Friday, October 16, 2020

हताश मन

 


मन बहुत प्रताड़ित है कई दिनों से 
हाथरस के हादसे की खबर ने जैसे 
अंदर ही एक कबर खुदवा रखी ऐसे 
उसमें न समा पाती है लाश भी ऐसे 
जब उसके चिथड़े-चिथड़े हो गए हों 
जानवर की परिभाषा से भी नहीं मेल 
ऐसे भी इंसान रेहते हैं गाँव-शहर में 
जहाँ स्त्री को केवल मांस का ढेर 
समझने वाले कुछ उच्च जाती के 
खूंखार हैवान जो मांस को नौचते 
मगर नीच जात बताके न छूने का 
झूठ भी बोलते कायर हैवान ये होते 
इंसान आये दिन मर रहे हैं दुनिया में 
हैवानों का बोल-बाला है आजकल 
बेटी-बहिन -पत्नी और माँ कहाँ जायेंगे 
जब हैवानों की बस्ती में आज़ाद घूमेंगे 
इनसे भले तो जानवर जो शिकार करते 
किन्तु अपनी जात से हिंसा नहीं करते 
जितना अधिक ये सोचे हताश मन होये !

~ फ़िज़ा 


6 comments:

अनीता सैनी said...

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (१९-१०-२०२०) को 'माता की वन्दना' (चर्चा अंक-३८५९) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
--
अनीता सैनी

शिवम् कुमार पाण्डेय said...

बहुत अच्छा।

Sudha Devrani said...

सही कहा...बहुत सटीक, सुन्दर।

Dawn said...

Aap sabhi ka bahut bahut shukriya!

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल said...

आपकी सभी रचनाएं मर्मस्पर्शी हैं - - गोया उफ़क़ में इंतज़ार करती कोई पुरअसरार सुबह - - नमन सह।

Dawn said...

@Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल aapka bahut shukriya saraahne aur houslafzai ka - dhanyavaad !

ख़ुशी

ज़िन्दगी के मायने कुछ यूँ समझ आये  अपने जो भी थे सब पराये  नज़र आये सफर ही में हैं और रास्ते कुछ ऐसे आये  रास्ते में हर किसी को मनाना नहीं आया...