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ज़िन्दगी का एकमात्र फार्मूला

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आशा जानती थी हमेशा से  ज़िन्दगी का एकमात्र फार्मूला  अकेले आना और अकेले जाना  रीत यही उसने पहले से हैं जाना  मगर होते-होते वक्त लग गया  माता-पिता बहिन-भाई-सहेली वक्त इन्हें साथ ले चलता गया   धीरे-धीरे सखियाँ और घरवाले  सभी अपनी-अपनी जगह ठहरे    और उसे जीवन साथी मिल गया   चलते-चलते वक़्त याद दिलाता अकेले आना और अकेले जाना है  मगर तब भीड़ की आदत पड़ गयी  तब तक ज़िन्दगी अकेली पड़ गयी ! ~ फ़िज़ा 

डट के रहना निडर होकर नज़रें मिलाना

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हलकी सी ही सही राहत मिली मुझे, गर्दिश में जब हों हमारे सितारे, आँख से आँख मिलाकर जियो प्यारे  लोग बुरे दिनों को याद ज़रूर दिलाएं  मगर आप इन सब से न मुँह मोड़ें  ग़म न कर किसीका जब खुद हादसों से गुज़रे  डट के रहना निडर होकर नज़रें मिलाना  के मौत से ज्यादा क्या गनीमत है और होना ? ~ फ़िज़ा 

केसरी रंग ये शाम की

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केसरी रंग ये शाम की  करती है बातें इशारे की  कभी कहती है रुक जाओ  के अभी ढलने में वक़्त है  तो अभी ढल रही है शाम  कल आने की लेती है कसम इस जाने आने के सफर में  इस ढलने में और बहलने में  कितने अरमानों का आना  कितने अंजामों का जाना  हर रंग के रंगों में ढलकर  देती है संदेसा बदलकर  देख लो आज जी भरकर  कल का रंग फिर नया होगा  नए रंगों से नया श्रृंगार होगा  ~ फ़िज़ा 

अब कोई दर्द नहीं होता

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मुझे अब कोई दर्द नहीं होता  किसी बात का न लफ्ज़ का  न किसी रवैये का नज़रअंदाज़ का  मुझे जितना भी चाहो हराना  मुझ से जितनी भी कर लो नफरत  मेरी न करो इज्जत न इजाजत  सामने होकर भी अनदेखा करलो  कोई सवाल पर जवाब भी न दो  मैं इन सब से आगे निकल गयी हूँ  अब सबकुछ सुन्न सा पड़ गया है  मुझे दर्द नहीं होता न ही कोई गिला शायद तुम लाख कोशिश कर रहे हो  अफ़सोस ये सब व्यर्थ है परिश्रम  इसका एहसास दिलाया तुम्हीं ने  और अब मैं आज़ाद हूँ हर ख़याल से  अब कोई दर्द नहीं न आकांशा मेरी  अब सब ठीक है और अत्यंत शांति है  ~ फ़िज़ा 

पंछियों की गुफ्तगू

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आज कहने को कुछ भी नहीं पंछियों को गुफ्तगू करते देखा  जहाँ दो साथी एक परिवार के  गृहस्थी के रोज़मर्रे और ये झमेले  दोनों निकले घर से बटोरने चने  बटोरना तो मगर चुपके -चुपके  क्यों न एक बटोरे चुपके-चुपके  और दूजा देखे पेहरा देते-देते  रंगीले जोड़ी की मिली-जुली   हरकत तो देखो है एकता उनमें भी ! ~ फ़िज़ा 

खिलते मेहकते रहेंगे !

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सितमगर  कम न होंगें  मगर हम  चुप न रहेंगे  ज़िन्दगी  की तल्खियां  तो हमेशा ही साथ होंगे  हौसले मगर कम न होंगे  धुप-छाँव बाढ़ या सूखा  तब भी हर बार निखरेंगे  सतानेवाले कम न होंगे  चाहे  रूप  अनेक होंगे  रिश्ते  बे-रिश्ते भी होंगे  फिर भी मुस्कुराते रहेंगे  खिलते मेहकते रहेंगे ! ~ फ़िज़ा 

हौसलों के परिंदे उड़ते हैं उड़ान

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दिल की अंगड़ाई लेती है उड़ान  अब न रुके ये रोकने से उड़ान  बादलों को छुकर चला है उड़ान  संभलना गिरा न दे उमंग उड़ान  सुनेहरे सपनों से सजी है उड़ान  देखो सूर्यास्त तो नहीं है उड़ान  पर दिए हैं आसमां छुलो उड़ान  यूँ भी न उड़ो के गिर पड़े उड़ान  हौसलों के परिंदे उड़ते हैं उड़ान  सलीके से उड़ो तो हसीं है उड़ान  ~ फ़िज़ा