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ओ चाँद

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  चाँद की ये आधी सी मुस्कान, जैसे कोई अधूरी सी जान। खामोशी में भी कितनी बातें, हर रात मुझे ये समझाए। काली रात की गोद में सिमटा, सफेद सा ये कोमल नूर, दूर होकर भी कितना अपना, जैसे दिल के सबसे पास हुज़ूर। तेरी ये आधी सी झलक ही, मेरे पूरे ख्वाब सजा जाती है, ओ चाँद, तू पूरा हो या आधा, मेरी दुनिया तो तुझसे ही जगमगाती है। तेरे दाग भी मुझे प्यारे हैं, तेरी खामोशी भी गीत लगे, तू बोले ना फिर भी हर पल, मुझसे अपनी प्रीत कहे। मैं भी तेरी तरह अधूरी, तू भी मुझ सा थोड़ा सा, शायद इसी अधूरेपन में ही, हमारा रिश्ता है पूरा सा। ~ फ़िज़ा 

ये इश्क़ चाँद से

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  ज़िंदगी की चाह ने कुछ ऐसा कर दिया है, चाँद को बचपन से ही अपना हमसफ़र बना लिया है। किसी की दोस्ती का हो या न हो एहसास, चाँद के  मोहब्बत ने रूह तक छू लिया है। बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन, हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है। आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे, लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है। उम्मीद है एक दिन वो खुद चले आएगा यहाँ, जैसे मैं हर गली-नुक्कड़ उसका पीछा करती आई हूँ। ‘फ़िज़ा’ ये इश्क़ चाँद से यूँ ही नहीं हुआ, हर रात उसे देखकर दिल को समझा लिया है। ~ फ़िज़ा 

जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची !

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  तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ धर्म न था तब कोई बँटवारा । सबको मानें एक ही धारा ॥ दीवाली की मिठाई मिलती । ईद की सेवइयाँ भी खिलती ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ सुनने का था सबमें धैर्य । मन में न था छल कपट न वैर्य ॥ थाली एक, नज़रिया भिन्न । हँसी हटा देती सब क्षुब्ध मन ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ भाषाएँ अलग, पर मुस्कान । इशारों में मिलता सम्मान ॥ न भय किसी का, न दूरी थी । बस आदर ही आदर छायी थी ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ चोरी को मजबूरी कहते । करुणा से ही सारे हल लेते ॥ उषा-फ़रज़ाना संग खेल । मानवता का था जीवन मेल ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ ~ फ़िज़ा 

ये वैलेंटाइन का दिन

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  ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में गुज़र गए पल  कहाँ फुरसत सोचने की कैसा होगा कल ! हरदम साथ में हैं और सब कुछ साथ है  मुद्दे की बात न हो ऐसा भी अक्सर होता है ! अनियोजित मुलाकात कुछ ऐसा रंग लायी  ज़िन्दगी के बाकि हिस्से की तयारी हो गयी ! उसने कहा, ज़िन्दगी तो बस तुम्हारे ही साथ है  निवृत्ति से पहले हमें साथ दुनिया घूमना है ! कुछ लम्हों की मुलाकात और बातों ने मुझे  ज़िन्दगी-भर जीने की ऊर्जा और ख़ुशी देदी  ! ये वैलेंटाइन का दिन भी कितना गज़ब है  प्यार के नए बीज़ बोने की जगह बना गयी ! ~ फ़िज़ा 

उसके ग़ुस्से पर भी प्यार आता है

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  उसके ग़ुस्से पर भी प्यार आता है  क्यूंकि प्यार जो मुझ से ज्यादा है  !! उसका पेहल न करना अखलाता है  मगर मेरे पेहल का इंतज़ार करता है !! उम्मीद बनाये रखना भी प्यार ही है  वर्ना पलटकर सोते ही हाथ न पकड़ता !! खट्टा-मीठा प्यार कश्मीरी चाय जैसे स्वाद दोनों का मिले इश्क़ हो ज्यादा !! आज भी नयापन है रिश्ते में बरसों से  वो गुदगुदाहट जब वो धीमे से मुस्कुरा दे !! नयी कोपलें नयी चिंगारियाँ अदभुत सा  नये मौसम में मोहब्बत हौसलेमंद सा !! ~ फ़िज़ा 

सहानुभूति !!!

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  ज़िन्दगी के चंद हसीन पल ज़िन्दगी बनाने में सफल हैं  वर्ना यहाँ आये दिन तीखे शब्दों के बाण क्या कम हैं? शुक्र है चंद ऐसे भी हैं जो न जानते हुए भी समझते हैं  वर्ना हर कोई अपनी अपेक्षाओं की थाली परोसे हैं ! कहाँ मिलते हैं लोग जो "मैं" को छोड़कर आप में बसे  यहाँ तो हर कोई खुदी में खुदा बना नज़र आता है ! जग से हर किसी को उठना है एक न एक दिन 'फ़िज़ा'  यहाँ इंसान एक दूसरे की नज़रों से ही उठा जा रहा है ! रेहम! दोस्तों ऐसे भी हैं जो अंदर ही अंदर कूटते हैं  कुछ सहानुभूति के अल्फ़ाज़ नहीं तो इशारा ही दे दें ! ~ फ़िज़ा 

क्रिसमस का चुम्बन

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  बिस्तर की सिलवटों से निकलते   कमरे से अंगड़ाई लेते हुए  जब कमरे में मैं आयी  उसकी नज़र मुझ पर पड़ी  'आई लव यू'  की सिली-सिली हवा  मेहकने लगी ! क्रिसमस के तोहफे समेटकर  वो सीधे कमरे की ऒर बढ़ा  दरवाज़े की चटकनी लगते ही  बाँहों में भर उसने जो चूमा  सीधे दूसरे कमरे ले जा  उसका असीम चूमना   सोचते रेह गयी साल ख़त्म  या शुरू हुयी इस तरह ! ~ फ़िज़ा 

अच्छी यादें दे जाओ ख़ुशी से !

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  गुज़रते वक़्त से सीखा है  गुज़रे हुए पल, और लोग  वो फिर नहीं आते ! मतलबी या खुदगर्ज़ी हो  एक बार समझ आ जाए  उनका साथ फिर नहीं देते ! पास न हों पर अच्छे हों  बात रोज़ न हों पर सच्चे हों  ऐसों को हमेशा साथ रखें ! हर कोई जूझ रहा ज़िन्दगी में  टेढ़े मुह बात भी करे तुमसे सहानुभूति रखें सभी से ! ज़िन्दगी सिर्फ चार पल की  अहंकार में खोना न सच्चे रिश्ते  अच्छी यादें दे जाओ ख़ुशी से ! ~ फ़िज़ा 

थोड़ा प्यार !

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  ज़िन्दगी भोजन के इर्द-गिर्द है  हर कोई रोजी-रोटी के लिए  मारा-मारा फिरता है शहर -शहर  ख़ुशी मनाता है तब भी भोजन से  त्यौहार मनाता है तब भी भोजन से  जीने के किये चाहिए भी भोजन और थोड़ा प्यार ! कब इस अधिकार और शक्ति की  ज़रुरत ज़िन्दगी में आ धमकी  के , इंसान एक-दूसरे से लड़ते रेह गया  कितने की ज़रुरत थी और देखो  कितना कुछ कर गया इंसान , इस अधिकार के जतन में वो  हैवान बन गया !!! ~ फ़िज़ा 

मोहब्बत

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  तेल अवीव शहर के एक छोटे से बाजार से  गुज़रते हुए इस बेंच पर नज़र पड़ी  दिल से भरे इस बेंच को देख ख़ुशी हुई  तभी किसी ने कहा, - देखा है उस आदमी को तुमने? वो लोगों के दिल मिलाता है खुशियां बांटता है ! ये सुनकर सब हंस पड़े के टिंडर और शादी डॉट कॉम  के होते  हुए आज के युग में ये सब? मगर ये सच है इस शहर की दास्ताँ  जहाँ एक आदमी लोगों के दिल जोड़ता है ! ~ फ़िज़ा 

मोहब्बत करने लगी हूँ

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  फिर गुस्ताखी करने चली हूँ खुद से मोहब्बत करने लगी हूँ  चाँद अब मेरा पीछा करता है  उस मुये से अब मैं छिपती हूँ  आहें भरते है दोनों तरफ आग  डरती हूँ  और मिलना भी चाहूँ दिल ओ दिमाग से मसरूफ हूँ  गुनगुनाती फ़िज़ा ख्यालों में घूम हूँ  ~ फ़िज़ा 

ख्वाब था..?

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  उसकी बातें जैसे मखमल के गेंद  सुनकर हो जाये गाल लाल-लाल  वो सामने नहीं फिर भी शर्म आये  वो कुछ भी कहे दिल डोल  जाए  उसकी बातें समय को थाम ले यूँ  और ले चला ख्वाबों की सवारी पे अन्धाधुन सफर पर मैं भी निकली  कुछ यहाँ-वहां की बातें और फिर  हँसकर गुलाल यूँ फेंक गया वो  हाथ से हटाने गयी तो खुल गयी  निंदिया ! ख्वाब था या हकीकत समझे न  सोचकर तो लगा सही हुआ था  फिर सबूत ढूंढा तो कुछ न मिला ! ~ फ़िज़ा 

आँखों ही आँखों से

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  आँखों ही आँखों से मिले थे  दूर-दूर ही थे मगर हर पल  नज़रों से होते रहे नज़दीक  संकोच झुकती नज़रों से  हौसलों से देखती वो नज़रें  कहीं तो एक चिंगारी जली  आँखों के रस्ते प्यार हो गया  देखो तो एक सपना सा लगा  क्यूंकि कोवीड के होते ये सब  मुनासिब ही नहीं नामुमकिन था  लेकिन हमने चेहरे नहीं आँखों से  दिल की गहराइयों को जाना  और आँखों ने सहमति दी कहा हाँ, मुझे प्यार है तुमसे  दूर थे मगर दिल से जुदा नहीं ! ~ फ़िज़ा 

एक एहसास

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  धड़कनों की आवाज़ सुनो कभी  तारों सी बज उठती है  संगीत  यादों से भरी बातें संगीत के बोल  जिन्हें पढ़कर बनाये प्यार की धुन  कभी ये तेज़ बजतीं तो कभी आहें  समुन्दर पर हिंडोलती लहरें जैसे  यादों की उड़नखटोले में बसर कर  दुनिया की सैर कर मानों एक ख़ुशी  जैसे मैं कल फिर से कॉलेज हो आयी  यादें, धड़कन, बातें, मुलाकातें, प्यार  सब कुछ तो था वहां जहाँ पढ़ रहे थे  एक एहसास हवा के झोंके सा आया  ~ फ़िज़ा 

मोहब्बत ज़िंदा रहती है

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  उम्र गुज़र रही थी वक़्त के साथ साँझा कर रहे थे  तीस साल गुज़रा हुआ पल उठके सामने आगया  कहीं से कोई उम्मीद या खबर उन दिनों की नहीं थी  तस्वीरों से यादों के लड़ियों से वो पल याद दिलाये  न उसने हमसे कहा और अनजान हम थे  आज तक कोई दिल ही दिल में हम से मोहब्बत कर रहा था  हर अदा पर वो थे फ़िदा मगर हिम्मत न थी कहने की  शर्म-लाज दोनों तरफ थी और बात दिल में ही रह गयी  वक़्त के साथ सबकुछ बदलता है प्रकृति का नियम है  फिर भी दिल में उस मोहब्बत को लिए घूमना अब तक  सही दीवानगी है 'फ़िज़ा' किस अनजानेपन की है सजा  मोहब्बत ज़िंदा रहती है मगर ये सही हो, ये ज़रूरी नहीं ! ~ फ़िज़ा 

बस ढूंढ़ती फिरती हूँ

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  मोहब्बत सी होने लगी है अब फिर से  लफ़्ज़ों के जुमलों को पढ़ने लगी हूँ जब से  जाने क्या जूनून सा हो चला है अब तो  बस ढूंढ़ती फिरती हूँ उस शख्स के किस्से  अलग ही सही कुछ तो मिले पढ़ने फिर से एक दीवानगी सा आलम है अब तो ऐसे  जब से पढ़ने लगी हूँ एक शख्स को ऐसे  ~ फ़िज़ा  

रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का

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  मोहब्बत तो चाँद से बहुत पुराना है  बचपन से लेकर आज तक याराना है  तब देखने को तरसते मचलता था मन  नयी उमंग उठने लगीं थीं मन में उससे  पूरे चाँद-रात को ख़ुशी से मचलते थे   अम्मी से कहते तब पूर्णिमा की रात है  सेवइयां बनाने की यूँही ज़िद करते थे  मीठा खाने की या चाँद से मोहब्बत  जो भी हो दोनों के होने का आनंद लेते  मोहब्बत परिपक्वता की सीमा पर है  आजकल चांदनी की सेज़ में सोते हैं  वो भी रात-भर बैठकर सुला देता है  डर नहीं उसके जाने का अपना जो है  ऐसा लगता है वो हरसू मुझे निहारता है  मिलन की सेवइयां अब खुद बनाती हूँ  मोहब्बत का स्वाद मन ही मन सहलाती हूँ   उसकी आगोश में यूँही फ़िज़ा महकाती हूँ रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का   अब तो हरसू कविता आंखें चार रेहती हूँ ! ~ फ़िज़ा 

कल चौदहवीं की रात नहीं थी, मगर फिर भी!!!!

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कल श्याम कुछ थकी थकी सी थी  कल पटाखों से भरा आसमान था  जाने -अनजाने लोगों से मुलाकात  फिर घंटों बातें और सोच में डूबे रहे  वक़्त दौड़ रही थी और हम धीमे थे  चाँद श्याम नज़र तो आया था मुझे  पर रात तक तारों के बीच खो गया  मगर मोहब्बत की लौ जला चूका था  रात निकल रही थी कल के लिए और  हम अब भी सिगार सुलगाते बातें करते  वो मेरे पैर सहलाता बाते करते हुए  बीच-बीच में कहता 'I love you' midnight का वक़्त निकल गया  मगर यहाँ किसे है कल की फ़िक्र  घंटों मोहब्बत और भविष्य की बातें और फिर तारों को अलविदा कर  चले एक दूसरे की बाहों में सोने  लगा तो था अब नींद में खो जायेंगे  मगर दोनों एक दूसरे में ऐसे खोये   काम-वासना-मोहब्बत-आलिंगन  की इन मिश्रित रंगों में खोगये  समझ नहीं आया रात गयी या  सेहर ठहर सी गयी !!! ~ फ़िज़ा  

मेरा दिलबर चाँद है वो

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दूर रास्ते चले आये हम  जाने-अनजाने मिले हम  देखो तो सही कौन है वो  मेरा दिलबर चाँद है वो  देखा जो उसे इस तरह  जलन से भरा दिल मेरा  मैं भी बैठूंगी गोद तुम्हारे  ऐसा ही हट मैंने किया  देख-देख दुखी हुआ  बस आंव न देखा तांव  तस्वीर लेने दिल मचला दीवानी 'फ़िज़ा' क्या होगा ! ~ फ़िज़ा 

दो दिल प्यार में

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दो दिल प्यार में  डूबे हुए भीगे हुए  एहसास जो दबे  भावनायें मचले हुए  रहते दूर-दूर मगर  दिल रहे आस-पास जैतून के पेड़ पर  रोज़ मिलने का बहाना  और न मिले तो फिर  देर-देर तक आवाज़ देना  तुम्हारी याद आती है  चले आओ की बैठक  बुलाती है ! ~ फ़िज़ा