Friday, May 28, 2021

मोहब्बत करने लगी हूँ


 

फिर गुस्ताखी करने चली हूँ

खुद से मोहब्बत करने लगी हूँ 


चाँद अब मेरा पीछा करता है 

उस मुये से अब मैं छिपती हूँ 


आहें भरते है दोनों तरफ आग 

डरती हूँ  और मिलना भी चाहूँ


दिल ओ दिमाग से मसरूफ हूँ 

गुनगुनाती फ़िज़ा ख्यालों में घूम हूँ 


~ फ़िज़ा 

1 comment:

SANDEEP KUMAR SHARMA said...

बहुत खूब...खुद से बतियाती और अकेले में गुनगुनाती रचना।

उसके जाने का ग़म गहरा है

  जिस बात से डरती थी  जिस बात से बचना चाहा  उसी बात को होने का फिर  एक बहाना ज़िन्दगी को मिला  कोई प्यार करके प्यार देके  इस कदर जीत लेता है ...