा देती हैं। नावें जैसे ख्वाब तैरते, मंज़िल की ओर बढ़ती जाएँ, और ये पुल—रिश्तों सा कोई, दो किनारों को जोड़ते जाएँ। इस शहर में भी एक सुकून है, भीड़ में भी एक तन्हाई, जहाँ हर चेहरा अनजाना, पर हर नज़र में है गहराई। नीले गगन और हरे जल के बीच, ज़िन्दगी यूँ बहती जाए, शहर की इस चुप सी धड़कन में, हर दिल अपनी कहानी गाए। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, ये कैसा इसका फ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। दिल को हर किसी से जोड़ दे, ऐसी इसकी रवानी है, पास लाकर फिर सिखाती, दूरी ही असली कहानी है। जीना ही नहीं, जीने की चाह में हमें लालची बना देती, आदत पड़ते ही फिर ये, सबसे गहरी सीख सुना देती है। “अपनी राह खुद ही चुनो, औरों से थोड़ा जुदा रहो,” अकेले आए थे तुम यहाँ, अकेले ही मुस्कुरा के बहो। ये जीवन का खेल निराला, सबके अपने-अपने नियम हैं, यहाँ कोई किसी का सहारा नहीं, बस चलते अपने कदम हैं। उम्मीदों का बोझ न रखना, दिल को हल्का ही रहने दो, सुने कोई तो ठीक, न सुने—तो भी ख़ामोश ही रहने दो। न समझाने में उम्र गँवाओ, न किसी को मनाने में, ज़िन्दगी के रंग निराले हैं, बस खुद को पहचानने में। ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं, हर मोड़ नया अफ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। ~ फ़िज़ा 

हमेशा मुस्कुराती रहें।

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(09-08-1933 - 04-11-2026)   गीतों की मल्लिका आज खामोश सी हो गई, सुरों की वो रानी जैसे कहीं खो गई। जो हर दिल को छूती थी, हर एहसास जगाती थी, दुःख-सुख, हँसी-खुशी में, अपनी आवाज़ से सहलाती थी— आज वही धड़कन जैसे थम सी गई। जिसकी तान पर दुनिया झूमती रही बरसों, जिसकी नकल में भी लोग ढूँढते थे सरगमों के किस्सों, कॉमेडी के रंग में भी जिसकी गूँज थी शामिल, वो अनोखी आवाज़ आज हो गई है ख़ामोश, बेहद ग़मगीन। आशा ताई, आपका यूँ चले जाना दिल को चीर गया, बचपन से लेकर आज तक, हर पल आपने ही तो घेर लिया। आपकी आवाज़ ने हमें थामा, सँवारा, सहारा दिया, हर मोड़ पर, हर दौर में, जीने का एक सहारा दिया। आज बस वही आवाज़ है, जो हवाओं में गूँजती रहेगी, अजर-अमर बनकर हर दिल में यूँ ही बसती रहेगी। ये दुनिया है—यहाँ बिछड़ना तो हर किसी की कहानी है, एक-एक कर सबको जाना है, यही जीवन की रवानी है। पर दुआ है दिल से—जहाँ भी हों आप, सुकून में रहें, अपने सुरों की दुनिया में, हमेशा मुस्कुराती रहें। ~ फ़िज़ा 

“गम वॉल”

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  ये तब की बात है, जब आलस भी एक आदत था, मन भर जाने पर च्युइंग गम का यूँ दीवारों से रिश्ता था। दिन ढले तो दीवारें भर जातीं रंग-बिरंगे निशानों से, सुबह होते ही कोई आकर, उन्हें साफ़ करता अरमानों से। ये दिनचर्या चलती रही, लोग यूँ ही दोहराते गए, साफ़ करने वाले थकते रहे, पर हाथ न रुक पाए। धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई, बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई। जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा, लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा। आज भी चाहे शहर वाले इसे फिर से साफ़ कर जाएँ, पर अगले ही दिन ये दीवारें, फिर उसी रंग में रंग जाएँ। “गम वॉल” के नाम से अब ये दुनिया भर में जानी जाए, देखो आलस की ये कहानी, कैसे रंग नए दिखलाए। ~ फ़िज़ा