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जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची !

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  तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ धर्म न था तब कोई बँटवारा । सबको मानें एक ही धारा ॥ दीवाली की मिठाई मिलती । ईद की सेवइयाँ भी खिलती ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ सुनने का था सबमें धैर्य । मन में न था छल कपट न वैर्य ॥ थाली एक, नज़रिया भिन्न । हँसी हटा देती सब क्षुब्ध मन ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ भाषाएँ अलग, पर मुस्कान । इशारों में मिलता सम्मान ॥ न भय किसी का, न दूरी थी । बस आदर ही आदर छायी थी ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ चोरी को मजबूरी कहते । करुणा से ही सारे हल लेते ॥ उषा-फ़रज़ाना संग खेल । मानवता का था जीवन मेल ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी को बदलते देखा है मैंने

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  ज़िन्दगी को बदलते देखा है मैंने  बचपन को जवानी में ढलते देखा है  साथ पढ़े दोस्तों को बदलते देखा है ! सुना जॉर्ज अंकल की बेकरी नहीं रही   वो अयप्पा मंदिर बहुत बड़ा बनगया अब  पेड़ों के पत्ते झड़कर फिर आ जाते हैं  दोस्ती में वो वफ़ादारी नहीं है अब  ज़िन्दगी को बदलते देखा है मैंने  बचपन को जवानी में ढलते देखा है  साथ पढ़े दोस्तों को बदलते देखा है !! पहले राम -रहीम साथ बैठते थे  अब वो आलम बहुत कम देखा है  खुलकर बोलने का रिवाज़ कम होते देखा है  सलाम न दुआ बस राम का चलन देखा है  ज़िन्दगी को बदलते देखा है मैंने  बचपन को जवानी में ढलते देखा है  साथ पढ़े दोस्तों को बदलते देखा है !!! वक़्त के साथ सबकुछ तो बदल जाता है  बचपन बचपन नहीं बस यादों में देखा है  उम्र के गुज़रते बहुत कुछ सीखा है मैंने  अपनों को दूर, दूसरों को अपनाते देखा है  ज़िन्दगी को बदलते देखा है मैंने  बचपन को जवानी में ढलते देखा है  साथ पढ़े दोस्तों को बदलते देखा है !!!! ~ फ़िज़ा 

कल और आज

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  जब भी घर लौटते है  बचपन आ जाता है  आज और कल के  झलक दिख जाते है   समय ये ऐसा ढीट है  एक जगह ठहरता नहीं  बीते कल और आज में  ये एक पल स्थिरता के  फिर ढूंढ़ता रहता है  मैं कौन हूँ ? क्यों हूँ? इन सवालों के जवाब  तब भी और अब भी  ज़ेहन में घूमते रहते हैं ! ~ फ़िज़ा 

दिवाली की शुभकामनाएं आपको भी !

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  दशहरे के जाते ही  दिवाली का इंतज़ार  जाने क्यों पूनावाली  छह दिनों की दिवाली  एक-एक करके आयी  दीयों से मिठाइयों से  तो कभी रंगोलियों से  नए कपड़ों में सजके  मनाया तो हमने भी  मगर सोच में हर वक्त  बचपन की दिवाली  पठाखे और फुलझड़ियों  में ही खो सा गया कहीं  अब तो दिवाली सिर्फ  दिलों में यादों में और  चंद लम्हों में क़ैद है  जाने कब ये रिहा होंगे  क़ैदख़ानों से ! ~ फ़िज़ा 

चाय की चुस्की

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  चाय की पत्ती पानी संग  कुछ उबाल दूध चीनी का   ढेर सारा प्यार दोस्ती का  चाय की चुस्की में मानों  सुख मिले सारे संसार का    दोस्ती और चाय के किस्से  जग-ज़ाहिर हैं कई ज़माने से  एक चुस्की और गयी थकान  गुज़रे कई सालों के साथ आयी  कई किस्से कहानियां बचपन की  वो अदरक की चाय और प्रशंसा  चुस्की बाद सभी का दुलार - प्यार मानों एक लम्बे सफर के बाद का  ठहराव !!! ~ फ़िज़ा 

माँ

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  माँ  इस शब्द में ही  वो ताकत है जो  जीवन तो देती है  मगर उसे सींचकर  मजबूत बनाती है  हर सुख-दुःख में  हौसला तो देती है  लड़ने की क्षमता  निडरता और संयम  का पाठ सिखाती है  पास नहीं तो दूर से ही  स्नेह के भण्डार से  वो मुस्कान लाती है  एक पल में कान खेंचकर  दो दूजे पल मुंह में निवाला  देने वाली माँ ही तो है  जो सिर्फ अपने बच्चों के लिए  जगती, फिक्रमंद होकर  आज भी पूछती है  खाना खा लिया न? स्नेह, धैर्य, का बिम्ब  है वो माँ ! ~ फ़िज़ा 

यादों का सफर

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  आज यूँही यादों के सफर में निकल गयी  जब हाथ पड़ा पुराने एल्बम पर  एक से दूजा तीजा मन खो गया  उन दिनों की यादें जैसे बचपन लौट आया  वो स्कूल के दिन और उन दिनों की आशाएं  छोटी परेशानियां पढ़ाई के तो खेल का मैदान  मानों सारा दुःख उसी मैदान में उंडेलते  घर से स्कूल और स्कूल से घर का रास्ता  इतना लम्बा नहीं था कभी जितना आज है  तब भी प्रकृति से एक रिश्ता बना लिया था  जहाँ यार-दोस्त हो न हों मगर पक्षियां थे  नदी-नाले फूल-क्यारियां और अमरुद का पेड़  कितने ही बार चढ़कर छत से छलांग लगाया है  काली-डंडा खेलते-खेलते तो कभी माँ के डर से  उन दिनों हर डांट में सहारा था टोनी कुत्ते का  जो चाटकर गाल सेहला भी देता गले लगा भी देता  किसी थेरपि से कम न था उसका साथ जीवन में  फिर हर सिरे के अंत समान वो भी गया और हम  स्कूल से कॉलेज के द्वार तक पहुंचे जैसे-तैसे  तो सभी को वहीँ पाया और फिर से रेस लगने लगी  वहां से भागे आज यहाँ हैं और आज भी भाग ही रहे हैं  आज सब कुछ तो है मगर बचपन तो बचपन है  उसकी बात...

फिर एक बार

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  वसंत बहार पर नूतन वर्ष के दिन   फिर एक बार बचपन याद आया  वो रात ही से माँ का थाली सजाना  सब्जियों, फलों अमलतास से सजे  कुछ धान्य, नारियल,सोना, चांदी  रुपये, नूतन कपडे, कृष्णा की मूर्ति  दिया और आइना सबकुछ थाल में  प्रातः रवि के आने से पहले पापा  मेरी आँखों पर हाथ रख ले जाते  थाल के समक्ष और फिर हाथ हटाते  आईने में अपना चेहरा देखते और  और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते  पापा 'विशु' की शुभकामना देते  और हाथ में कुछ रुपये थमाते  जिसे बड़ों का आशीर्वाद मानकर  उनके पैरों को छूकर गले लगते  कितनी सादगी थी उस ज़िन्दगी में  अमलतास के फूलों ने दिल लुभाया  तब से आजतक बेहद प्रिय हैं मेरे   वसंत ऋतू की इस श्रंखला में मेरा  बचपन फिर एक बार संवर उठा ! नूतन वर्ष की शुभकामनाएं आप सभी को ! ~ फ़िज़ा 

रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का

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  मोहब्बत तो चाँद से बहुत पुराना है  बचपन से लेकर आज तक याराना है  तब देखने को तरसते मचलता था मन  नयी उमंग उठने लगीं थीं मन में उससे  पूरे चाँद-रात को ख़ुशी से मचलते थे   अम्मी से कहते तब पूर्णिमा की रात है  सेवइयां बनाने की यूँही ज़िद करते थे  मीठा खाने की या चाँद से मोहब्बत  जो भी हो दोनों के होने का आनंद लेते  मोहब्बत परिपक्वता की सीमा पर है  आजकल चांदनी की सेज़ में सोते हैं  वो भी रात-भर बैठकर सुला देता है  डर नहीं उसके जाने का अपना जो है  ऐसा लगता है वो हरसू मुझे निहारता है  मिलन की सेवइयां अब खुद बनाती हूँ  मोहब्बत का स्वाद मन ही मन सहलाती हूँ   उसकी आगोश में यूँही फ़िज़ा महकाती हूँ रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का   अब तो हरसू कविता आंखें चार रेहती हूँ ! ~ फ़िज़ा 

बचपन जवानी मिले एक दूसरे से...

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मेरा बचपन याद आता है इस जगह  वही पहाड़ वही वादियां वही राह  वही पंछी झरना और वही राग  खुश हो जाता है मन इन्हीं सबसे  जब बचपन जवानी मिले एक दूसरे से ! कितने अच्छे थे वो दिन सब सादगी में  जलते सब थे मगर रहते थे अपनी धुन में  छोटी-मोटी चाह हर किसी के दिल में  रहते थे अपने दायरे और फासलों में  थी ही कितनी बड़ी वो दुनिया छोटी सी ! कम में भी एक सुकून सा था जीने का  फ़िक्र थी भी तो इतना नहीं जीने का  एक-दूसरे की क़द्र थी दिल से मुहब्बत का  आजकल आडंबरी हैं अपने और अपनों का  अपनी हस्ती का बवाल मचा रखा हर तरफ का ! ~ फ़िज़ा 

मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग ...!

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मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग  जब इतिहास के पन्नों से पलटे  कहानियां वीरों और वीरता की  अनायास मस्तिष्क की नज़रें गयीं  ढूंढ़ती स्कूल से उस कक्षा की ओर  कक्षा छात्र-छात्रों से भरा हुआ था  बुंदेले हरबोलों के मुंह से न सही  अपनी टीचर के मुंह से सुन रहे थे  सन सत्तावन की मर्दानी जो लड़ी थी  झाँसी वाली रानी थी ! सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते अकस्मात  सोच में पड़ जाते थे काश! उस वक्त  हम भी उस सेना में भर्ती हो पाते थे  मर्दानी जैसी न सही साथ उसका देते थे  ऐसे वीर कहानियों से हौसले बुलंद होते  स्कूल की घंटी बज भी जाती फिर भी  मस्तिष्क में, खूब लड़ी मर्दानी वाली  कविता याद आ जाती थी किसी तरह वो स्वतन्त्र की चिंगारी  हमरे अंदर भी जला जाती थी ! मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग  यूँही ख्यालों और ख्वाबों में वो लोग  जो मातृभूमि के लिए वीरगति पा गयी थीं !! ~ फ़िज़ा 

दोस्ती !!!

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दोस्ती किसे कहते हैं?  कभी सुना कहानियों में  तो कभी देखा फिल्मों में  ज़िन्दगी कई तरह से हमें  दिखाए और सिखाये सीख  बचपन के पले बढे साथी  सालों बाद जब मिले दोस्त  जस्बे में तो दिखाई दोस्ती  दोस्ती निभाने में कर गए कंजूसी ! कुछ साल पहले मिले मेले में  मचाया धुम खाया-पिया मज़े में  वक़्त आया कुछ खरीदने की  तो कहा मेरे लिए भी ले लो कुछ  पैसे बदलकर डॉलर- रुपये में  किसी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं  हँसते-खेलते तस्वीर खींचाते  निकल आये मेले से हम दोस्त ! उंगलियां होतीं हैं अलग-अलग  शायद यही मिसाल ली मैंने  एक बिना कहे पूरी करे आरज़ू  बदले में पैसे की बात न करना  ऐसी धमकी देते हुए खरीद लिया  दिल सोचते रेहा गया परेशान  दोस्ती आखिर क्या है? उम्र के इस दायरे में आकर  जहाँ ज़िन्दगी को जी कर  ज़िन्दगी को जानकर देखा  फिर भी न कर पाए लोग फर्क  इंसान और पैसों के वज़न में   ज़िन्दगी शायद तेरा ही है कसूर  कु...

गर्मी वाली दोपहर...!

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ऐसी ही गर्मी वाली दोपहर थी वो हर तरफ सूखा पानी को तरसता हुआ दसवीं कक्षा का आखिरी पेपर वाला दिन बोर्ड की परीक्षा पढ़ाई सबसे परेशान बच्चे मानसिक तौर से थके -हारे दसवीं के विद्यार्थी पेपर के ख़त्म होते ही घर का रास्ता नापा न आंव देखा न तांव देखा साइकिल पे सवार घर पहुँचते ही माँ ने गरम-गरम खाना परोसा भरपेट भोजन के बाद नींद अंगड़ाई लेने लगी गर्मी के दिन की वो नींद भी क्या गज़ब की थी बाहर तपती ज़मीन, आँखों में चुभते सूरज की लौ घर के अंदर पंखे की ठंडी हवा की थपथपाहट और पंखें की आवाज़ मानो लोरी लगे कानों को एकाध बीच में कंकड़ों की आवाज़ जो की कच्चे आमों से लगकर ज़मीन पर गिरती मानो अकेलेपन को बिल्कुल ख़त्म करती सुहाने सपने लम्बी गहरी नींद की लहरें अचानक दोस्तों की टोली टपकती पानी के छींटें बस नाक में दम था आये थे बुलाने डैम में चलो नहाने गर्मी का मौसम और ठन्डे पानी में तैरना सोचकर उठा जाते-जाते बोल गया 'अभी आता हूँ अम्मा ' कहकर चला गया फिर जब वो आया तो कफ़न ओढ़कर आया अव्वल नंबर का तैराक था वो फिर क्या हुआ? शायद बुलावा आगया परीक्षा जो ख़त्म हुआ महीनो बाद रिजल्ट आया बहनों ने जाकर देखा मुन्ना अव्वल...

काश! लौट आता वो मधुर जीवन !

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गगन में खुली आसमान में पंछियों को उड़ते देखा जब मधुर बचपन याद आया तब परिंदों से कभी सीखा था मैंने नील गगन में उड़ते-फिरते एक डाल से दूसरे डाल पर पकड़म-पकड़ाई खेलना और पास आते ही फुर्र हो जाना बातों से कुछ और याद आया पेड़ों पर चढ़कर काली-डंडा बंदरों की तरह झलांग लगाना कितने ही विस्मर्णीय थे दिन शामों को जब घर-आँगन में दिया जलाते पीछे से बुलावा आये हाथ-मुंह धोकर हाथ जोड़ लो सद्बुद्धि के लिए दुआ कर लो कितने मासूम थे वो पलछिन आज परिंदों को देख याद आया काश! लौट आता वो मधुर जीवन ! ~ फ़िज़ा #happypoetrymonth

बहुत दूर का सफर तय हुआ जब हुआ..!

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यूँ ही खिड़की से जब बाहर देखा सूरज की मुस्कान को पहले देखा ताड़ के पत्तों को हिलते-डुलते देखा कुछ पंछियों को गगन में चहचहाते देखा कुछ तो बिजली के तारों पर झूलने लगीं  यही दृश्य बचपन की याद दिला गया ऐसी ही खिड़की मेरे कमरे में भी थी जहाँ से संसार की ख़ुशी झलकती थी बस फर्क सिर्फ इतना ही था तब पंछी अपने लगते थे पेड़ आमों के होते थे आज कुछ अजनबी पेड़ों को देखा  मन अनायास उन खिड़कियों में झांकने लगा बहुत दूर का सफर तय हुआ जब हुआ सोचा नहीं था तब इतनी दूर आजायेंगे चलते-चलते हम कहाँ के थे और कहाँ के हो गए? ~ फ़िज़ा  #happypoetrymonth

मेरा बचपन खो गया कहीं!

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आज कहीं मेरा बचपन खो गया  एक बहुत बड़ा हिस्सा बचपन का  जिसे संवारने में मामा का प्यार था  शांत किन्तु गंभीर स्वाभाव के थे  मगर दिल के प्यारे और गुनी थे  उनकी दुलारी सबसे प्यारी भांजी  कोई और नहीं मगर मैं थी! जहाँ भी रहे हम पास या दूर  दिल में प्यार की गर्मी नहीं हुई कम  वक़्त मिले जब भी मिलने आये हम  फिर एक ऐसा भी वक़्त आया  अस्वस्थ की खबर ले गया हमें फिर  वहीं उनसे पुराने दिनों की यादों को  संग लिए दिल में मिलने चले थे  खुश था दिल वक़्त बे वक़्त ही सही  नज़रों के सामने थे तो सही मगर  ज़िन्दगी का भी एक ऐसा खेल है  जब सब कुछ अच्छा हो ऐसा लगे  तभी उसकी चाल बेहाल करे ! आज विदाई का दिन है ऐसा  कहा जब मुझ से सवेरे सवेरे  दिल एक पल के लिए हो गया  बोझल, मेरा बचपन खो गया कहीं! अब तो बस रहा गयीं यादें जो  सताएंगी हमेशा मुझे! ~ फ़िज़ा 

वो शाम याद आती है मुझे ...!

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वो शाम याद आती है मुझे  जब रंगोली से भरा बरामदा  और दीयों की कतार में  रौशनी का हवा से बतियाना  लोगों की चहल-पहल तो  कहीं बच्चों का उल्लास  हर तरफ रौशनी और  हर किसी के मुख में मिठाई  दोनों हाथों में भरा पटाखा  कभी में जलाऊं तो कभी वो  खेलते-खाते गुज़र जाते  छे के छे दिन  आता जब सातवे की सुबह  हर तरफ कागज़ों की  बिछी कालीन  जमा करते सभी एक ओर  लगते उसमें भी आग हलकी सी  जाने कुछ बची हुई लड़ी ही सही  आग सेख़ते -सेख़ते बज उठतीं  यूँही दिवाली को करते अलविदा  मिठाइयों की मिठास से  करते परहेज़ खाने से  फिर देखो थालियों से भरा  मिठाई का डब्बा घर में आ चला  देखते -देखते एक और साल  निकल गया !  ~ फ़िज़ा 

खुश हूँ! चंद दोस्त हैं अब रह गए इस तरह...!!!

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मैं देखती हूँ इन नज़ारों को कुछ इस तरह  मानो मुंह दिखाई का रस्म हो जिस तरह  हर चीज़, जगह बदल चुकी है इस तरह  मानों जैसे मौसम बदलता हो किसी तरह  हर सेहर और पहर घूरतीं हैं मुझे इस तरह  मानों अजनबी हूँ इस शहर में किसी तरह !! खुश हूँ! चंद दोस्त हैं अब रह गए इस तरह  याद दिलातें हैं बचपन के खुशबु की तरह मस्ती और उनकी हस्ती सुनहरी धुप की तरह वो अब भी नहीं बदले गुज़रे वक़्र्त की तरह    हँसी की कल-कल बहती जल की धारा यही महसूस होता है ज़िंदा हैं हम इस तरह !!    ~ फ़िज़ा 

बहुत सालों बाद बचपन लौट आया था

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बहुत सालों बाद बचपन लौट आया था  किसी से इतने पास होने का एहसास अब हुआ था  जाने कैसे बिताये इतने साल ये अंजाना था  कुछ देर के लिए मानो भूल गया वक़्त हमारा था  लगा हम लौट आये स्कूल की कक्षा में फिर  उसी बेंच पर बैठकर बातें कर रहे थे कुछ देर  भेद-भाव न था आज फिर भी मिलन पुराना था  मानो जैसे पानी और दूध का मिलन था  मिलने की देरी थी फिर जुदा न हो पाना था  लौट आये हैं अपने घरोंदों में अब लेकिन  एक बड़ा हिस्सा छोड़ आये उन्हीं गलियों में  जहाँ हम सब पले -बढे और खेले थे !!! ~ फ़िज़ा