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ज़िंदगी कल गले मिली थी कुछ देर सेहर...!

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ज़िंदगी कल गले मिली थी कुछ देर सेहर पेहले तो बस देखने-समझने में लग गयी देर  फिर जब प्यार हुआ आँखों-आँखों में देर-सबेर  तो देखा वक़्त हो चला था शाम पहुंचने मुंडेर मैने भी केहा दिया ज़िंदगी से रुक जा कुछ देर  मानो या ना मानो लगा रुक ही जायेगी कुछ देर , मगर ढल ही गयी शाम और ज़िंदगी मिलने का वादा कर  निकल गयी हाथ से यूं जैसे अभी मिलेंगे कुछ देर ज़रूर ! ~ फ़िज़ा 

Zindagi Ke Kareeb Hoon Aise!

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Dil nasaaz sa raha kuch din  Bujha-bujha sa ojhal mann Badalon se dhaka aasmaan Waheen, kaheen chipa chaand  Nis din mein karun uska intezar  Kabhi to bujhegi milan ki pyaas Udasiyon mein dooba mann Rangon se bhara ye mausam Berang sa phir kyun lage chaman? Soch mein duboon mein nisdin Phulon ki bahaar har taraf Panchiyon ki cheha-chehahat Barish ki girti tap-tap boondein Paas humein le aaye aise Jaise phir kab milungi us se Dekh aankhbhar samaya mujh mein Uski bahon mein nisaar ho shaam jaise Thaki -haari phir bhi zindagi ke kareeb hoon aise! ~ fiza

Shab-e-vasl per har gumaan ki hogi puri kasar

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Mastiyaan athkheliyan saare manjur the magar Dur rehakar saare jatan sehana nahi is kadar  Har pal jhalakta hai aankhon ka deedar mujhe Ehasaas mujhe deta hai pyaar ka rahat magar  Hijr ke pal jataate hein kitne dur ho tum Shab-e-vasl per har gumaan ki hogi puri kasar   Duriyan falsafe yaad dilaate hein yun rehakar Hijr ke mausam mein bhi badal barsate hein aksar  Chanda dur se dekh barsaaye hai mujh per pyaar Raat neend mein sulakar din mein takta hai yaar  Pyaar se bhara gulaabi khat he hai mera sahara Ke ab beete yaadon mein hai 'fiza' ghumshuda awara  ~ fiza

Hawa ke zhonke sa...

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Ek ehasaas jise keval mehasoos hee kiya ja sakta hai...jiski hone ki kabhi khabar pehale se nahi hoti...lekin jab ye ehasaas ki anubhuti ka pata chalta hai tab tak ehasaas ek atki hui saans ki tarah dil mein phansi rehati hai aur tab...kya kya sochta hai insaan...ek koshish ... Hawa ke zhonke sa Oska aana aur phir jaana Pal bhar ke liye hee sahi Jee mein sau tarangon ka aana Is pal ko mein jee loon ab Sau jeevan kurbaan sahi Hawa ke zhonke sa Oska aana aur phir jaana Mere dil se athkeli karna Phir sapno mein chali aana Aankh khulte hee jaise Khusboo see ood jaana Hawa ke zhonke sa Oska aana aur phir jaana Dil ke armaan huye bekaboo Zhonkon sa aana jaana Khusboo phailakar ghum ho jaana Aur na khelo ankhmicholi Hawa ke zhonke sa Oska aana aur phir jaana Ab ke aao to band kar loon mein Seene se, dil ki geharayee mein Khusboo sa ehasaas hee sahi Banke meri subha tum rehana Hawa ke zhonke sa hee sahi Tum aana aur phir kabhi na jaana   ~ fiza

Phir Sanwarein Adhuri Kahani-Kahani

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 Bachpan itna masoom hota hai ke oos waqt kya accha hai aur kya pyara hai iski samajh shayad hee hoti hai. Bachpan ke sathi jab bichar jaate hein tab kaheen jakar hum oonhein dhundne lagte hein bechen aur tadapti atma...jahan kabhi shayad khabar bhi na ho ke ye dosti darasal pyaar tha aur hai...kuch aise ehasaas aur pal ko darshaane ki ek maatr koshish... Barson baad hum mile, haal poocha to laga Jahan se bichare waheen, per aakar hum phir mile Khubh haal-chal jaana, Kahan rahe aur kahan seekhe Kab kis gali mein kis saal mein, rehakar bhi kyun nahi mile? Dil ki halat bayan, ho na saki lekin Halatein bayan hote hote, ehasaas phir wohi jaage jaage Baton ka silsila khatm na ho, Ye kafila yoon hee chalta rahe Aur jaan ne ki becheni kabhi to, chithiyon mein pyaar dhundna kabhi Ek taraste aur bichare huye se, bahut dur se bahut dino se Dhundte huye yahan tak pahunche, chahe waqt ki syahi kuch bhi ho Hum-tum waise hee rahe , Jaise pehale hum-tum mile Wohi lajja wohi ghaba...

एक उपन्‍यास की जुस्‍तजू़ में

जिंदगी में हर कोई अपने- अपने अरमान लिये हुये आता है और शायद उसे पूरा करने या होने की आरजू़ में ही जिंदगी गुजा़र देता है...मेरी भी कोशिश यहाँ उन आरजूओं की सोच, कल्‍पना और उन सोचों में पडे़ एहसासों को पेश करना है। कहाँ तक सफल हुई हूँ ये मैं आप सभी पर छोड़ती हूँ...... आपकी मुंतजि़र ख्‍यालों के पन्‍ने उलटती रेहती हूँ जिंदगी की स्‍याही घिसती रेहती हूँ नये पन्‍ने जोड़ने की आरजू़ में, नीत-नये दिन खोजती रेहती हूँ जीवन के पुस्‍तकालय में, 'मधुशाला' को ढुँढती रेहती हूँ शब्‍दकोश के इस भँडार से जीवनरस निचोडती रेहती हूँ स्‍याही-कलम के बिना भी लिखे गये हैं ग्रंथ कई मेरे कलम में आज भी मैं, रंग भरती रेहती हूँ अब के खुशियों से भरे जीवन की हकीकत पर पन्‍ना-पन्‍ना जोडकर उपन्‍यास लिखने की आरजू़ में रेहती हूँ कौन से दो नयन मैं उधार लाऊँ जहाँ मेरी इस उपन्‍यास को सच्‍चाई की एक दुकान मिले मैं अब भी हिम्‍मत जुटाते रेहती हूँ मैं अब भी टूटती पंक्‍तियों को जोडती हूँ मैं अब भी एक किताब लिखने का हौसला रखती हूँ बोलो, क्‍या इसे कोई खरीदेगा?? जीवन के वो बोल समझ पायेगा?? खून की स्‍याही, से सींचकर रखी इस किताब को ...

आज भी, उम्‍मीद का दिया ही जला आये!

प्रकृति में बारिश कभी मीठी-मीठी खुशबू या फिर मौसम को रोमांचक बनाती है, तो कभी भारी बरसात से सब कुछ अस्‍त-व्‍यस्‍त हो जाता है। जीवन का संयम भी कभी-कभी ऐसा रूख ले लेता है, कुछ तूफानी बातें तो कुछ मुकाबले की बातें.... आखिरकार जीत लडने वाले और हौसला रखने वाले की ही होती है.... बारिश की बूँदें सर-सर करे बाहर मेरे दिल में जैसे एक तूफान आये! बूदों की ज़िद, बिजली की कडकडाहट तूफानी लेहरों में दिल गोते खाये! पानी के भवँडर में, मैं धँस गई हुँ डूबे हैं न निकले, कुछ समझ न आये! बूँदें बरसकर बेह जातीं हैं मैं किस ओर बहूँ कोई तो बताये! तुझ से मिलने की बडी ख़व्‍वाईश है मुझे क्‍या-क्‍या न पूछूँ और क्‍या-क्‍या न तु बताये! तेरी इस खोखली दुनिया में बस आज भी, उम्‍मीद का दिया ही जला आये! ~ फिज़ा

मेरा इंद्रधनुष

होली के ऐसे पावन अवसर पर, बचपन बडा याद आता है । पेहले ये सोचकर मन बेहला लेती थी कि अब होली खेलने नहीं मिलता शायद इस वजह से मन रेह-रेह कर बिते दिनों की याद दिलाता है, किंतु बात ये है कि बचपन पीछा नहीं छोडता...वक्‍त इस कदर बदल गया है कि शायद ही वो परंपरा अब तक जिंदा रखी गई हो। एक छोटी सी साधारण सी कविता जिंदगी के रंगों को दर्शाती हुई.... दूर गगन की छाँव में बादलों के गाँव में तुम को देखा इंद्रधनुष सा यादों की तरह वो भी आऐ कुछ पल रेह कर खुश कर गऐ यादें ही बन गऐ हैं सहारे कुछ भी हों, ये हैं जीने के बहाने ~ फिजा़

सर्द हवाओं ने फिर छेडी है जैसे

कल सुबह से ही बरसात अपनी ज़िद पर था और कारे-कारे घटा मानों तय कर के आऐं हों.... कल की सुबह वाकई रंगीन थी..ये बात और है के....रंगत को अमावस्‍या की हवा लग गई...;)....अर्ज किया है... एक तूफानी रात...बिजली की कडकडाहट तो साँय-साँय करती हवा मानो जैसे कुछ ठानकर आई हो............ सर्द हवाओं ने फिर छेडी है जैसे वही दिल के अरमानों को किसी की याद सिने में... आज भी धडक रही है ऐसे रेह-रेह कर तुझे बुलाती है.... आ ! फिर एक बार मुझे अपना बनाने के लिये आ ऐसे उसके आते ही ऐसा लगा जैसे सर्द हवाओं का झोंका आया एक तूफानी रात से भरी घनघोर बारिश में जैसे भीगी हुई जुल्‍फों से टपकता पानी ये कह रही हों जैसे झुम के बरसों बस भीग जाने दो आज मुझे ऐसे जब ठंड से पलकें खुलीं तो देखा तूफान तो था बारिश अब भी जोरों से बरस रही थी और मैं......बस भीग रही थी.... हाँ!!! तूफानी बारिश में भीग रही थी ऐसे!!!! ~ फिज़ा

नई जगह है नये हैं लोग, नई है फिजा फिर भी...

आज कुछ इस तरह मेहसूस हो रहा है .....जैसे अपने घर को छोड दुर इस नई जगह पर आऐं हैं, जहाँ नये जगह पर आने की खुशी तो है ही...लेकिन कहीं उदासी भी है....पुरानी जगह से दूर रेहने की वजह से.... जिस तरह पौधा एक क्‍यारी से दुसरी क्‍यारी में अपना स्‍थान गृहण कर लेता है...ठीक उसी तरह हम भी खानाबदोश कि भाँति निकल पडे हैं....नये रंग और नयी दुनिया में....एक नई उमंग और नये हौसले के साथ..... माँ का ठंडा आँचल मुझको आज फिर याद आया इतने दिनों के बाद किसी ने खूब मुझे रुलाया है कल तक खुश-खुश काट रही थी जीवन अपना घर के खाली कमरे में आज यादों का दीया जलाया है बरसों बाद मिले हो तुम दिल की ऐसी हालत है माँ ने जैसे बच्‍चे को लोरी गाके सुलाया है तुझको पा के खुशियों के मैं दीप जलाया करती हुँ नये कल की कोशिश में अच्‍छा एहसास जगाया है नई जगह है नये हैं लोग, नई है 'फिजा' फिर भी अपनी धरती के जो रंग हैं उनको मन में बसाया है ~फिजा