Thursday, April 01, 2021

मन की ख़ुशी

 


तन मन का सुख है मन से 

तन का सुख भी है मन से 

जब मन ही न रहे तो सुख कैसे?


तन को मिले सब सुख-समृद्धि 

मन को मगर न भाये एक पल भी 

जब मन ही न रहे तो सुख कैसे?


मन को मिले सब मन चाहा 

तन बेशक है अब मुरझाया 

मगर अब भी सुखी है वो काया !


तन से न तोल खुशियां कभी 

मन की ख़ुशी हो कितनी भारी 

रखती हमेशा है खुशियों की क्यारी !!


फ़िज़ा 

7 comments:

अनीता सैनी said...

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०३-०४-२०२१) को ' खून में है गिरोह हो जाना ' (चर्चा अंक-४०२५) पर भी होगी।

आप भी सादर आमंत्रित है।

--
अनीता सैनी

जितेन्द्र माथुर said...

ठीक कहा आपने ।

आलोक सिन्हा said...

बहुत सुन्दर सार्टकैर प्रशंसनीय रचना

गगन शर्मा, कुछ अलग सा said...

सुख ! मन का मानसपुत्र

मन की वीणा said...

सटीक और सार्थक कथन।

संजय भास्‍कर said...

बहुत सुन्दर

Dawn said...

Aap sabhi ka bahut bahut shukriya protsahan aur sarahane ke liye
Abhar

कोवीड इस अचूक से आ मिला !

 सकारात्मक  होना क्या इतना बुरा है ? के कोवीड भी इस अचूक से आ मिला  जैसे ही हल्ला हुआ के मेहमान आये है  नयी दुल्हन की तरह कमरे में बंद हो गय...