ये इश्क़ चाँद से


 

ज़िंदगी की चाह ने कुछ ऐसा कर दिया है,

चाँद को बचपन से ही अपना हमसफ़र बना लिया है।


किसी की दोस्ती का हो या न हो एहसास,

चाँद के  मोहब्बत ने रूह तक छू लिया है।


बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन,

हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है।


आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे,

लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है।


उम्मीद है एक दिन वो खुद चले आएगा यहाँ,

जैसे मैं हर गली-नुक्कड़ उसका पीछा करती आई हूँ।


‘फ़िज़ा’ ये इश्क़ चाँद से यूँ ही नहीं हुआ,

हर रात उसे देखकर दिल को समझा लिया है।


~ फ़िज़ा 

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