ओ चाँद
चाँद की ये आधी सी मुस्कान,
जैसे कोई अधूरी सी जान।
खामोशी में भी कितनी बातें,
हर रात मुझे ये समझाए।
काली रात की गोद में सिमटा,
सफेद सा ये कोमल नूर,
दूर होकर भी कितना अपना,
जैसे दिल के सबसे पास हुज़ूर।
तेरी ये आधी सी झलक ही,
मेरे पूरे ख्वाब सजा जाती है,
ओ चाँद, तू पूरा हो या आधा,
मेरी दुनिया तो तुझसे ही जगमगाती है।
तेरे दाग भी मुझे प्यारे हैं,
तेरी खामोशी भी गीत लगे,
तू बोले ना फिर भी हर पल,
मुझसे अपनी प्रीत कहे।
मैं भी तेरी तरह अधूरी,
तू भी मुझ सा थोड़ा सा,
शायद इसी अधूरेपन में ही,
हमारा रिश्ता है पूरा सा।
~ फ़िज़ा

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