Wednesday, April 21, 2021

कठपुतली




 

ज़िन्दगी के खेल भी निराले हैं 

अब ज़िंदा हैं तो मौत आनी है 

रात है तो दिन को भी होना है 

रोने वाला कभी हँसता भी है 

धुप-छाँव से भरी ज़िन्दगी है 

ऐसे में तय करे कब क्या है 

क्या नहीं और क्या होना हैं 

सब सोचा मगर होता नहीं है 

ज़िन्दगी अपनी डोर उसकी है 


~ फ़िज़ा 

4 comments:

अनीता सैनी said...

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२४-०४-२०२१) को 'मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे'(चर्चा अंक- ४०४६) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

Anuradha chauhan said...

बहुत सुंदर

मन की वीणा said...

बहुत खूब।

Dawn said...

@अनीता सैनी ji, aapka behad shukriya meri rachna ko aapke sankalan mein shamil karne ke liye, Abhar!

@Anuradha chauhan ji, aapka behad shukriya meri rachnana ko pasand karne ke liye, Abhar!

@मन की वीणा ji aapka behad shukriya meri rachna ko pasand karne ke liye, Abhar!

ख़ुशी

ज़िन्दगी के मायने कुछ यूँ समझ आये  अपने जो भी थे सब पराये  नज़र आये सफर ही में हैं और रास्ते कुछ ऐसे आये  रास्ते में हर किसी को मनाना नहीं आया...