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ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, ये कैसा इसका फ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। दिल को हर किसी से जोड़ दे, ऐसी इसकी रवानी है, पास लाकर फिर सिखाती, दूरी ही असली कहानी है। जीना ही नहीं, जीने की चाह में हमें लालची बना देती, आदत पड़ते ही फिर ये, सबसे गहरी सीख सुना देती है। “अपनी राह खुद ही चुनो, औरों से थोड़ा जुदा रहो,” अकेले आए थे तुम यहाँ, अकेले ही मुस्कुरा के बहो। ये जीवन का खेल निराला, सबके अपने-अपने नियम हैं, यहाँ कोई किसी का सहारा नहीं, बस चलते अपने कदम हैं। उम्मीदों का बोझ न रखना, दिल को हल्का ही रहने दो, सुने कोई तो ठीक, न सुने—तो भी ख़ामोश ही रहने दो। न समझाने में उम्र गँवाओ, न किसी को मनाने में, ज़िन्दगी के रंग निराले हैं, बस खुद को पहचानने में। ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं, हर मोड़ नया अफ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। ~ फ़िज़ा 

लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे !

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 जहाँ खुला आसमान उड़ते पंछी देखूँ  लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे ! वक़्त ऐसा आ चला है जहाँ पर  बिना पिंजरे के बंधी बने हैं लोग ! अब तो हालत ऐसा है जनाब जाना चाहो वापस जाने न दें ! किसी के विरुद्ध क्या बोलोगे अब  कुछ कहने से पेहले ही बोलती बंद ! कटुक नीबूरि कहाँ कनक कटोरी  पिंजर बंध कनक तीलियाँ भी नहीं ! खूब हंसो तुम पंछी खूब हंसों   पैरों पर जो मारी है कुल्हाड़ी ! ~ फ़िज़ा 

जीवन का नाम है सिर्फ चलना !

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उसके अपने आज़ाद ख्याल थे  फिर भी वो सिमटी हुई दुनिया के  उसूलों पे रहने लगी थी मगर फिर भी  जीने की चाह उसके अंदर दबी थी ! क्या उड़ना इतना मुश्किल है? या ऐसा सोचना भी पाप है?  और ऐसा सोचना कौन तै करता है? क्यों कोई आज़ाद नहीं इस संसार में? जब वो आया नहीं किसी दायरे में? मैं हूँ एक ज़िन्दगी, जीना चाहती हूँ  अपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी ! क्यों कोई रोके या टोके मुझे ? कोशिशें लाख करूँ मैं फिर भी  गर कोई बर्बादी की तरफ ही बढे  तब छोड़ भी देना चाहिए ये ज़िद  रहने दो बिन क्यारियों के सबको  के ज़िन्दगी का नाम है आज़ादी ! ज़िन्दगी है जिंदादिलों की! जियो गर कोई साथ दे या न दे  ज़िन्दगी, तू जीने के लिए ही है आयी  तो जियो ख़ुशी से ! तबाह कर हर उस वहम को उस  रिवाजों को और हर दया को  जो रोके हैं तुझे किसी बांध की तरह  क्योंकि तेरा काम है बेहना और  जीवन का नाम है सिर्फ चलना ! चलते जाना! न रुकने का नाम है  ज़िन्दगी!!!! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी जीने का नाम है ...!

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ज़िन्दगी में गर अकेले हो  तो साथ किसी को ले लो  फिर उन्हें साथ रखना न भूलो ! मोहब्बत का दावा करो ज़रूर  फिर मतलबी न बनो  मोहब्बत दावे पर नहीं टिकती ! नज़र रखते हो सब पर गुपचुप   दिखावा एक से प्यार का  हर हसीना को सन्देश भेजा न करो! तालियां बजती हैं दो हाथों से  ये न सोचो की कोई हमेशा मड़रायेगा  हमेशा अपना हाथ बढ़ाये रखो ! ज़िन्दगी जीने का नाम है  न जियो तब भी चलती है  किसी और का जीवन न जियो ! ~ फ़िज़ा 

चला जा रहा था ...

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चला जा रहा था  लाश को उठाये वो  न जाने कहाँ किस  डगर की ऒर  मगर था भटकता  न मंजिल का पता  दूर-दूर तक  न जानते हुए  किधर की ऒर  दिन हो या रात  धुप हो या छाँव  चला जा रहा था  तभी एक छोर  किसी ने  रोक के पुछा - कहाँ जा रहे हो भई !  यूँ लाश को उठाये ? चौंकते हुए  मुसाफिर ने  देखा अजनबी को  तो कभी खुद को  सोचने लगा  कहाँ जा रहा हूँ मैं ? लाश को ढाये ? सोच में ही  गुज़र गया  और वो चलता रहा  लाश को उठाये हुए !!! ~ फ़िज़ा 

इस ज़िन्दगी का क्या?

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जीने का जब मकसद ख़त्म हो जाये  तब उसे जीना नहीं लाश कहते हैं  लाश को कोई कब तक ढोता है? बदबू उसमें से भी आने लगती है...  क्यों न सब मिलकर खत्म कर दें  इस ज़िन्दगी को ? मरना आसान होता मदत नहीं मांगते  कोशिश भी करें? तो कहीं बच गए तो ? खैर, किसी को खुद का क़त्ल करवाने बुलालें  काम का काम और खुनी रहे बेनाम  मुक्ति दोनों को मिल जाये फिर  इस ज़िन्दगी का क्या? मौत के बाद की दुनिया घूम आएंगे  कुछ वहां की हकीकत को भी जानेंगे  समझेंगे मौत का जीवन जीवन है या  ज़िन्दगी ही केवल जीवन देती है? जो भी हो एहसास तो हो पाये किसी तरह  ज़िन्दगी तो अब रही नहीं मौत ही सही  इस ज़िन्दगी में रखा क्या है? ~ फ़िज़ा