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कोवीड इस अचूक से आ मिला !

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 सकारात्मक  होना क्या इतना बुरा है ? के कोवीड भी इस अचूक से आ मिला  जैसे ही हल्ला हुआ के मेहमान आये है  नयी दुल्हन की तरह कमरे में बंद हो गये  स्वर्णयुग से नहीं थे जो छुईमुई बन जाते  काम-सपाटा ऑफिस का खत्म कर जल्दी  चले निद्रा को पकड़ने  या हो गए उसके हवाले  जो भी था  फिर तांडव रचा कोवीड ने अंदर  घुसा तो कहीं से भी हो मगर स्वयं स्थिर हुआ  राज रचा मस्तिष्क पर जैसे कोई प्रयोगशाला  जो भी हो रहा था  सब कुछ नज़र आ रहा था  जाने क्यों सपना हकीकत  नज़र आ रहा था  मृत्यु ,  मरना सिर्फ इस लोक के लिए है  वहां तो ये एक दरवाज़ा है  जहाँ से निकले  तो फिर मैं न मैं रहूं  और मैं भी न जानू मैं कौन हूँ ? ~ फ़िज़ा  

मोहब्बत करने लगी हूँ

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  फिर गुस्ताखी करने चली हूँ खुद से मोहब्बत करने लगी हूँ  चाँद अब मेरा पीछा करता है  उस मुये से अब मैं छिपती हूँ  आहें भरते है दोनों तरफ आग  डरती हूँ  और मिलना भी चाहूँ दिल ओ दिमाग से मसरूफ हूँ  गुनगुनाती फ़िज़ा ख्यालों में घूम हूँ  ~ फ़िज़ा 

दिल या दिमाग ?

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  आज कॉलेज के दोस्तों संग  यूँही बातों-बातों में दो पक्ष  दिल व दिमाग की हुई जंग  दिल तो है ही दीवाना मेरा  मैंने तो सिर्फ दिल की सुनी  जो दिमाग के पक्ष में था वो  दिल से दिमाग कह रहा था  साथियों के इमदाद से जो  बहस-मुबाहिसा हुई दोनों में  क्या कहना उस वक्त का  उसे भी हराकर बात बढ़ी  दोस्तों संग फिर कब होंगे  आमने-सामने पता नहीं  पर चैटिंग करते दिन पुराने  कॉलेज के यादों में चला गया  उम्मीद पर कायम है दुनिया  और हम तो मिलेंगे फिर से  जब हो परिहार महामारी का  शायद तब भी दिल और दिमाग  की ही जंग में खुल जायेंगे सब  बचपन के बंधे गिरह दिल के और  दिमाग के ! ~ फ़िज़ा  

गुमशुदा

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  बाहर सुनहरी धुप है  मौसम भी ठीक है  दिल कहीं मायूस  गुमशुदा हो चला है  कोई बात नहीं पर  दिल नासाज़ सा है  इस उदासी की वजह  ढूंढ़कर भी नहीं मिला  शायद बोरियत है  रोज़ वही दिनचर्या  वही लोग और सब  वही घर से बाहर  और बाहर से अंदर  बस पंछियों पर है  ध्यान अटका आजकल  देखा कल ओक पेड़ पे  दो घोसलों का निवास  ख़ुशी हुई कितनों को है  आसरा इस पेड़ से  अब तो बस उन्हें देखते  गुज़रता है वक्त सारा  काम तो व्यस्त रखे  मगर दिल कहीं खोया है ! ~ फ़िज़ा 

सहनशीलता !

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दिन का चैन खो गया कहीं  तो रातों की नींद घूम है कहीं  कहीं से रोशनी की उम्मीद है  तो सिर्फ अन्धकार की बातें हैं  कोई सूरत तो नज़र आये कहीं  कोई रास्ता हो जहाँ उम्मीद हो  दुआ न दवा से सिर्फ दिमाग से  हम-तुम इंटरनेट से साथ निभाएं  मगर घर से बहार न निकालें अब  घर पर रहकर पूरी करें दिनचर्या  कुछ सालों के लिए रहे दूर-दूर  शायद फिर वो दिन भी आये जब  गले-मिलकर मस्तियाँ करें सब  किन्तु अब संयम और सावधानी  इनका ही उपयोग करें हम सब  चलो कुछ धैर्य भी साथ रखते हैं  कुछ अपने लिए कुछ औरों के लिए  नमन! ~ फ़िज़ा   

करुणा

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  आज कहने को सुनने को  क्या रहा जब खबर सब  एक जैसी ही आ रही हो  जहाँ युद्ध में योद्धा लड़ते  आज हर कोई सैनिक बन  एक-दूसरे को सहारा दे रहा  वीर हैं वो जो अपना नहीं पर  कोविद-ग्रस्त मरीज़ों का सोचें  रिश्तेदारों को हटाकर खुद ही  क्रियाकर्म कर उनको विधि से  मुक्त कर रहे हैं  लड़खड़ाते हैं मेरे लफ्ज़ आज  इंसानियत और हैवानियत को  मुकाबला करते देख ! ~ फ़िज़ा 

बीज

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  बीज बनकर तू गिरा अब पेड़ बन गया धरा से तू ऊगा है धरा में ही जायेगा  जानकर भी हमेशा देता सभी को साया  आसमां की ऊंचाई भाती उस ओर गया  ऊंचाई तक जाकर तनों को नीचे ले गया  जिस थाली में खाया उसका ऋण चुकाया  इतना ही नहीं अनजानों को भी छाया दिया  एक तू ही है जो इंसान नहीं इंसानियत है  सीखा कर भी इंसान इंसान न बन पाया  ऐ वृक्ष तुझे प्रणाम तू मरकर भी काम आया   अर्थियों के लिए तो ठंड दूर करने के लिए  तू देता रहा हर पल हर दम तू जलता ही रहा ! ~ फ़िज़ा 

काश! कुछ कर पाते...

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  हर तरफ कोरोना का शोर है  हर तरफ वैक्सीन का भी नारा  कोई ये लो कहता तो कोई वो  कोल्हाहल सा मचा है हर तरफ  कोई मास्क पहनता है कोई नहीं  किसी को बहुत आत्मविश्वास है  कोविड नहीं होगा बस घूम रहे हैं  अपना नहीं औरों का ही सोचते  खुद बेहाल औरों का भी ये हाल   हर दिन साथियों के जाने की खबर  कोई कोविड से ग्रस्त हस्पताल में  मुझे मिले वैक्सीन अपराध सा लगे  मगर मैं फिर भी तो नहीं आज़ाद  दोस्तों के बारे में सोचूं तो उनको  वैक्सीन भी नहीं, दवा-दारू भी नहीं  मौत से लड़ते हुए तो किसी अपने को  कांधा दिए आँखों में आंसू ,लाचारी  धैर्य देते-देते अब खुद धैर्य को थामे  के जाओ नहीं छोड़कर साथ हमारा  तुम नहीं तो कैसे देंगे हम हौसला  एक-एक करके सभी छोड़े जा रहे   इस उम्र में जब सोचा मिलेंगे अब के  याद करेंगे स्कूल के मस्ती वाले दिन मगर अब श्रद्धांजलि देते थक गए हम  काश! कुछ कर पाते साथियों के लिए !!!!! ~ फ़िज़ा 

आँखों ही आँखों से

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  आँखों ही आँखों से मिले थे  दूर-दूर ही थे मगर हर पल  नज़रों से होते रहे नज़दीक  संकोच झुकती नज़रों से  हौसलों से देखती वो नज़रें  कहीं तो एक चिंगारी जली  आँखों के रस्ते प्यार हो गया  देखो तो एक सपना सा लगा  क्यूंकि कोवीड के होते ये सब  मुनासिब ही नहीं नामुमकिन था  लेकिन हमने चेहरे नहीं आँखों से  दिल की गहराइयों को जाना  और आँखों ने सहमति दी कहा हाँ, मुझे प्यार है तुमसे  दूर थे मगर दिल से जुदा नहीं ! ~ फ़िज़ा 

कब होगी वो सुबह...

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  एक वक़्त ऐसा भी होता था  जब सुबह का इंतज़ार रहता  अब डर लगता है के सुबह हो  तो जाने क्या खबर सुन ने मिले  ज़िन्दगी अप्रत्याशित हो चली है  कोवीड महामारी ने सभी को  असहाय लाचार बेबस मायूस  दूभर कर दिया जीना सभी का  सुरक्षा उसका पालन करने से  कतराते वक़्त आते-आते देखो  जाने-अनजाने लोग गुज़र गए  बिना इलाज़ ही  मृत्यु हो गयी  अनगिनत जवान-बूढ़े लोगों की  ये दृश्य सपने में भी न देखा कभी  ऐसा भयानक समय कब थमेगा ? कब होगी वो सुबह जब ये न होगा ? ~ फ़िज़ा 

नये साल की शुरुवात...!

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नये साल की शुरुवात कुछ इस ढंग से मैंने की   प्रकृति के साथ और कुछ युवाओं के संग हुई  कहते हैं पानी में रहकर मगर से न रखो कभी बैर  सोचकर शामिल हुए बच्चों की टोली में करने सैर  जंगलों में करने विचरण प्रकृति से कुछ बतियाने  जीवन की तरह कुछ टेढ़े-मेढ़े मिले रास्ते राह में  बिन मौसम बदलते पलछिन हरियाली झुंड पेड़ों के  फिसलते ओस से लतपत मोड़ छत्रक सजीले छाल  शुष्क हवाओं में सांस लेते हुए खुशगवार ये पल  कैद किये यूँ इस साल फ़िज़ा ने कोरे कागज़ पर  ~ फ़िज़ा 

रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का

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  मोहब्बत तो चाँद से बहुत पुराना है  बचपन से लेकर आज तक याराना है  तब देखने को तरसते मचलता था मन  नयी उमंग उठने लगीं थीं मन में उससे  पूरे चाँद-रात को ख़ुशी से मचलते थे   अम्मी से कहते तब पूर्णिमा की रात है  सेवइयां बनाने की यूँही ज़िद करते थे  मीठा खाने की या चाँद से मोहब्बत  जो भी हो दोनों के होने का आनंद लेते  मोहब्बत परिपक्वता की सीमा पर है  आजकल चांदनी की सेज़ में सोते हैं  वो भी रात-भर बैठकर सुला देता है  डर नहीं उसके जाने का अपना जो है  ऐसा लगता है वो हरसू मुझे निहारता है  मिलन की सेवइयां अब खुद बनाती हूँ  मोहब्बत का स्वाद मन ही मन सहलाती हूँ   उसकी आगोश में यूँही फ़िज़ा महकाती हूँ रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का   अब तो हरसू कविता आंखें चार रेहती हूँ ! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी की सब से बड़ी पहेली है...!

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  ज़िन्दगी के धूप-छाँव तो आते-जाते हैं  यही सीखा और समझा ये  ज़िन्दगी है  वक्त का तकाज़ा या खेल ज़िन्दगी है  समय के साथ ज़िन्दगी थक जाती है  समय के साथ ज़िन्दगी साथ आती है मगर कुछ ज़िन्दगी इस साल लायी है  अंदाज़ और अंगड़ाइयों में जो नज़ारा है  अफ़सोस अधिक, अन्धकार ज्यादा है  समय के साथ ज़माने के बदलते तेवर हैं  छोटा गया बड़ा पीड़ित इसमें हेर-फेर है  ज़िन्दगी अब कोविड के हाथों चलती है  इसके लपेट में कौन आएगा कौन नहीं है  यही ज़िन्दगी की सब से बड़ी पहेली है  अब तो हर खबर जो सुनने में आये है  वो कोविड के नाम से एक षडयंत्र है  नियति का या समय का रचा खेल है ! फ़िज़ा 

कमरों से कमरों का सफर

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सेहर से शाम शाम से सेहर तक  ज़िन्दगी मानों एक बंद कमरे तक  कभी किवाड़ खोलकर झांकने तक  तो कभी शुष्क हवा साँसों में भरने तक  ज़िन्दगी मानों अपनी सीमा के सीमा तक  बहुत त्याग मांगती  रहती हैं जब तक  है क्या इस ज़िन्दगी का लक्ष्य अब तक  इसके मोल भी चुकाएं हो साथ जब तक  ये जीना भी कोई जीना सार्थक कब तक  खिलने की आरज़ू बिखरने का डर कब तक  एहसासों की लड़ियों में उलझा सा मन कब तक  आखिर नियति का ये खेल कोई खेले कब तक? तोड़ बेड़ियों को सीखा स्वतंत्र जीना अब तक  इस नये मोड़ के ज़ंजीरों में जकड कर कब तक  यूँहीं आखिर कमरों से कमरों का सफर कब तक? ~ फ़िज़ा  #हिंदीदिवस #१४सितम्बर१९४९   

उम्मीदों से भरा...

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महीना अगस्त का मानों उम्मीदों से भरा  शिकस्त चाहे उस या फिर इस पार ज़रा   वैसे भी कलियों के आने से खुश है गुलदान  फूल खिले न न खिले उम्मीद रहती है बनी  हादसे कई हो जाते हैं फिर भी आँधिंयों से  लड़कर भी वृक्ष नहीं हटते अपनी जड़ों से  कली को देख उम्मीद तो है गुलाब का रंग  खिलकर बदल जाए तो क्या उम्मीद तो है  कम से कम ! ~ फ़िज़ा 

करें मुस्तकबिल बगावत का ...!

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चलती तो हूँ मैं सीना तानकर  मगर दिल में अब भी है वो डर  कहीं खानी न पड़ जाए ठोकर  दर ब दर ! क्यों न इस पल के हम हो जाएं  शुक्रगुज़ार, जी लें उस पल को  क्यों ख्वामखा करती है परेशान  किसी अनहोनी का ! न तो जी भर के खुश भी हो सकें  न ही ग़मगीन हों उस बात की जो  अभी हुआ नहीं हैं बस फिर भी  लगा रहता है डर ! आँखों के सामने अनीति नज़र आती है  सर पे है हाथ किसी का जो करे मनमानी  सोचते रेह जाते हैं क्या सिर्फ देखें ये सब  या करें मुस्तकबिल बगावत का ! ~ फ़िज़ा 

छूटता नहीं मगर रहता है मस्त में आज...

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सूखे पत्ते और उस पर चलने की आवाज़  मन में जैसे छिपी एक आहट या आगाज़  मानों बरसों का इंतज़ार और वो अंदाज़  किसी की वो दबी यादें या अपना आज  बातें पलछिन की जैसे कल नहीं आज  रहते कल में खुश फिसलता हुआ आज  जाने कब से अतीत के संग बीता आज  छूटता नहीं मगर रहता है मस्त में आज  क्यों पलछिन, यादें चले आते हैं आज सूखे पत्ते जलकर दे जाते हरारत साज़  ~ फ़िज़ा