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बदले से केवल होगा विनाश

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दिल में न जश्न है न जोश  कौन जहाँ में मनाता खुशियाँ अपने ही जैसों को मारकर? शायद मेरा दिल आज़ाद है  बंधा नहीं देशों के दायरों में  इंसान यहाँ भी वहां भी समान  क्यों न मिलकर -समझकर  मुश्किलों का निकालें हल  ज़िन्दगी है जीना जीने का नाम   जंग से केवल भंग होगा इंसान दुश्मन लूटेगा मचाएगा नाश  बदले से केवल होगा विनाश  न जोश है आज न होश है  आज! ~ फ़िज़ा 

इसे रोको इसे रोको !

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गुलाबों का दिन था  मोहब्बत का समां था  सन्देश प्यार का था   फिर हैवानियत कैसा?  कितना क्रूर होगा वो  वो पल, वो जानवर पुलवामा में घुसकर  चोरी से ठग कर मारे  देश के जवानों को  विस्फोटों से लथपथ  जवानो की आहूति  जिम्मेदार कौन?  भरपाई करे कौन? सस्ती है ज़िन्दगी  खून का आदि है  आतंकवाद ! क्यों न करें इस  आतंकवाद का खून? टूट गया वोही दिल  जो गुलाबों और  मोहब्बत से पाला था दर्दनाक हिंसा जवानों पर  निंदाजनक हादसा  इसे रोको इसे रोको  बहुत हुआ अब पडोसी का  झगड़ा ! ~ फ़िज़ा 

खिला चाँद गगन में !!!

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भीगा मौसम है  बहारों का गुलशन  चमन में चहकते  पंछियों की टोलियां  भीड़ में सभी तो हैं   फिर भी अकेला वो  अकेले हम भी हैं  बहारों के खिलने से  मंडराते हैं कुछ भँवरे  यहाँ खिलता गुलाब है  मेहकती हुयी खुशबु है  बस नहीं है कोई तो  चाँद जो दूर बसा है  गगन की गोद  में  बादलों की आड़ में  सिसकते हम भी हैं  सिसकता वो भी है  भीगा मौसम है  भीगी हर सांसें हैं  जज़्बात कोहरे में  खिला चाँद गगन में !!! ~ फ़िज़ा 

आ सको तो आजाओ तुम...!

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आ सको तो आजाओ तुम  लम्बा सफर रहा जुदाई का  गए थे हंसी-ख़ुशी में यहाँ से भेजा था हमने भी उत्साह से  दिनों-हफ़्तों की बात और है   महीना होने को यहाँ चला है  आ सको तो आजाओ तुम  लम्बा सफर रहा जुदाई का ! घर की बात और दफ्तर की  काम सभी नियमित होते हैं  सब का इंतज़ाम ठीक हुआ है  शाम आती है सूनेपन को लेकर  तुम, आ सको तो आजाओ   लम्बा सफर रहा जुदाई का ! शुरुवात बच्चों की मर्ज़ी से ही  चलता रहा दिनचर्या मस्ती से   अब उसमें भी नीरसता आगयी  सच कहूं तो दिल नहीं लगता  हो सके गर तुमसे तो आजाओ   जुदाई का सफर अब नहीं सहना ! आ सको तो आजाओ तुम  लम्बा सफर रहा जुदाई का !! ~ फ़िज़ा 

मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग ...!

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मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग  जब इतिहास के पन्नों से पलटे  कहानियां वीरों और वीरता की  अनायास मस्तिष्क की नज़रें गयीं  ढूंढ़ती स्कूल से उस कक्षा की ओर  कक्षा छात्र-छात्रों से भरा हुआ था  बुंदेले हरबोलों के मुंह से न सही  अपनी टीचर के मुंह से सुन रहे थे  सन सत्तावन की मर्दानी जो लड़ी थी  झाँसी वाली रानी थी ! सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते अकस्मात  सोच में पड़ जाते थे काश! उस वक्त  हम भी उस सेना में भर्ती हो पाते थे  मर्दानी जैसी न सही साथ उसका देते थे  ऐसे वीर कहानियों से हौसले बुलंद होते  स्कूल की घंटी बज भी जाती फिर भी  मस्तिष्क में, खूब लड़ी मर्दानी वाली  कविता याद आ जाती थी किसी तरह वो स्वतन्त्र की चिंगारी  हमरे अंदर भी जला जाती थी ! मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग  यूँही ख्यालों और ख्वाबों में वो लोग  जो मातृभूमि के लिए वीरगति पा गयी थीं !! ~ फ़िज़ा 

हरियाली फैलाते ये बूँदें...!

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ज़मीन पर गिरतीं हैं बूँदें  जाने कितने ऊंचाइयों से  कितने सपने संग लिए  क्या-कुछ देने के लिए  मचलती छलकाती हुई  एक से दो, दो से हज़ार  लड़ियाँ घनघोर बरसते  कहलाते बरखा रानी  जो जब झूम के बरसते  ज़मीन को मोहित करते  पेड़ों-गलियों में बसकर  फूलों के गालों को चूमकर  रसीले भवरों से बचाकर  जैसे-तैसे गिरकर-संभलकर  हरियाली फैलाते ये बूँदें  कभी वर्षा, कभी वृष्टि  बनकर सामने आते ! ~ फ़िज़ा 

ये सर्दियाँ मुझे बांध रखतीं !

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सबकुछ तो अच्छा ही है  हर तरफ ये हरियाली है  बस, इन सबको देखूं मैं  सुकून से और आराम से  न कहीं जाने की जल्दी  किसी के आने का भरम  खाने की सुध नहीं जहाँ  वक्त के अधीन नहीं वहां  बस मैं और मेरी तन्हाईयाँ  सुकून का आलंबन हो जहाँ  मैं, फ़िज़ा और तुम वहां  ऐसी कुछ आलस से भरी   ये सर्दियाँ मुझे बांध रखतीं  सबकुछ तो अच्छा ही है  दिल घर-सीमित चाहता है  छुट्टिंयों के कुछ लक्षण हैं  कम्बल में सिकुड़ना चाहता है  सबकुछ तो अच्छा ही है  अब कुछ आराम चाहता है ! ~ फ़िज़ा