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ये केक नहीं

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  लाल मखमली सी परतों में, छुपी कोई मीठी दास्तान है, हर तह में जैसे प्यार सजा, हर कौर में छोटा अरमान है। सफेद क्रीम की नरम चादर, जैसे बादल धरती छू आए, थोड़ी शरारत, थोड़ी मिठास, दिल को बच्चे सा बहलाए। कटते ही खुलते राज कई, परतों में यादें मुस्काती हैं, कुछ मीठे लम्हे, कुछ हँसती बातें, हर टुकड़े में जगमगाती हैं। ये केक नहीं बस स्वाद भर, जश्नों की प्यारी पहचान है, ज़िन्दगी भी शायद ऐसी ही— थोड़ी परतदार, पर मेहरबान है। ~ फ़िज़ा

नन्हा सा माली...

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  नन्हा सा माली बना, मुस्कुराता ये जनाब है, हाथों में गुलाबी पानी, क्या प्यारा इसका ख़्वाब है। गमले की छोटी दुनिया में, हरियाली का इंतज़ाम है, खुद तो है खिलौना मगर, पौधों से बड़ा लगाव है। चेहरे पे मासूमियत, जैसे कोई भोला जवाब है, पानी कम हो या ज़्यादा—बस दिल से पूरा हिसाब है। पत्थरों के बीच भी इसने, हरा सा जहाँ बसाया है, लगता है इस छोटे दिल में, बाग़ों का पूरा किताब है। फ़िज़ा भी देख मुस्काए, ये कैसी मीठी आदत है, इतना छोटा माली फिर भी, बाग़बानी में नवाब है। ~ फ़िज़ा

मैंने अपनी एक दुनिया

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ये सच है, मैंने अपनी एक दुनिया बसा ली है, चाँद सितारों की छाँव में खुद को सजा ली है। जहाँ शोर-ए-जंग से दूर है मेरा ये छोटा सा जहाँ, प्रकृति के घेरे में मैंने अपनी जगह बना ली है। इधर दुनिया जल रही है नफरत की ललकार में, उधर मासूमियाँ खोतीं—ये कैसी अंधी गली है। किसी के पास सब कुछ है, फिर भी खालीपन सा, किसी के पास छत नहीं—बस ज़मीं ही बिछा ली है। कोई कार में रातें काटे, कोई आसमान तले, ये फ़ासलों की सच्चाई दिल में उतर चली है। क्या कहें, किससे कहें, कौन सुनेगा यहाँ, हर आवाज़ जैसे खामोशी में ही ढल चली है। तो मैंने भी अपनी एक खामोश दुनिया चुन ली, चाँद सितारों संग ही अब मेरी ये हमसफ़र बनी है। हम सब ढूँढते फिरते हैं कोई सुरक्षित सा कोना, और खुद के ही अंदर कहीं दुनिया समा ली है। ज़िन्दगी भी अजीब है—एक बुलबुला सा सफ़र, पल में बनती-बिखरती, यही उसकी असली कली है। ~ फ़िज़ा 

वो भी क्या शाम थी..

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  वो भी क्या शाम थी, दिल में अजीब सा गुमान था, मैं भी चल पड़ी थी, वो भी कहीं रवाना था। उस पार मुझसे दूर, पर किसी के पास जा रहा था, फ़ासलों में छुपा जैसे कोई अपना सा अफ़साना था। रूठा-सा, खामोश मगर, कदम बढ़ाता जा रहा था, लब चुप थे उसके, पर दिल में शोर पुराना था। मैं बस खड़ी सोचती रही, उस पल की गिरह में, क्यों जाना है उसे, जब लौट कर फिर आना था। शाम की उस धुंध में, कुछ सवाल रह गए यूँ ही, हर जुदाई में छुपा जैसे मिलने का बहाना था। ~ फ़िज़ा

महिला आरक्षण की लौ

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  संसद की दीवारों में गूँजी एक नई सी बात, बराबरी के शब्दों ने छेड़ी फिर से नई शुरुआत। महिला आरक्षण की लौ जली, उम्मीदों का आसमान, पर इसके साये में चलता रहा राजनीति का भी गान। वोटों की गिनती में भी, सपनों का हिसाब हुआ, कभी समर्थन, कभी विरोध—हर रंग का इज़हार हुआ। कागज़ पर लिखे अधिकार, दिल तक कब पहुँचेंगे, ये सवाल अब भी गलियों में धीमे-धीमे गूंजेंगे। नारी की शक्ति कोई नया अध्याय नहीं, वो तो हर दौर में रही—बस पहचान नई। ये बिल एक दरवाज़ा है, मंज़िल नहीं अभी, सफ़र लंबा है आगे, राहें आसान नहीं। सत्ता के गलियारों में चाहे कितनी भी चालें हों, हर आवाज़ के पीछे सच्चाई की मशालें हों। जब नीयत साफ़ होगी, तब बदलाव सच होगा, वरना हर वादा बस एक और शब्द होगा। फिर भी उम्मीदों की डोर थामे चलती नारी, हर संघर्ष में खुद को फिर से लिखती नारी। कानून से आगे बढ़कर जब सोच बदलेगी, तभी ये आज़ादी सच में हर घर तक पहुँचेगी। ~ फ़िज़ा

ओ चाँद

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  चाँद की ये आधी सी मुस्कान, जैसे कोई अधूरी सी जान। खामोशी में भी कितनी बातें, हर रात मुझे ये समझाए। काली रात की गोद में सिमटा, सफेद सा ये कोमल नूर, दूर होकर भी कितना अपना, जैसे दिल के सबसे पास हुज़ूर। तेरी ये आधी सी झलक ही, मेरे पूरे ख्वाब सजा जाती है, ओ चाँद, तू पूरा हो या आधा, मेरी दुनिया तो तुझसे ही जगमगाती है। तेरे दाग भी मुझे प्यारे हैं, तेरी खामोशी भी गीत लगे, तू बोले ना फिर भी हर पल, मुझसे अपनी प्रीत कहे। मैं भी तेरी तरह अधूरी, तू भी मुझ सा थोड़ा सा, शायद इसी अधूरेपन में ही, हमारा रिश्ता है पूरा सा। ~ फ़िज़ा 

ये मतवाला।

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  माइक हाथ में, अंदाज़ निराला, स्टेज पे आते ही छा गया ये मतवाला। बात शुरू करे तो हंसी रुकती नहीं, सीरियस दिखे, पर बातें होती सीधी नहीं। थोड़ा सोचकर, फिर पंचलाइन गिराते, लोग हंस-हंस कर आंसू तक बहाते। चेहरे पे सादगी, दिमाग में तूफ़ान, हर लाइन में छुपा होता मज़ेदार सामान। ये कोई आम इंसान नहीं जनाब, हंसी का चलता-फिरता इंतज़ाम है ये ख़ास। ~ फ़िज़ा