वो मेज़ याद आती है!
याद आती है वो मेज़, जो कमरे की खिड़की से झाँकती नज़रों के साथ ही कहीं खो जाती थी। किताबें खुली रहतीं सामने, होमवर्क के बहाने, मगर न जाने क्यों वो खिड़की मुझे बहला ले जाती— दूर, बहुत दूर, प्रकृति की छाँव में। कभी किसी आहट से, कभी किसी पंछी की आवाज़ से अचानक चौंकती, तो याद आता— अरे! किताबें तो खोली थीं होमवर्क के लिए... मगर मन तो कब का उन पन्नों से निकलकर उस खिड़की के पार हरियाली में जा बसा था। ~ फ़िज़ा