विषु का उत्सव
सुनहरी सी ये डाल, जैसे विषु का पैगाम है, कोन्ना के फूलों में बसता केरल का हर अरमान है। सुबह की पहली किरण संग, जब ये आँगन में सजता है, हर घर के कण-कण में तब, खुशियों का ऐलान है। कणिक्कोन्ना की छांव तले, विषुक्कणि जब सजे सवेरा, हर पीली पंखुड़ी में छुपा, समृद्धि का सम्मान है। मंदिरों से आती धुन में, इन फूलों की महक घुली, हर थाली, हर आरती में, इनका ही गुणगान है। बचपन की यादों में भी, ये रंग यूँ ही बस जाते हैं, माँ के हाथों सजा वो दृश्य, आज भी दिल की जान है। ये फूल नहीं, ये परंपरा है, पीढ़ियों का अभिमान है, विषु के हर उत्सव में, कोन्ना का ही स्थान है। ~ फ़िज़ा