महिला आरक्षण की लौ
संसद की दीवारों में गूँजी एक नई सी बात, बराबरी के शब्दों ने छेड़ी फिर से नई शुरुआत। महिला आरक्षण की लौ जली, उम्मीदों का आसमान, पर इसके साये में चलता रहा राजनीति का भी गान। वोटों की गिनती में भी, सपनों का हिसाब हुआ, कभी समर्थन, कभी विरोध—हर रंग का इज़हार हुआ। कागज़ पर लिखे अधिकार, दिल तक कब पहुँचेंगे, ये सवाल अब भी गलियों में धीमे-धीमे गूंजेंगे। नारी की शक्ति कोई नया अध्याय नहीं, वो तो हर दौर में रही—बस पहचान नई। ये बिल एक दरवाज़ा है, मंज़िल नहीं अभी, सफ़र लंबा है आगे, राहें आसान नहीं। सत्ता के गलियारों में चाहे कितनी भी चालें हों, हर आवाज़ के पीछे सच्चाई की मशालें हों। जब नीयत साफ़ होगी, तब बदलाव सच होगा, वरना हर वादा बस एक और शब्द होगा। फिर भी उम्मीदों की डोर थामे चलती नारी, हर संघर्ष में खुद को फिर से लिखती नारी। कानून से आगे बढ़कर जब सोच बदलेगी, तभी ये आज़ादी सच में हर घर तक पहुँचेगी। ~ फ़िज़ा