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ये चाय नहीं, एक रिश्ता है..

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  मिट्टी की कुल्हड़ में सजी, ये चाय नहीं एहसास है, पहली चुस्की में जैसे, घर लौट आने का विश्वास है। हल्की-सी भाप में घुली, माँ की रसोई की खुशबू, हर घूँट में मीठी यादें, और थोड़ी-सी बचपन की धूप। सड़क किनारे, ठंडी शाम, या सुबह की नींदी आँखें, ये कुल्हड़ वाली चाय हमेशा, दिल को अपने पास बुला ले। होठों से लगते ही जैसे, सारी थकान पिघल जाए, एक चुस्की और… फिर एक और, मन यूँ ही मुस्कुराए। मिट्टी की सोंधी महक में, छुपा है अपनापन सारा, ये चाय नहीं, एक रिश्ता है, जो हर बार लगे दोबारा। ~ फ़िज़ा

कप में सजी ये छोटी सी दुनिया

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  कप में सजी ये छोटी सी दुनिया, झाग में जैसे फूल खिला, हल्की-सी खुशबू कॉफी की, मन को चुपके से छू गई भला। संगमरमर की मेज़ पे रखी, ये प्याली कितनी प्यारी है, जैसे सुबह की पहली किरण, या माँ की मीठी फटकार सी न्यारी है। हर घूँट में है सुकून छुपा, जैसे घर की गर्माहट हो, थोड़ी-सी कड़वाहट भी इसमें, पर उसी में मिठास की आहट हो। पास रखी वो खाली कुर्सी, किसी अपने का इंतज़ार करे, या खुद से मिलने का मौका, कुछ पल दिल को उपहार करे। ये कॉफी नहीं, एक एहसास है, थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है, भागती दुनिया के बीचों-बीच, ये पल ही तो असली ठहराव है। ~ फ़िज़ा

उसके होंठों से

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उसकी तलब या मेरी तड़प समझ लो  उसके होंठों से लगे मेरे होंठ  प्यास या हवस की व्याकुलता  जब मिले, कण-कण से बुझाती तृष्णा  होठों से होकर जुबां से गुज़रते हुए  हलक से जब वो गरमा गरम  गुज़रती है तो वो किसी  कामोन्माद से कम नहीं  ये एहसास सिर्फ अनुभव है  आजमा के देखिये कभी ! ~ फ़िज़ा