ऐसा था कभी अपने थे सभी, हसींन लम्हें खुशियों का जहाँ !
राह में मिलीं कुछ तारिखियाँ, पलकों में नमीं आँखों में धुआँ !!
एक आस बंधी हैं, दिल को है यकीन एक रोज़ तो होगी
सेहर यहाँ !
कप में सजी ये छोटी सी दुनिया, झाग में जैसे फूल खिला, हल्की-सी खुशबू कॉफी की, मन को चुपके से छू गई भला। संगमरमर की मेज़ पे रखी, ये प्याली कितनी प्यारी है, जैसे सुबह की पहली किरण, या माँ की मीठी फटकार सी न्यारी है। हर घूँट में है सुकून छुपा, जैसे घर की गर्माहट हो, थोड़ी-सी कड़वाहट भी इसमें, पर उसी में मिठास की आहट हो। पास रखी वो खाली कुर्सी, किसी अपने का इंतज़ार करे, या खुद से मिलने का मौका, कुछ पल दिल को उपहार करे। ये कॉफी नहीं, एक एहसास है, थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है, भागती दुनिया के बीचों-बीच, ये पल ही तो असली ठहराव है। ~ फ़िज़ा
कुछ ख्वाब देखे रखे सिरहाने कुछ दिनों बाद फिर लगे लरजने कुछ-कुछ है याद रूमानी बातें वो सुलझी हुई लटें और बिखरे बादल वो पानी का बरसना ठंड से सिमटना साँसों की गर्मी और फिर रूमानी हो जाना कैसे धुंधले हैं यादें जो कभी रखे थे सिरहाने लगे कुछ गिले जुल्फों के तले आज याद आये वो पल भी गुदगुदाने के बहाने कुछ नज़रें मिलीं कुछ यादें संजोए फिर निकल पड़ी लहरों को सजाने मतवाले चंचल बेज़ुबान दिल ~ फ़िज़ा
महीना अगस्त का मानों उम्मीदों से भरा शिकस्त चाहे उस या फिर इस पार ज़रा वैसे भी कलियों के आने से खुश है गुलदान फूल खिले न न खिले उम्मीद रहती है बनी हादसे कई हो जाते हैं फिर भी आँधिंयों से लड़कर भी वृक्ष नहीं हटते अपनी जड़ों से कली को देख उम्मीद तो है गुलाब का रंग खिलकर बदल जाए तो क्या उम्मीद तो है कम से कम ! ~ फ़िज़ा
Comments