रास्तों का सवाल
रास्ते हैं हर जगह—
यहाँ, वहाँ, हर जहाँ,
कहीं ऊपर उठते हुए,
कहीं नीचे उतरते हुए।
आसमान को छूते ये फ्लाईओवर,
कितनी तेज़ी से दौड़ते कदम—
पर कहाँ जा रहे हैं हम?
किन हदों को लांघते,
किन सपनों को जोड़ते,
इन ऊँचाइयों पर चढ़ते हुए—
क्या सच में मंज़िल करीब है?
या ये खाली पड़े रास्ते
किसी खोई हुई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं?
कल शायद ये भी न रहें—
बमों की गूंज में,
सब कुछ जब राख हो जाएगा।
इंसान—
अपनी ही बनाई दुनिया को
ख़ुद ही मिटाता जा रहा है।
इतनी मेहनत, इतनी रचना—
फिर क्यों?
क्या फिर से
आदि मानव बनकर जीने की
तैयारी है ये?
~ फ़िज़ा

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