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बेहते ही जाऊँगी आवारा ...!

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झर -झर भर-भर वर्षा  करे तन-मन में हर्षा  भीगे मेरी अंतरात्मा  कभी लगे मैं आज़ाद हूँ  कभी लगे पानी में जकड़ी  लपक-झपक करे हाथा-पाई  मन मस्त होकर मैं बरसाई  निडर निरंतर निर्झर निर्मल  बूंदों के बोस्से में लतपथ  मैं न जाऊं बरसाती के अंदर  खुलकर भीग जाने दो पल-पल  बूँद की भांति मैं भी आज  निकल पड़ी हूँ अपने आप  नहीं सहारा नहीं किनारा  बेहते ही जाऊँगी आवारा  कहीं मिले गर कोई सागर  मिल जाऊँगी उसमें घुलकर  एक सिरे से आना ऐसा  दूजे सिरे से जाना वैसा  झर -झर भर-भर वर्षा  करे तन-मन में हर्षा  भीगे मेरी अंतरात्मा  ~ फ़िज़ा 

कितना अच्छा होता !!!!!

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मौसम के बदलने से रुत बदलती तो  कितना अच्छा होता  वक़्त के गुजरने से बुरे दिनों को टालदे तो  कितना अच्छा होता  ग़लतियाँ हर किसी से होती है यही समझलेते तो  कितना अच्छा होता  ज़िन्दगी आडम्बरी चीज़ों से बढ़कर भी है जान लेते तो  कितना अच्छा होता  मकान सजाने से घर बन जाता तो  कितना अच्छा होता  काश लोग घर की सजावट की वस्तु जैसे होते तो  कितना अच्छा होता  लोग एक-दूसरे को इंसान ही समझ लेते तो  कितना अच्छा होता  हार-जीत छोड़कर एक छत के नीचे शांति से जी लेते तो  कितना अच्छा होता  कब समझे कोई लेके जाना तो कुछ नहीं फिर तो  क्यों बटोरकर दिखावा करना ? कब समझेंगे गोया, ये तो अब सबको नज़र आता है की  क्या अच्छा है क्या बुरा? कब समझेगा इंसान? काश पूरी होती भूख दिखावे से और हक़ीक़त नज़र आती तो  कितना अच्छा होता  बस... काश सबकुछ कितना अच्छा होता...  गर सबने ये कविता पढ़ कर अपना लिया होता तो...  कितना अच्छा होता !!!!! ~ फ़िज़ा 

सुनी थी एक कहानी...

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बहुत साल पहले  सुनी थी एक कहानी  प्यासा कौवा भटकता  मारा-फिरा पानी के लिए  कहीं दूर जंगल तेहत  एक घड़ा नज़र आया  बड़ी आस से कौवा  पानी की तलाश में  उम्मीद ले पहुंचा  देखा झांकर घड़े में  बहुत कम पानी था  परछाई नज़र आती थी  मगर पानी को चखना  कव्वे के सीमा के बाहर रही  सूझ-बूझ से कव्वे ने  कंकड़ भर-भर के डाले  उन दिनों तो पानी घड़े में  आगया ऊपर श्रम से  मगर अधिक कंकड़ से  पानी की सूरत भी ढकी  रहा जा सकती है  कंकड़ कितना और कब  डालना है इसकी भी  सूझ-बूझ कव्वे को थी  ताना हो या बाना  हर वक़्त काम नहीं आती  और ज्यादा से भी  रास नहीं आती ! ~ फ़िज़ा 

न थी कभी...!

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न थी कभी ऐसी ज़िन्दगी न थी किसी से कोई बंदगी  मुश्किल में साथ थी हौसला  न थी कभी ऐसी ज़िन्दगी  न थी किसी से कोई बंदगी ! हर हाल में सीखा मुस्कुराना  दिया हौसले का नज़राना  न हताश हुई ये ज़िंदगानी  न थी कभी ऐसी ज़िन्दगी  न थी किसी से कोई बंदगी ! वो पल भी आया थक गए  वक़्त आया अब निकल गए   न  जीने की लालसा रही कोई  न थी कभी ऐसी ज़िन्दगी  न थी किसी से कोई बंदगी ! सूखे पत्तों का ढेर है अब  चाहो तो तिल्ली झोंकलो अब  जलने का न डर  है कोई  न थी कभी ऐसी ज़िन्दगी  न थी किसी से कोई बंदगी ! ~ फ़िज़ा 

गणतंत्र दिवस की सुबह ...

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गणतंत्र दिवस की सुबह  का बेसब्री से इंतज़ार  बचपन हो या अब  साज और सोज़ वही  जस्बा देश-भक्ति का  जवानों की टोली  सीना चौड़ा कर  देश के चोरों को  सलामी देते हुए  अश्रु भर आते हैं  नयनों में के जानकार भी  चोरों की सत्ता है  जवान देश के लिए जाँ  कुर्बान करता है  दिल भर आता है  ये आँख बंद करके  कूद पड़ते हैं  ऐसी देश-भक्ति  को मेरा शत-शत प्रणाम  गणतंत्र दिवस एक  आँखों में नमी का एहसास  बहुत देर तक रेह जाती है   मन भावुक हो जाता है  शहीदों को सलाम  मेरे देश के सेनाओं को  सलाम! ~ फ़िज़ा 

अब लाश है 'फ़िज़ा' मिन्नतें नहीं करती...!

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उसने दिल तोड़ने का सबब कुछ ऐसा दिया  न किसी को जीने दिया न ही मरने दिया ! ज्ञानी कभी संभलता है तो संभालता है  मगर अज्ञानी जीने का पथ ढूंढ लेता है !  कहते हैं  माफ़ कर देना कठिन है  कहने को तो सब कहते हैं जुग -जुग जियो ! वो खुद डरता था अपने आप से पागल  कहता है मैं शक करती हूँ उसपर !  उसकी हर बात पे औरत का ज़िक्र करना ऐसा  मानो किसी को परेशान करने की साज़िश ! कौन जीता है तेरे सर होने तक ऐ इंसान  ज़िन्दगी किसी की जागीर नहीं होती ! उसकी उदासी छा जाती माहोल में हर पल  जब भी मुझे मुस्कुराते देखता वो हरजाई ! अब लाश है 'फ़िज़ा' मिन्नतें नहीं करती  वक़्त का क्या है जब आये तब ले जाये हमें !! ~ फ़िज़ा 

बस इंतज़ार रहता है ...!!!

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किसी ने पुछा ख्वाब में आकर  तुम्हें पता चले आखिरी पल है गर  तब तुम क्या करोगे ? बहुत सोचा क्या करूंगी? क्या न करूंगी?  फिर यही जवाब आया निकल  जैसे अब जी रही हूँ  वैसे ही जियुंगी आगे भी सनम  पहले भी ज़िंदादिली  और अब भी  फर्क इतना है मैं खुश हूँ  मेरी टिकट जल्दी और आपकी बाद में ! पूछनेवाला सोच में पड़ गया  ये कैसा जवाब है? मरने से डर क्यों नहीं? लपक कर जवाब हलक से निकला  अमर तो कोई नहीं यहाँ पर  आज मैं तो कल तुम  बस जाना सभी को है तो पहले कोई भी हो जाने का  बस इंतज़ार रहता है  इंतज़ार जो कभी ख़त्म नहीं होता ऐसा कोई ख़्वाब में आकर  यूँही पूछ बैठा था कल ! ~ फ़िज़ा