वो भी क्या शाम थी..


 

वो भी क्या शाम थी, दिल में अजीब सा गुमान था,
मैं भी चल पड़ी थी, वो भी कहीं रवाना था।

उस पार मुझसे दूर, पर किसी के पास जा रहा था,
फ़ासलों में छुपा जैसे कोई अपना सा अफ़साना था।

रूठा-सा, खामोश मगर, कदम बढ़ाता जा रहा था,
लब चुप थे उसके, पर दिल में शोर पुराना था।

मैं बस खड़ी सोचती रही, उस पल की गिरह में,
क्यों जाना है उसे, जब लौट कर फिर आना था।

शाम की उस धुंध में, कुछ सवाल रह गए यूँ ही,
हर जुदाई में छुपा जैसे मिलने का बहाना था।

~ फ़िज़ा

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