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अभी मंज़िल बहुत दूर है !

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पत्ते भी तरुवर से टूट के बिखरते हैं पतझड़ के बहाने जाने कितने ऐसे राज़ हैं छुपाये इन पत्तों ने ! फूल खिलाने में कई बीत जातें हैं साल वोही कली से फिर फूल बनकर तोड़ी जाती है तरुवर से हाल तरुवर का दरख़्त का जाने कोई ना ! फ़िज़ा का रंग तो देखो हर मौसम में हर पहर में ख़ुशी का आलम संजोय रखना जैसे दिनचर्या की रैना वोही आलम है अपना सबका वोही चलन है जाने जो जाने वो राज़ जो न जाने वो रहा वक़्त का शिकार ! दरख्तों से फूल-पत्तियों से सीखा है मैंने हँसना चाहे धुप हो या छाँव या हो आंधी और तूफ़ान चल मुसाफिर अकेले निकल अभी तेरी मंज़िल है दूर दूर वहां जहाँ सभी न आएं कोई साथ दे न पाए तो साथ ले भी न जाए चलना ही सफर का नियम है, मुड़के न देख अभी मंज़िल बहुत दूर है  ! #happypoetrymonth ~ फ़िज़ा

मचलते हैं अरमान मेरे दिल में जवां ...!

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अंगड़ाई लेते हुए बादलों का कारवाँ  चले हैं बरसाते हुए झरने कई यहां  मचलते हैं अरमान मेरे दिल में जवां   सौंधी खुशबु गिली मिटटी नहरें यहाँ  हरियाली हर तरफ गुलाबी दिल कहाँ   भीगे रुत में भीगे अरमान भीगे ये समां  मुझे कायल करते हैं पिया की अदा  बेबस हूँ आज बस निकल जाने दो  भीगना है मुझे जैसे भीगे हैं अरमां    कोई केहदो जहाँ से न आये यहाँ  हम हैं ग़ुम अपने ही खवाबों में जहाँ  सिर्फ हम हैं वो है और ये समां  अंगड़ाई लेते हुए बादलों का कारवाँ  चले हैं बरसाते हुए झरने कई यहां  मचलते हैं अरमान मेरे दिल में जवां  ~ फ़िज़ा 

नयी खोज में नया सफर है ...

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नए डाल पर फिर इतराने  निकल पड़ा है चंचल मन  नयी कोंपलें, नयी पत्तियां  नयी खुशबु सी महकाते चल    छोड़ पुराने पगडंडियों को  नयी खोज में नया सफर है  भीगे ज़मीन में खुले आसमान पे  ख़्वाब सजाने और संवारने कोमल अरमान खिल गए हैं  वही जोश है वही हौसला भी  जो कभी था बचपन में साथी  नए डगर की तलाश आज  फिर मुझको युवा बना गया  नए सलिखे नयी बातें सब  सीखने के फिर दिन आये हैं  चलो बैठकर ज्ञान ले लें  कब ऐसा मौका मिल जाये  नए खेत में नए खलियानों में  खेल-कूदने के दिन आये हैं  नए डाल पर फिर इतराने  निकल पड़ा है चंचल मन ! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी को गले लगा लें ...!

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एक रिश्ता सा बन गया है  अब तो जैसे  खांसी न आये तब भी  लगता है आ रही है ! सांस चल रही है ज़िन्दगी की  मगर ऐसा लगता है अब  खांसकर तबाहकर   अब गयी तब गयी ! मौत भी एक फरिश्ता है  जो के रिश्तों की तरह  बेकार होगयी जाने क्यों  झांसा देकर चली गई ! ज़िन्दगी को गले लगा लें  शायद इसे बहका सकें  हंसती है दूर से मगर  पास से रुलाती है ! ~ फ़िज़ा

उसके मिलने की ख़ुशी का आभास ...!

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खिलने के पेहले और  खिलने का वो प्रकरण  जाने कितनी प्रक्रिया से  गुज़रते एहसास नितदिन ! वहीं खिल जाने के बाद  खिलकर बिखरने का पल  ऊंचाइयों से गिरने का डर   ऊंचाई से गिरते वक्त का भय !! जाने कितने ही एहसास दबाये  मानसिक वेदना का घूंट पीकर  अनजान नज़ारों का भय संजोकर जीवन को बना लिया एक लिबास !!! फिर वो वक़्त भी आया मेरे पास  घुटने टीकाकार उठने का प्रयास  किसी भय का नहीं अब निवास  उतार फेंका डर का वो लिबास !!!! आज़ादी मिली नहीं मगर फिर भी  उसके मिलने की ख़ुशी का आभास  समझा सकता है दर्द की कश्ती हज़ार  आखिर उड़ सकती हूँ मैं भी पंख पसार !! ~ फ़िज़ा 

नगीने में नगीना ...!

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नगीने में नगीना  मेरे दिल में है एक आईना  जो आँखों से देखता है  दिल के किस्से सफीना खुला आसमान है  अमन का चमन है  खुशियों का खज़ाना  बंटोरते सभी यहाँ मोहब्बत का आशियाना  नगीने में नगीना  तेरे दिल में भी है आईना  कभी तो झाँक के देख  उसे भी है कुछ कहना  तनिक तुम्हें समझाना  आँख से आँख मिलाना  प्रीत की खुशबु फैलाना  कभी ख़याल आये बेगाना  तो थोड़ा रुक कर सोचना  नगीने में नगीना  अपने दिल के आईने को देखना ! ~ फ़िज़ा 

ऐ चाँद, दिलबर मेरे हमनशीं

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चित्र अशांक सींग के सौजन्य से चाँद की अठखेलियां देख  आज कविहृदय जाग गया उसकी चंचल अदाओं से  मेरा दिल घायल हो गया  अपना पूर्ण मुख प्रतिष्ठा  और हलकी सी मुस्कान से  घायल को ही बेहाल किया  न चैन से सोने दिया रात भर  न चैन से जगने दिया दिन में  कामदेव की सूरत में चाँद  प्यार में रत रहे फ़िज़ा संग  हर वक़्त एक वासना सी  सम्भोग का वो आलम जैसे  हर ख़ुशी दर्शाये रंग से ऐसे  मानो कभी परदे में छिपके  तो अँधेरे की आड़ में ऐसे  एक-दूसरे को समर्पण ऐसे  तृप्ति मिली आलिंगन भर से  सदियों से सताए रखा दूर से  उस रात की रासलीला ने  उम्मीद जगा दिया अब से  हो न हो तुम हो उस जहाँ में  इंतज़ार करूंगी इस जहाँ में  अब तो मिलन है ज़रूरी  आशा जिज्ञासा बढ़ गयी है  ऐ चाँद, दिलबर मेरे हमनशीं  तू मिलने आ इस चमन में  तख्ती है राह तेरी फ़िज़ा  फिर एक रात दोनों जवाँ  बसेरा हो एक रात का  जीवनभर का रहे फिर नाता ! ~ फ़िज़ा...