Thursday, December 03, 2015

चला जा रहा था ...

चला जा रहा था 
लाश को उठाये वो 
न जाने कहाँ किस 
डगर की ऒर 
मगर था भटकता 
न मंजिल का पता 
दूर-दूर तक 
न जानते हुए 
किधर की ऒर 
दिन हो या रात 
धुप हो या छाँव 
चला जा रहा था 
तभी एक छोर 
किसी ने 
रोक के पुछा -
कहाँ जा रहे हो भई ! 
यूँ लाश को उठाये ?
चौंकते हुए 
मुसाफिर ने 
देखा अजनबी को 
तो कभी खुद को 
सोचने लगा 
कहाँ जा रहा हूँ मैं ?
लाश को ढाये ?
सोच में ही 
गुज़र गया 
और वो चलता रहा 
लाश को उठाये हुए !!!

~ फ़िज़ा 

1 comment:

kris1104 said...

Touching!!

उसके जाने का ग़म गहरा है

  जिस बात से डरती थी  जिस बात से बचना चाहा  उसी बात को होने का फिर  एक बहाना ज़िन्दगी को मिला  कोई प्यार करके प्यार देके  इस कदर जीत लेता है ...