अच्छा लगता है।
अपने संग रहना, अपने संग वक़्त बिताना अच्छा लगता है,
ख़ुद से बातें करना, ख़ुद को समझाना अच्छा लगता है।
जगह नई हो या पुरानी, अनजानों का भी साथ कभी,
भीड़ में खोकर भी दिल को बहलाना अच्छा लगता है।
चारों ओर नफ़रत, द्वेष की आग भले ही फैली हो,
दिल में थोड़ी सी मोहब्बत बचाना अच्छा लगता है।
सिर्फ़ बेजान पुतलों में ढूँढें जब लोग दोस्ती,
ऐसे रिश्तों से दूरी बनाना अच्छा लगता है।
कैसा वक़्त ये आ पहुँचा है दुनिया के आँगन में,
सच को कह देना भी अब तो सताना अच्छा लगता है।
खुशहाली, साफ़दिल और प्यार अगर हो दरमियाँ,
एक-दूजे के लिए दिल से निभाना अच्छा लगता है।
‘फ़िज़ा’ जाने क्यों आजकल इंसानों से ज़्यादा,
ख़ामोश पुतलों का साथ निभाना अच्छा लगता है।
~ फ़िज़ा

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