Posts

रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का

Image
  मोहब्बत तो चाँद से बहुत पुराना है  बचपन से लेकर आज तक याराना है  तब देखने को तरसते मचलता था मन  नयी उमंग उठने लगीं थीं मन में उससे  पूरे चाँद-रात को ख़ुशी से मचलते थे   अम्मी से कहते तब पूर्णिमा की रात है  सेवइयां बनाने की यूँही ज़िद करते थे  मीठा खाने की या चाँद से मोहब्बत  जो भी हो दोनों के होने का आनंद लेते  मोहब्बत परिपक्वता की सीमा पर है  आजकल चांदनी की सेज़ में सोते हैं  वो भी रात-भर बैठकर सुला देता है  डर नहीं उसके जाने का अपना जो है  ऐसा लगता है वो हरसू मुझे निहारता है  मिलन की सेवइयां अब खुद बनाती हूँ  मोहब्बत का स्वाद मन ही मन सहलाती हूँ   उसकी आगोश में यूँही फ़िज़ा महकाती हूँ रिश्ता ही बन चूका है चाँद से ज़िन्दगी का   अब तो हरसू कविता आंखें चार रेहती हूँ ! ~ फ़िज़ा 

हताश मन

Image
  मन बहुत प्रताड़ित है कई दिनों से  हाथरस के हादसे की खबर ने जैसे  अंदर ही एक कबर खुदवा रखी ऐसे  उसमें न समा पाती है लाश भी ऐसे  जब उसके चिथड़े-चिथड़े हो गए हों  जानवर की परिभाषा से भी नहीं मेल  ऐसे भी इंसान रेहते हैं गाँव-शहर में  जहाँ स्त्री को केवल मांस का ढेर  समझने वाले कुछ उच्च जाती के  खूंखार हैवान जो मांस को नौचते  मगर नीच जात बताके न छूने का  झूठ भी बोलते कायर हैवान ये होते  इंसान आये दिन मर रहे हैं दुनिया में  हैवानों का बोल-बाला है आजकल  बेटी-बहिन -पत्नी और माँ कहाँ जायेंगे  जब हैवानों की बस्ती में आज़ाद घूमेंगे  इनसे भले तो जानवर जो शिकार करते  किन्तु अपनी जात से हिंसा नहीं करते  जितना अधिक ये सोचे हताश मन होये ! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी की सब से बड़ी पहेली है...!

Image
  ज़िन्दगी के धूप-छाँव तो आते-जाते हैं  यही सीखा और समझा ये  ज़िन्दगी है  वक्त का तकाज़ा या खेल ज़िन्दगी है  समय के साथ ज़िन्दगी थक जाती है  समय के साथ ज़िन्दगी साथ आती है मगर कुछ ज़िन्दगी इस साल लायी है  अंदाज़ और अंगड़ाइयों में जो नज़ारा है  अफ़सोस अधिक, अन्धकार ज्यादा है  समय के साथ ज़माने के बदलते तेवर हैं  छोटा गया बड़ा पीड़ित इसमें हेर-फेर है  ज़िन्दगी अब कोविड के हाथों चलती है  इसके लपेट में कौन आएगा कौन नहीं है  यही ज़िन्दगी की सब से बड़ी पहेली है  अब तो हर खबर जो सुनने में आये है  वो कोविड के नाम से एक षडयंत्र है  नियति का या समय का रचा खेल है ! फ़िज़ा 

कमरों से कमरों का सफर

Image
सेहर से शाम शाम से सेहर तक  ज़िन्दगी मानों एक बंद कमरे तक  कभी किवाड़ खोलकर झांकने तक  तो कभी शुष्क हवा साँसों में भरने तक  ज़िन्दगी मानों अपनी सीमा के सीमा तक  बहुत त्याग मांगती  रहती हैं जब तक  है क्या इस ज़िन्दगी का लक्ष्य अब तक  इसके मोल भी चुकाएं हो साथ जब तक  ये जीना भी कोई जीना सार्थक कब तक  खिलने की आरज़ू बिखरने का डर कब तक  एहसासों की लड़ियों में उलझा सा मन कब तक  आखिर नियति का ये खेल कोई खेले कब तक? तोड़ बेड़ियों को सीखा स्वतंत्र जीना अब तक  इस नये मोड़ के ज़ंजीरों में जकड कर कब तक  यूँहीं आखिर कमरों से कमरों का सफर कब तक? ~ फ़िज़ा  #हिंदीदिवस #१४सितम्बर१९४९   

रास्ते के दो किनारे

Image
  रास्ते के दो किनारे संग चलते मिल न पाते मगर साथ रेहते   मैं इन दोनों के बीच चलती  भीड़ में रहकर तनहा सा लगे  किसी अनदेखे खूंटी से जैसे  अपने आपको बंधा सा पाती  छूटने की कोशिश कभी करती  फिर ख़याल आता किस से? बहुत लम्बा है ये सफर मेरा  कब ख़त्म होगा कहाँ मिलेगी  ये राहें कहीं मिलेंगी भी कभी? थकान सा हो चला है अब तो  किसी तरुवर की छाया में अब  विश्राम ही का हो कोई उपाय   निश्चिन्त होकर निद्रा का सेवन  यही लालसा रेहा गयी है मन में  तब तक चलना है अभी और  जाने कहाँ उस तरुवर का पता    जिसके साये में निवारण शयन का ! ~ फ़िज़ा 

आज़ादी की मुबारकबाद !

Image
स्वतंत्रता के ७३ वर्षों के बावजूद मन अशांत है  क्यों लगता है के पहले से भी अधिक बंधी हैं विचारों से मन-मस्तिष्क से अभिप्राय से बंधे हैं  जब लड़े थे आज़ादी के लिए एक जुट होकर  हर किसी के लिए चाहते थे मिले आज़ादी  उन्हें न सही उनकी आनेवाली नस्ल को सही  एक इंसानियत का जस्बा था जो हमें दे गयी  स्वंत्रता अंग्रेज़ों से उनके अत्याचारों से मुक्ति  मगर फिर आपस में ही लड़ते रहे आजीवन  स्वार्थ और खोखली राजनीती और गुंडागर्दी  कैसे कहें स्वंतंत्रादिवस की शुभकामनाएं जब  आज भी हम आधीन हैं ईर्षा और नफरत के  देश रह गया पीछे मगर सब हैं जीतने आगे  धीरे-धीरे आनेवाला कल भी भूल जायेगा  आज़ादी का संघर्ष और मूल्य शहीदों का  एक ख्वाब तब था और एक अब भी है  चाहे पाक हो या हिंदुस्तान दोनों को है  आज़ादी की मुबारकबाद ! ~ फ़िज़ा 

सेहर होने का वादा...!

Image
शाम जो ढलते हुए ग़म की चादर ओढ़ती है  वहीं सेहर होने का वादा भी वोही करती है  आज ये दिन कई करीबियों को ले डूबा है  दुःख हुआ बहुत गुज़रते वक़्त का एहसास है  दिन अच्छा गुज़रे या बुरा साँझ सब ले जाती है  ख़ुशी-ग़म साथ हों हमेशा ये भी ज़रूरी नहीं है  सेहर क्या लाये कल नया जैसे आज हुआ है  एक पल दुआ तो अगले पल श्रद्धांजलि दी है  इस शाम के ढलते दुःख के एहसास ढलते हैं  राहत को विदा कर 'फ़िज़ा' दिल में संजोती हैं  ~ फ़िज़ा