ये चाय नहीं, एक रिश्ता है..
मिट्टी की कुल्हड़ में सजी,
ये चाय नहीं एहसास है,
पहली चुस्की में जैसे,
घर लौट आने का विश्वास है।
हल्की-सी भाप में घुली,
माँ की रसोई की खुशबू,
हर घूँट में मीठी यादें,
और थोड़ी-सी बचपन की धूप।
सड़क किनारे, ठंडी शाम,
या सुबह की नींदी आँखें,
ये कुल्हड़ वाली चाय हमेशा,
दिल को अपने पास बुला ले।
होठों से लगते ही जैसे,
सारी थकान पिघल जाए,
एक चुस्की और… फिर एक और,
मन यूँ ही मुस्कुराए।
मिट्टी की सोंधी महक में,
छुपा है अपनापन सारा,
ये चाय नहीं, एक रिश्ता है,
जो हर बार लगे दोबारा।
~ फ़िज़ा

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