Posts

Showing posts with the label Azaad

लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे !

Image
 जहाँ खुला आसमान उड़ते पंछी देखूँ  लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे ! वक़्त ऐसा आ चला है जहाँ पर  बिना पिंजरे के बंधी बने हैं लोग ! अब तो हालत ऐसा है जनाब जाना चाहो वापस जाने न दें ! किसी के विरुद्ध क्या बोलोगे अब  कुछ कहने से पेहले ही बोलती बंद ! कटुक नीबूरि कहाँ कनक कटोरी  पिंजर बंध कनक तीलियाँ भी नहीं ! खूब हंसो तुम पंछी खूब हंसों   पैरों पर जो मारी है कुल्हाड़ी ! ~ फ़िज़ा 

फिर बचपन सा जीना चाहती हूँ...

Image
 रिश्ते ये कुछ हम बनाते हैं  तो कुछ यूँही मिल जाते हैं  कुछ का सिर्फ ग़म मनालो  कुछ का अफ़सोस के काश ! रिश्ते बनते हैं अपेक्षाएं भी  किसी के न्यायोचित किसी के नहीं   कभी लगता है सब खिलाडी हैं  और इस्तेमाल स्वयं हो रहे हैं ! हर रिश्ते की भी एक अवधि है  फिर माता-पिता ही क्यों न हों  कुछ संस्कार मदत करते भी हैं  पर जो संस्कार ही न पूरा करे ? मैं उन्मुक्त गगन की पंछी हूँ  रिश्ते भी हैं रिश्तेदारी भी की हैं  ज़िम्मेदारियों का एक दायरा है   फिर बचपन सा जीना चाहती हूँ ! ~ फ़िज़ा 

जलियानावलां बाग़ !

Image
  लोगों की भीड़ थी पार्क में  जैसे कालीन बिछी ज़मीं पे  एक ठेला चलाता हुआ दिखा  जो भर-भर लाशें एक-एक  कोशिश करता बचाने की  डॉक्टर ने पुछा और कितने  सौ से भी ज्यादा कहा वो  फिर भागा लाश उठाने  लोगों को बचाने उधम सिंह ! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी यही है और कुछ भी नहीं...

Image
खुद  में जब कोई खामियां है  ये जानलो तो लुटा दो सब कुछ  उन खामियों को बदलने में  ऐसा ही कुछ हुआ था मेरे संग  जब टेलीमार्केटिंग में औरों के मुकाबले मैं कम थी परिश्रम से  एक अच्छी बिक्री प्रतिनिधि बनी  जहाँ मेरी नौकरी ४ बजे से ११ थी  वहीं मुझे दो-तीन और काम मिले  अब मैं सुबह ८ बजे से ११ बजे तक  काम ही काम, अलग-अलग उत्पाद  उत्पाद में विश्वास हो तो काम आसान  हर उत्पाद बिकने लगा वो भी तादाद में  शायद मेरे ख्वाब में भी न सोचा हो मैंने  क्रेडिट कार्ड से लेकर बीमा तो बिजली  लम्बी दुरी पर फ़ोन करने के पैकेज  ये चीज़ें कोई खरीदेगा? वो भी फ़ोन पर? ताज़्ज़ुब की बात है मगर सही कहा है  दिल से दिल को राह होती है सही में ! एक मजले से दूसरे मजला और फिर  सारे ऑफिस में मैं जानी-पहचानी हुई  कई दोस्त बने कई प्रशंसक भी हुए  कितनों ने दिल दिए और कितने टूटे  कामियाबी खुशियां लाती हैं मोहब्बत भी  ज्यादा की उम्मीद तब भी नहीं थी  ज़िन्दगी ज़िंदाद...

कैसा हैं ये इंसान जगत भी ...!

Image
एक कबूतर ने दूसरे से कहा क्यों ये इंसान इतने लड़ते हैं बात-बात पर हक़ जताते हैं हक़ जताकर भी कितने मजबूर हैं ये बात सुनकर दूसरे कबूतर ने कहा इंसान होकर भी ये मजबूर हैं ? किस बात का फिर हक़ जताते हैं? इस पर पहले कबूतर ने कहा बहुत ही मतलबी और स्वार्थी हैं किसी भी जगह जाकर रहते हैं और उस पर अपना हक़ जताते हैं अपने ही जैसे अन्य किसी को आने या रहने नहीं देते हैं हर समय आज़ादी का नाम मगर चारों तरफ पहरा रखते हैं इतना स्वार्थी और डरपोक हैं अपने ही जैसों को दूर करते हैं इंसान एक दूसरे के खून के प्यासे सीमाएं बनाकर रखते हैं एक जगह से दूसरे जगह हम तुम जैसे नहीं जाते हैं इनकी हर जगह, हर राज्य सीमाओं से बंधा हुआ है दूसरा कबूतर दया के मारे सोचता ही रहा गया तिहारे कैसा हैं ये इंसान जगत भी अकल्मन्द होकर भी जाने क्यों अपने ही लोगों संग यूँ व्यवहार करें, आखिर क्यों? ~ फ़िज़ा  #happypoetrymonth

जीवन का नाम है सिर्फ चलना !

Image
उसके अपने आज़ाद ख्याल थे  फिर भी वो सिमटी हुई दुनिया के  उसूलों पे रहने लगी थी मगर फिर भी  जीने की चाह उसके अंदर दबी थी ! क्या उड़ना इतना मुश्किल है? या ऐसा सोचना भी पाप है?  और ऐसा सोचना कौन तै करता है? क्यों कोई आज़ाद नहीं इस संसार में? जब वो आया नहीं किसी दायरे में? मैं हूँ एक ज़िन्दगी, जीना चाहती हूँ  अपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी ! क्यों कोई रोके या टोके मुझे ? कोशिशें लाख करूँ मैं फिर भी  गर कोई बर्बादी की तरफ ही बढे  तब छोड़ भी देना चाहिए ये ज़िद  रहने दो बिन क्यारियों के सबको  के ज़िन्दगी का नाम है आज़ादी ! ज़िन्दगी है जिंदादिलों की! जियो गर कोई साथ दे या न दे  ज़िन्दगी, तू जीने के लिए ही है आयी  तो जियो ख़ुशी से ! तबाह कर हर उस वहम को उस  रिवाजों को और हर दया को  जो रोके हैं तुझे किसी बांध की तरह  क्योंकि तेरा काम है बेहना और  जीवन का नाम है सिर्फ चलना ! चलते जाना! न रुकने का नाम है  ज़िन्दगी!!!! ~ फ़िज़ा 

आज़ाद कर खुद को सभी से 'फ़िज़ा' ...

Image
मुझे नहीं परवाह कोई है या नहीं  खुद ही हूँ मेरा क़ातिल खबर है मुझे   कमज़ोर हाथों से दिया है सहारा  ये बात और के वो भूल जाएँ उसे  जोड़ने की व्यथा में टूट जाते हैं सब  बिखरे ही रहने दो इन्हें क्योंकि ये  उम्मीद तो देते हैं किसी से जुड़ने की  क्या तेरा और मेरा इस मायानगरी में  जैसे आया है वैसे जायेगा बिना बताये  इंसान हैं तो निभाले इंसानियत सभी से  अफ़सोस भले काम न आये फिर कभी  आज़ाद कर खुद को सभी से 'फ़िज़ा' कम से कम गिला तो नहीं किसी वास्ते! ~ फ़िज़ा