विषु का उत्सव


 

सुनहरी सी ये डाल, जैसे विषु का पैगाम है,
कोन्ना के फूलों में बसता केरल का हर अरमान है।

सुबह की पहली किरण संग, जब ये आँगन में सजता है,
हर घर के कण-कण में तब, खुशियों का ऐलान है।

कणिक्कोन्ना की छांव तले, विषुक्कणि जब सजे सवेरा,
हर पीली पंखुड़ी में छुपा, समृद्धि का सम्मान है।

मंदिरों से आती धुन में, इन फूलों की महक घुली,
हर थाली, हर आरती में, इनका ही गुणगान है।

बचपन की यादों में भी, ये रंग यूँ ही बस जाते हैं,
माँ के हाथों सजा वो दृश्य, आज भी दिल की जान है।

ये फूल नहीं, ये परंपरा है, पीढ़ियों का अभिमान है,
विषु के हर उत्सव में, कोन्ना का ही स्थान है।

~ फ़िज़ा

Comments

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 21 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
Anita said…
सुंदर फूलों के सम्मान में लिखी सुंदर रचना
Dawn said…
Digvijay ji aapka bahut shukriya aur abhar!
Dawn said…
Anita ji, aapka bahut bahut shukriya, abhar!
बेहतरीन रचना
इन फूलों की कल्पना ही भाव-विभोर कर देती है। उजाला सा फैल जाता है चारों तरफ़ । मनोहर वर्णन। नमस्ते।

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