पाँच बजे का इंतज़ार


 

रास्तों की गलियों की आवाज़ें
जगाकर रखती हैं पहरेदार,
जब घर में सब चले जाते हैं
अपने काम और अपने विचार।

उनके आने का इंतज़ार
बेसब्री से रहता है हमेशा,
आते-जाते, और कुत्ते भी नज़र आते हैं,
जो मेरी राह में चिड़ा कर जाते हैं।

मगर मैं भी तो इंतज़ार करती हूँ 
अपने समय का, अपने पल का।
शाम होती है, पाँच बजे…
मुझे भी लीश डाल कर ले जाते हैं
घूमने, हवा में सांस लेने।

कब बजेंगे पाँच के घंटे?
कब आएंगे मुझे घुमाने वाले?
ये सवाल हर दिन के साथ
मेरे दिल में गूँजते रहते हैं।

~ फ़िज़ा

Comments

Popular posts from this blog

ऐ दुनियावालों ...

ज़िंदगी तेरे तो खेल निराले हैं

वो भी क्या दिन थे...!