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वो मेज़ याद आती है!

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  याद आती है वो मेज़, जो कमरे की खिड़की से झाँकती नज़रों के साथ ही कहीं खो जाती थी। किताबें खुली रहतीं सामने, होमवर्क के बहाने, मगर न जाने क्यों वो खिड़की मुझे बहला ले जाती— दूर, बहुत दूर, प्रकृति की छाँव में। कभी किसी आहट से, कभी किसी पंछी की आवाज़ से अचानक चौंकती, तो याद आता— अरे! किताबें तो खोली थीं होमवर्क के लिए... मगर मन तो कब का उन पन्नों से निकलकर उस खिड़की के पार हरियाली में जा बसा था। ~ फ़िज़ा

एक शाम—चाय की चुस्की और दोस्ती के नाम।

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  दोस्ती भी चाय की तलब-सी है, जब लगे तो मिले बिना कहाँ रहती है। झटपट फोन घुमाया, मिलने का वक्त और जगह तय हो आई, फिर फोन रखने की देर थी बस— एक प्यारी-सी शाम चली आई। चाय की चुस्कियों में कुछ बातें घुलीं, कुछ हँसी की फुहारें खुलीं, कुछ पुरानी यादें फिर मुस्कुराईं, कुछ अनकही बातें दिल तक उतर आईं। न कोई खास वजह, न कोई बहाना, बस दोस्तों का साथ और चाय का प्याला, हर घूँट में अपनापन, हर पल में पुराना-सा अफसाना… कुछ रिश्ते ऐसे ही तो खास होते हैं, चाय की तरह— कम हों तो याद आते हैं, मिलें तो दिल भर जाते हैं। एक शाम—चाय की चुस्की और दोस्ती के नाम। ~ फ़िज़ा

अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो।

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  सड़क यूँ ही चुपचाप चली, जैसे कोई सफ़र अधूरा हो, बादलों ने आसमान ओढ़ लिया, मानो दिल थोड़ा सा भरा हो। धूप कहीं बादलों में छुपकर, धीरे से झाँकना चाहती है, जैसे मुश्किलों के इस मौसम में, उम्मीद अभी भी मुस्काती है। पेड़ों की खामोश कतारें, वक़्त के संग झूम रही हैं, कुछ सूखी शाखें भी शायद, नई बहारें ढूँढ रही हैं। रास्ते खाली सही मगर, मंज़िलें फिर भी रहती हैं, हर धुंधली सी राह के आगे, रोशनियाँ भी बहती हैं। ये मौसम भी कहता जैसे— रुकना नहीं, बस चलते रहो, बादल चाहे जितने घने हों, अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो। ~ फ़िज़ा

अच्छा लगता है।

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  अपने संग रहना, अपने संग वक़्त बिताना अच्छा लगता है, ख़ुद से बातें करना, ख़ुद को समझाना अच्छा लगता है। जगह नई हो या पुरानी, अनजानों का भी साथ कभी, भीड़ में खोकर भी दिल को बहलाना अच्छा लगता है। चारों ओर नफ़रत, द्वेष की आग भले ही फैली हो, दिल में थोड़ी सी मोहब्बत बचाना अच्छा लगता है। सिर्फ़ बेजान पुतलों में ढूँढें जब लोग दोस्ती, ऐसे रिश्तों से दूरी बनाना अच्छा लगता है। कैसा वक़्त ये आ पहुँचा है दुनिया के आँगन में, सच को कह देना भी अब तो सताना अच्छा लगता है। खुशहाली, साफ़दिल और प्यार अगर हो दरमियाँ, एक-दूजे के लिए दिल से निभाना अच्छा लगता है। ‘फ़िज़ा’ जाने क्यों आजकल इंसानों से ज़्यादा, ख़ामोश पुतलों का साथ निभाना अच्छा लगता है। ~ फ़िज़ा

जीते रहो।

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  ज़िंदगी— कोई किताब नहीं जो एक बार पढ़ ली और सब समझ आ गया। हम सोचते थे— स्कूल, कॉलेज, डिग्री… बस, यहीं तक है सीखना। लेकिन— ज़िंदगी ने सिखाया, कि असली क्लासरूम तो हर दिन है। हर गिरना— एक लेसन। हर संभलना— एक जवाब। हम बड़े तो हो गए— पर समझदार? अभी भी बन रहे हैं। और हाँ— ये सफ़र रुकता नहीं… जब तक साँस है, सीखना जारी है। मंज़िल? शायद मौत। पर तब तक— सीखते रहो, जीते रहो। ~ फ़िज़ा 

अदा है उसकी ..!

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  ज़िन्दगी है या ज़िंदादिली — अदा है उसकी, दोस्ती है या दोस्ताना — वफ़ा है उसकी। मुस्कराहट से जगमग करता हर एक चेहरा, नवदीप सी रोशन हर दिशा है उसकी। न केवल परिवार को प्रेम से जोड़े, दोस्तों में भी अलग ही जगह है उसकी। आओ आज नवी को दिल से हम मनाएँ, जन्मदिन की घड़ी को यादगार बनाएँ। दुआओं से भर दें हम उसकी ज़िंदगानी, खुशियों के फूल हर राह में सजाएँ। ~ फ़िज़ा 

बरसाती एहसास

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 बारिश की बूंदों में अश्क़ उतर आते है दोस्तों के साथ से ग़म संवर जाते हैं ! आग दिल में जले तो नूर भी साथ लाती है, हद से बढ़े तो ख़ुद को ही राख़ कर जाती है। कभी लम्स बनकर बारिश रूह को छू जाए, कभी सैलाब बनकर हर वहम बहा ले जाए। ज़िंदगी की कश्ती मौजों के दरमियाँ चले, कभी सजदे में झुके, कभी खुद में संभले। बरसाती छाते सी हालत, उलट-पुलट का सफ़र, फिर भी चलती रहती है साँसों की ये डगर। साल आते हैं, जाते हैं, वक़्त का क्या गिला, ज़िंदगी मुख़्तसर सही, इश्क़ से हो सिलसिला। सूरज पैग़ाम-ए-हयात दे, चाँद भी ‘फ़िज़ा’ नूर लुटाए, ज़िंदादिली में जो जी ले, वही मुकम्मल कहलाए। ~ फ़िज़ा 

अच्छा लगता है !

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  इन दिनों सब कुछ अच्छा लगता है  किसी को अच्छा लगे या न लगे  मुझे सब अच्छा लगता है ! सैयम और अनुशासन खुद पर  ज़िन्दगी काफी व्यस्त हो गयी है  मुझे अब सब अच्छा लगता है ! नए लोगों से मिलना जुलना  नए शौक नया कुछ सीखना  अब ये सब अच्छा लगता है ! अब मैं खुद पे ध्यान देती हूँ  व्यायाम भोजन सोने पे है मनन   पहले से और अच्छा लगता है ! रोटी कपडा कसरत है ज़रूरी  जीवन के सादगी में है ख़ुशी  ये एहसास अच्छा लगता है ! किसी को फर्क पड़े या नहीं  मुझे फर्क अब नज़र आता है इसीलिए सब अच्छा लगता है ! ~ फ़िज़ा 

दोस्ती

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  दोस्ती क्या होती है कभी सोचा है? रोज़ न मिलें फिर भी स्नेह हो! रोज़ बातें न हों मगर विश्वास हो ! दोस्ती में सिर्फ एक नियम होता है~  प्यार और विश्वास बरकरार रहे ! ज़िन्दगी लंबी नहीं मगर अच्छी हो ! दोस्तों का साथ अपनों का साथ! ख़ुशी के चार बोल सहानुभूति से भरे ! जीने को और सुखद बना दें दोस्त ! किसी ने सच कहा है - 'दुनिया हसीनों का मेला, मेले में ये दिल अकेला ! एक दोस्त ढूंढ़ता हूँ मैं दोस्ती के लिए !' ~ फ़िज़ा 

ये वैलेंटाइन का दिन

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  ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में गुज़र गए पल  कहाँ फुरसत सोचने की कैसा होगा कल ! हरदम साथ में हैं और सब कुछ साथ है  मुद्दे की बात न हो ऐसा भी अक्सर होता है ! अनियोजित मुलाकात कुछ ऐसा रंग लायी  ज़िन्दगी के बाकि हिस्से की तयारी हो गयी ! उसने कहा, ज़िन्दगी तो बस तुम्हारे ही साथ है  निवृत्ति से पहले हमें साथ दुनिया घूमना है ! कुछ लम्हों की मुलाकात और बातों ने मुझे  ज़िन्दगी-भर जीने की ऊर्जा और ख़ुशी देदी  ! ये वैलेंटाइन का दिन भी कितना गज़ब है  प्यार के नए बीज़ बोने की जगह बना गयी ! ~ फ़िज़ा 

उसके ग़ुस्से पर भी प्यार आता है

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  उसके ग़ुस्से पर भी प्यार आता है  क्यूंकि प्यार जो मुझ से ज्यादा है  !! उसका पेहल न करना अखलाता है  मगर मेरे पेहल का इंतज़ार करता है !! उम्मीद बनाये रखना भी प्यार ही है  वर्ना पलटकर सोते ही हाथ न पकड़ता !! खट्टा-मीठा प्यार कश्मीरी चाय जैसे स्वाद दोनों का मिले इश्क़ हो ज्यादा !! आज भी नयापन है रिश्ते में बरसों से  वो गुदगुदाहट जब वो धीमे से मुस्कुरा दे !! नयी कोपलें नयी चिंगारियाँ अदभुत सा  नये मौसम में मोहब्बत हौसलेमंद सा !! ~ फ़िज़ा 

सहानुभूति !!!

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  ज़िन्दगी के चंद हसीन पल ज़िन्दगी बनाने में सफल हैं  वर्ना यहाँ आये दिन तीखे शब्दों के बाण क्या कम हैं? शुक्र है चंद ऐसे भी हैं जो न जानते हुए भी समझते हैं  वर्ना हर कोई अपनी अपेक्षाओं की थाली परोसे हैं ! कहाँ मिलते हैं लोग जो "मैं" को छोड़कर आप में बसे  यहाँ तो हर कोई खुदी में खुदा बना नज़र आता है ! जग से हर किसी को उठना है एक न एक दिन 'फ़िज़ा'  यहाँ इंसान एक दूसरे की नज़रों से ही उठा जा रहा है ! रेहम! दोस्तों ऐसे भी हैं जो अंदर ही अंदर कूटते हैं  कुछ सहानुभूति के अल्फ़ाज़ नहीं तो इशारा ही दे दें ! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी दे उम्मीद

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  ज़िन्दगी दे उम्मीद तु उसे नज़रअंदाज़ न कर  ये ज़िन्दगी के वो ईशारे हैं जो बुलंद कर दे ! हस्के मिलो सभी से दुश्मनी कहाँ है किसी से   खाली हाथ आये तो खाली हाथ ही जाएंगे ! दुरी रखो जहां तख़मीना हो जल जाने का  इंसान से क्या डरना जब मरना है सबको ! रिश्ते प्यार के बन भी जाये कभी विषाक्त  दोस्ती के नाम से हुतात्मा निरर्थक है दोस्त ! ज़िन्दगी है जब तक तू जीवित है फ़िज़ा  मरकर भी क्या कोई जी सका है यहाँ !! फ़िज़ा 

अच्छी यादें दे जाओ ख़ुशी से !

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  गुज़रते वक़्त से सीखा है  गुज़रे हुए पल, और लोग  वो फिर नहीं आते ! मतलबी या खुदगर्ज़ी हो  एक बार समझ आ जाए  उनका साथ फिर नहीं देते ! पास न हों पर अच्छे हों  बात रोज़ न हों पर सच्चे हों  ऐसों को हमेशा साथ रखें ! हर कोई जूझ रहा ज़िन्दगी में  टेढ़े मुह बात भी करे तुमसे सहानुभूति रखें सभी से ! ज़िन्दगी सिर्फ चार पल की  अहंकार में खोना न सच्चे रिश्ते  अच्छी यादें दे जाओ ख़ुशी से ! ~ फ़िज़ा 

सुना है इलेक्शन बस एक खेल है !!

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  हर तरफ एक खौफ सा माहौल है  सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है  अब तक इतनी उत्तेजना नहीं थी कभी  फिर आज-कल में क्या होगया ऐसा ? सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है ! पेहले ये नहीं तो वो पार्टी जीतेगी बस  सब कुछ तो अच्छा ही चल रहा है  एक साल इसे तो दूजे में उसका राज  माहौल तो वोही है जैसे थे वैसे हैं  सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है ! ये खौफ क्यों? इलेक्शन ही तो है  किसी ने कहा इस डर की वजह  यहां की जनता ही है जिसने चुना  ट्रम्प, निठल्ला नफरत फैलाने वाला   सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है ! डरना तो पड़ेगा अपने हक़ की बात है  किसी बन्दर के हाथ में तलवार देकर   राजा भी खुद की नाक न बचा पाया  डरना क्या, वोट दो जनहित के लिए  कमला को लाओ इलेक्शन तो खेल है ! सुना है इलेक्शन बस एक खेल है !! ~ फ़िज़ा 

अम्मा का प्यार

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दुःख क्यों होता है ये ऑंसूं क्यों नहीं रुकते  २००५ में मिली थी तुमसे न सोचा कभी  इस कदर स्नेह भर दोगी अपने वास्ते ! पहली मुलाकात और ढेर सारा प्यार  जहाँ भी जाती संग ले जाती हर जगह  अपनायियत और स्नेह से बांध लिया ! भेदभाव न किया बेटी और बहु में  जो भी दिया इज्जत और प्यार से  मुझ ही से मुझे छीन लिया इस कदर ! आज दिल रो रहा है यादों में समेटे हुए  कुछ मोहलत और मिल जाती हमें  कुछ और लम्हे बिता पाते संग तुम्हारे ! ढूंढ रहे हैं तस्वीरों में अब भी तुम्हें  आंसू मगर क्यों नहीं थमते मेरे  तुम्हारे चुटकुलों को सोच बहते हैं आँसू मेरे ! इस कदर छाप छोड़ गए हो दिल पर  तुम सा बनने की कोशिश करेंगे ज़रूर  जाते हुए भी प्यार की सीख दे गयी ! ~ फ़िज़ा   

वक्त के संग बदलना चाहता हूँ !

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  मैं तो इस पल का राही हूँ  इस पल के बाद कहीं और ! एक मेरा वक़्त है आता जब  जकड लेता हूँ उस पल को ! कौन केहता है ये पल मेरा नहीं  मुझे इस पल को जानना है ! नया दौर नयी दिशा सही है मगर  वक्त के संग बदलना चाहता हूँ ! इस पल से इस पल के लोगों से  मैं मिलकर राह बढ़ाना चाहता हूँ ! तुम मुझे अपना सको तो जानूँ दोस्त  मैं हारने वालों में से तो हूँ ही नहीं !!! ~ फ़िज़ा 

ज्योति, जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ

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  उसकी सादगी सीरत से है सूरत से नहीं  उसका दिल भी किसी हीरे से कम नहीं ! जहां गंभीर हो स्तिथि तो सवेंदन कम नहीं  वहीँ गाना बजे तो ठुमकेदार इस सा नहीं ! बातें तो सब करते हैं ये भी कोई कम नहीं  जब आँखों से बोलतीं हैं उसका जवाब नहीं ! फुर्ती है मस्ती है बच्चों सी संस्कारी कम नहीं  ये 'ज्योति', इसका प्रकाश दिये से कम नहीं ! ऐसी दोस्त सबको मिले जो फर्क करती नहीं  आज मिलो या बरसों उसका प्यार घटता नहीं ! 'फ़िज़ा' यही दुआ करे तेरी खुशियों में कमी नहीं  पचास साल और आये किसी की लगे नज़र नहीं ! खुश रहती है ख़ुशी बांटकर कमज़ोर तो है नहीं  सादगी और मोहब्बत को समझना निर्बल नहीं !!! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी जीने के लिए है

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कल रात बड़ी गहरी गुफ्तगू रही  ज़िन्दगी क्या है? क्या कुछ करना है  देखा जाए तो खाना, मौज करना है  फिर कहाँ कैसे गुमराह हो गए सब  क्या ऐसे ही जीना है ज़िन्दगी हमें  कुछ पल की बात है फिर कौन कहाँ  चलो आज से जीने के नियम बनाएं  ख़ुशी के लिए एक दिन निर्धारित करें  घूमें-फिरें मस्ती करें ज़िन्दगी को लूट लें बाकी तो सब चलता रहेगा ज़िन्दगी है  पटरी पर है तो चलता भी रहेगा बेझिझक  महीने में एक दिन अपने हित के लिए रख छोड़  ज़िन्दगी जीने के लिए है, यूँही गंवाना नहीं है !!! ~ फ़िज़ा   

Kyun?

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  Zindagi jeene ke liye hai, To kyun  hum auron ko jeene se rokte hain? Dusron ko khush dekh, Kyun nahi Usmein hum shamil hote hain? Ye irsha, dwesh, bhedbhav Kyun? Insaan hain, insaani dard jaante hain Phir kyun Khud ko auron se alag Samajhte hain? Aakhir kyun? ~fiza