ऐसा था कभी अपने थे सभी, हसींन लम्हें खुशियों का जहाँ !
राह में मिलीं कुछ तारिखियाँ, पलकों में नमीं आँखों में धुआँ !!
एक आस बंधी हैं, दिल को है यकीन एक रोज़ तो होगी
सेहर यहाँ !
कभी ऐसे सलाहकार मिलते हैं जिन्हें कोई तज़ुर्बा होता नहीं है ! चिल्लाकर लोग सच जताते हैं भूल जाते हैं खुदी में गड़बड़ है ! बातों की रट तो है कुछ ऐसे खुद पे भरोसा ही नहीं जैसे ! आदमी शान से कहे परवाह नहीं औरत सोचे तो समाज जीने न दे ! कभी खुद के गरेबान में भी देखना फायदे में तुम भी और हम भी रहेंगे ! ऐ दुनियावालों बस बोरियत है यहाँ कब अपनी सवारी आएगी, जाना है !! ~ फ़िज़ा
जहाँ खुला आसमान उड़ते पंछी देखूँ लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे ! वक़्त ऐसा आ चला है जहाँ पर बिना पिंजरे के बंधी बने हैं लोग ! अब तो हालत ऐसा है जनाब जाना चाहो वापस जाने न दें ! किसी के विरुद्ध क्या बोलोगे अब कुछ कहने से पेहले ही बोलती बंद ! कटुक नीबूरि कहाँ कनक कटोरी पिंजर बंध कनक तीलियाँ भी नहीं ! खूब हंसो तुम पंछी खूब हंसों पैरों पर जो मारी है कुल्हाड़ी ! ~ फ़िज़ा
ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में गुज़र गए पल कहाँ फुरसत सोचने की कैसा होगा कल ! हरदम साथ में हैं और सब कुछ साथ है मुद्दे की बात न हो ऐसा भी अक्सर होता है ! अनियोजित मुलाकात कुछ ऐसा रंग लायी ज़िन्दगी के बाकि हिस्से की तयारी हो गयी ! उसने कहा, ज़िन्दगी तो बस तुम्हारे ही साथ है निवृत्ति से पहले हमें साथ दुनिया घूमना है ! कुछ लम्हों की मुलाकात और बातों ने मुझे ज़िन्दगी-भर जीने की ऊर्जा और ख़ुशी देदी ! ये वैलेंटाइन का दिन भी कितना गज़ब है प्यार के नए बीज़ बोने की जगह बना गयी ! ~ फ़िज़ा
Comments