मैंने अपनी एक दुनिया
ये सच है, मैंने अपनी एक दुनिया बसा ली है,
चाँद सितारों की छाँव में खुद को सजा ली है।
जहाँ शोर-ए-जंग से दूर है मेरा ये छोटा सा जहाँ,
प्रकृति के घेरे में मैंने अपनी जगह बना ली है।
इधर दुनिया जल रही है नफरत की ललकार में,
उधर मासूमियाँ खोतीं—ये कैसी अंधी गली है।
किसी के पास सब कुछ है, फिर भी खालीपन सा,
किसी के पास छत नहीं—बस ज़मीं ही बिछा ली है।
कोई कार में रातें काटे, कोई आसमान तले,
ये फ़ासलों की सच्चाई दिल में उतर चली है।
क्या कहें, किससे कहें, कौन सुनेगा यहाँ,
हर आवाज़ जैसे खामोशी में ही ढल चली है।
तो मैंने भी अपनी एक खामोश दुनिया चुन ली,
चाँद सितारों संग ही अब मेरी ये हमसफ़र बनी है।
हम सब ढूँढते फिरते हैं कोई सुरक्षित सा कोना,
और खुद के ही अंदर कहीं दुनिया समा ली है।
ज़िन्दगी भी अजीब है—एक बुलबुला सा सफ़र,
पल में बनती-बिखरती, यही उसकी असली कली है।
~ फ़िज़ा

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