अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो।
सड़क यूँ ही चुपचाप चली,
जैसे कोई सफ़र अधूरा हो,
बादलों ने आसमान ओढ़ लिया,
मानो दिल थोड़ा सा भरा हो।
धूप कहीं बादलों में छुपकर,
धीरे से झाँकना चाहती है,
जैसे मुश्किलों के इस मौसम में,
उम्मीद अभी भी मुस्काती है।
पेड़ों की खामोश कतारें,
वक़्त के संग झूम रही हैं,
कुछ सूखी शाखें भी शायद,
नई बहारें ढूँढ रही हैं।
रास्ते खाली सही मगर,
मंज़िलें फिर भी रहती हैं,
हर धुंधली सी राह के आगे,
रोशनियाँ भी बहती हैं।
ये मौसम भी कहता जैसे—
रुकना नहीं, बस चलते रहो,
बादल चाहे जितने घने हों,
अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो।
~ फ़िज़ा

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