ऐसा था कभी अपने थे सभी, हसींन लम्हें खुशियों का जहाँ !
राह में मिलीं कुछ तारिखियाँ, पलकों में नमीं आँखों में धुआँ !!
एक आस बंधी हैं, दिल को है यकीन एक रोज़ तो होगी
सेहर यहाँ !
ये कविता मैंने तब लिखी थी जब लेबन्न में लडाई छिङ गई थी । जहॉ बच्चों की लाशें गिर रही थीं...और इस तरफ एक मासूम बच्चा अपने पापा की ऊँगलियाँ पकड कर पारकींग लॉट पर चला जा रहा था.... ज़िंदगी तुझ से कोई शिकायत नहीं क्योंकि, तुने वो सब दिया जो कभी मैंने माँगा नहीं और जो कभी मैंने चाहा भी नहीं कितना इंसाफ है तेरी जूस्तज़ू में जो कभी अपना तो क्या पराया भी नहीं जताता मैं सोच में रेहती हूँ ज़िंदगी तू मेरा अपना है या पराया? तू तो हवा का झोंका है जो कभी ठंडी हवा से दिल मचला दे तो कभी तूफान बनकर खडा हो जाऐ। ज़िंदगी तेरे तो खेल निराले हैं तुझे मैं क्या कहूँ - आ देखें तेरी अगली चाल क्या है ।?। ~फ़िज़ा
दोस्ती क्या होती है कभी सोचा है? रोज़ न मिलें फिर भी स्नेह हो! रोज़ बातें न हों मगर विश्वास हो ! दोस्ती में सिर्फ एक नियम होता है~ प्यार और विश्वास बरकरार रहे ! ज़िन्दगी लंबी नहीं मगर अच्छी हो ! दोस्तों का साथ अपनों का साथ! ख़ुशी के चार बोल सहानुभूति से भरे ! जीने को और सुखद बना दें दोस्त ! किसी ने सच कहा है - 'दुनिया हसीनों का मेला, मेले में ये दिल अकेला ! एक दोस्त ढूंढ़ता हूँ मैं दोस्ती के लिए !' ~ फ़िज़ा
वो भी क्या दिन थे जब खुलकर मिला करते थे अब मुस्कुराने से झिझकते हैं कहीं मसला न हो जाये ! एक वक़्त था जब घंटों बातें होती खूब हँसते गाते अब तो बात नहीं बहस के लिए मुद्दे का होना ज़रूरी है ! एक समय सब अपनी राय साझा करते सुन लेते थे अब तो सबकी राय में हाँ न मिलाये तो गद्दार कहलाते है ! जीवन के पथ पर बहुत कुछ सीखा और समझा है खुश रहने के लिए चीज़ें नहीं चंद खास की ज़रुरत होती है ! कम हैं दोस्त और दोस्ती भी कहाँ है आजकल किसी से बस 'फ़िज़ा' रिवायतें है जो निभाई जाती हैं मज़बूरी में जैसे ! ~ फ़िज़ा
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