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नयी धुप नयी हवा है चिलमन में

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धुप की किरणों में सहलाते बदन  रूह को जलता क्यों छोड़ देते हैं  इन दरख्तों से सीखो क्या कुछ ये सहते हैं ! पंछियों की चहचहाहट मानो कुछ कहती हैं  तुम समझो या न समझो गीत ज़रूर सुनाती है  कभी मुड़के देखा है कितना कुछ समझाती है! नज़रअंदाज़ करते हो कब तक और क्यों? हवा अपना रुख बदलती है हर वक़्त, फिर भी  समझने वाले समझते हैं देर आने तक! बंजर ज़मीन सूखे पत्ते बंजर फर्नीचर  पुकारते हैं, सुनाते हैं एक अनसुनी कहानी  चलो उठो, अब तो संवारने की घडी आगयी! नयी धुप नयी हवा है चिलमन में  कॉफी का प्याला हाथ में लिए  नयी डगर नए एहसास लिए निकल पड़ते हैं... ! ~ फ़िज़ा 

हर लहर कुछ कहती है मेरे संग

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बैठी हूँ सागर की लहरों के संग  हर लहर कुछ कहती है मेरे संग जब भी आती दे जाती है संदेसा  फिर कुछ गुफ्तगू कर मेरे संग  ले जाती है सारी तन्हाईयाँ  छोड़ जाती हैं यादें मुसलसल  कुछ और सोचूँ उस से पहले  आ जातीं हैं सुनाने कहानियाँ  आते-जाते लहरों से भी  कुछ सीखा इन दिनों में  कभी लगी वो सीधी -साधी  कभी लगी वो गुरूर वाली  ऐसे आती जैसे करती है राज जाती भी तो मर्ज़ी से अपनी  हम मुसाफिर होकर भी देख  ललचते उसकी आज़ादी पर  जब चाहे आती उमंग से  बड़ी लहरों में तो कभी छोटी  आते-जाते देती मौका सबको  रेत पर लिखने नाम अपनों का लिखते ही वो जान लेती    नाम लिखा किस ज़ालिम का :) ज़िन्दगी की किताब में फिर  एक और नया पन्ना जोड़ने का  दे जाती अवसर सबको लिखने  एक कहानी और जीवन का रखो न कोई मोह-माया  सादगी से जियो हमेशा  आये हो तो जाओगे भी कल  क्या लाये जो ले जाओगे संग  कौन काला -कौन गोरा  सब कुछ धरा रेह जायेगा  व...

क्यों मैं हूँ यहाँ? क्यों?

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आज यूँ ही बहुत देर तक सोचती रही  क्यों मैं हूँ यहाँ? क्यों? क्यों नहीं मैं हूँ वहां  जहां मैं जाना चाहूँ ! कितनी बेड़ियां हैं  पैरों पर कर्त्तव्य के  तो हाथ बंधे हैं  उत्तरदायित्व में  क्यों मैं हूँ यहाँ? क्यों? क्यों नहीं मैं हूँ वहां ! पूछते सभी हरदम  क्या करना चाहोगी  गर मिला जो मौका  सोचने से भी घबराऊँ  क्यूंकि दाना-पानी  खाना -पीना जीवन की कहानी  फिर दिल की रजामंदी  कैसे होगी पूरी  क्यों मैं हूँ यहाँ? क्यों? क्यों नहीं मैं हूँ वहां  जहाँ जरूरतों में  बाँटू प्यार -मोहब्बत  दूँ मैं औरों को हौसला  दो निवाला मैं भी खाऊँ  दो उनको भी दे सकूं  क्यों मैं हूँ यहाँ? क्यों? क्यों नहीं मैं हूँ वहां  ~ फ़िज़ा 

क्या रंग है अापका?

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मुझसे न देखा गया  उसका ढंग  उसका ये तरंग  सिर्फ काफी था उसका रंग ! अब सब साफ नज़र अाता था  सभी तोहमतें उसपर  सभी इल्ज़ाम उसपर  क्यूंकि उसका था ही ऐसा रंग  होश खो बैठा, करने लगा जंग   देखा जो लाल खून उसका भी  मेरा भी है तो एक जैसा ही रंग  क्या मिलेगा काटकर अंग  घूम हो जाएंगे इसमें  तंग कल जब ढूँढोगे मुल्कों  न मिलेगा कोई साथी-संग तब लगेगा सबकुछ बेरंग  तरसोगे लेके दिल की उमंग   क्या रंग है अापका? क्या ढंग है अापका?  जाने क्यूँ लगते हो  जाने-पहचाने  रिश्ते का  हैं तो सब अपने अम्मा के  लाए क्यूँ नही वो प्यार  जो लिया था मगर दिया नहीं  किसी और को ! कहां रखते हो इतनी नफरत  कहां लेके जाओगे  इतनी नफरत जो खत्म न हो  इस जहां में जब लोग ही खत्म हो जाएंगे ! ~ फ़िज़ा 

अक्षरों से खेलते-खेलते ...!

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अक्षरों से खेलते-खेलते  कब ये शब्द बन गए  पता ही न चला!  शब्दों की लड़ियों ने  जाने क्या नए मायने  सीखाए! मैं अक्षरों से खेलती रही  शब्द मेरे संग खेलते रहे  यूँ ही ! जाने क्या सोचकर  वो मुझ से दिल लगा बैठे  मैं भी यूँ ही ! अांखमिचोली में कब  एक-दूसरे के हो गए  पता ही नहीं ! किसी ने कहा पद  किसी ने कविता  जाने क्यूँ ? सोचते-सोचते शाम  ढल चुकी फिर न सोचा  जब चांद निकल अाया !! ~ फ़िज़ा 

एक दुखियारी बहुत बेचारी

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नारी के कई रूप हैं और एक ऐसा भी रूप है जिसे वो बखूबी निभाती है क्यूंकि नारी हमेशा अबला नहीं होती ! एक सत्य ये भी देखने मिलता है ! एक दुखियारी बहुत बेचारी  किसी काम की नहीं वो नारी  रहती हरदम तंग सुस्त व्यवहारी  हुकुम चलाये जैसे करे जमींदारी  पति कमाए वो उड़ाए रुपये भारी  ईंट -पत्थर से बने मकान को चाहे  आडंबर दुनिया की वो है राजकुमारी  उसके आगे करो तारीफें और किलकारी  उसे तुम लगोगे जान से भी प्यारी  वो खुश रहती हरदम है वो आडंबरी  रहना तुम दूर उससे वर्ना होगी बिमारी  तुम सोच न सको ऐसी दे वो गाली  एक दुखियारी बहुत बेचारी !!!! ~ फ़िज़ा 

हाय! कैसे कोई कहे ये है बरखा का खेल !!

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बारिशों का मौसम और वो मन की चंचलता  क्यों लगे मुझे जैसे पाठशाला की हो बुट्टी  या फिर दफ्तर से लेते हैं चलो छुट्ठी  सफर का एक माहौल सजाता है चित्तचोर  निकल पड़ो यूँही राह में दूर कहीं बहुत दूर  जहाँ न हम होने का हो ग़म, न तुम होने का  निकल पड़ो बरसात में भीगते हुए कुछ पल  संगीत को करने दो उसकी अठखेलियाँ  फिर तुम चाहे हो जाओ बावले दीवाने कहीं  भूल जाओ कोई है इस जहाँ में या उस जहाँ में  मदमस्त होकर मंद हो जाओ मूंदकर आँखें  प्रकृति के संग हो जाये वो संगम मोहब्बत का  आलिंगन हो ख्वाबों और हकीकत का  प्यार करो इस कदर के हर पत्ता हर कण कहे  मैं वारि जाऊँ बलिहारी जाऊँ इस दीवानेपन पर  जहाँ सिर्फ बारिश की बूँदें नज़र आये पर्दा बनके  बारिशों का मौसम और वो मन की चंचलता हाय! कैसे कोई कहे ये है बरखा का खेल !! ~ फ़िज़ा