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हमें विरानों में रेहने की आदत पड गई

कभी ऐसा हुआ है जब आप अकेले हों फिर भी ख्‍यालों का मेला लगा हो और कभी मेले में रेहकर भी अकेलापन मेहसूस किया हो? ऐसे ही एक पल को यहाँपेश करने की कोशिश.... तुम्‍हॆं ज़माने के साथ ही रेहना है हमें विरानों में रेहने की आदत पड गई तुम मिले तो केह दिया अलविदा विरानों को क्‍या पता था ज़रूरत है अब भी विरानों की हमें पहली बार मिले तो ख्‍वाबों की दुनिया से जुडाये रखा आज साथ हैं तो हकीकत से मुलाकात हुई सोचा था न करेंगे गलतियाँ अब की बार वही दुख है दोहरा रहे हैं ज़िदगी बार-बार पत्‍थरीले ज़मीन से हटकर चलना चाहा देखा कोई और ज़मीन ही नहीं हमारे आस-पास अब तो आदत सी पड गई है चलने की मख़मली से हो चला है परहेज़ पैरों को सँवारने चले थे हम ज़िंदगी अपनी आबाद हो चला कोई और हम वहीं के वहीं दस्‍तक देती है 'फिज़ा' विरानों को कमबख्‍़त, बेवफा हो चले हैं हमसे 'फिज़ा'

वक्‍त-वक्‍त की बात है

अक्‍सर,सुना जाता है -"घर की मुर्‍गी दाल बराबर" कुछ ऐसी बात को दरशाने की एक कोशिश मात्र... राय की मुँतजि़र... दूर हम कब थे जो पास आकर फासले बना गये प्‍यार की निशानी जो बन के कँवल खिला गये तुमने तो हमें ही भूला दिया उसके हँसने पर रोने, पर जो आ जाती हैं बेचेनियॉ कभी हमसे दूर रेहकर हुआ करतीं थीं ये मदहोशियॉ जब लिखी जातीं थीं कविता तो कभी शेर की पोथियॉ फासले को भरना ठीक समझा प्‍यार की निशानी से अनमोल मोती वो नैनन का अपनी ही माला में पिरोकर सँवर लेते हैं उनके लिये कभी जब याद आयेंगे तब पेहचान होगी हमारी फिर मुलाकातों का सिलसिला तो कभी चाहतों की फरमाइशें वक्‍त-वक्‍त की बात है हम भी थे नैनन का नगिना ~फिजा़

एक नया बीज़ बन के कोई अरमान

अक्‍सर इंसान ख्‍वाब देखता है किंतु उसे पूरा होते देखने में कई बार वो आडंबरी रस्‍मों में फँस जाता है क्‍योंकि वो भी आखिर इन्‍हीं गुँथियों में गुँथ जाता है बहुत दिनों बाद पेश है ....राय की मुंतजि़र दिल की धडकन आज फिर हूई है जवान के तरंगों का कारवाँ हुआ हैवान सुखी बँज़र ज़मीन पर आज फिर एक नया बीज़ बन के कोई अरमान आँखों से तो ले ही गया नींद दे गया हजा़रों सपने जवान कल जब कहा था छू कर के मेरा हाथ दिल भी और जान भी रेह गये हैरान इंतजा़र मे़ है 'फिजा़' ये दिल अब तो के कब रस्‍मों से हों रिश्‍ते बयान फिजा़

वो राहगिर जगह-जगह घूम आयेगा

कभी-कभी प्‍यार इंसान को उस ऊँचाई तक ले जाती है जब वो अपने दायरे को लाँघ कर आगे निकल जाती है फिर वो किसी एक की नहीं रेह जाती.... रोज़मरे की बातों से हटकर कुछ गुलाबी एहसासों को पिरोने की एकमात्र कोशिश है.... आप की राय की मुंतजि़र तुम्‍हारे प्‍यार के बरसात की एक बूँद समेट लिया है मैंने मेरे आँचल में आज एक बीज बनकर ही सही कल एक कँवल बन के खिलेगा अपनी खुशियों की दास्‍तान वो सुनायेगा सभी को दिलाकर एहसास हमारे प्‍यार का वो राहगिर जगह-जगह घूम आयेगा ~फिजा़

क्‍या ज़माना बदल गया?

बहुत दिनों बाद आज कुछ लिखने का अवसर प्राप्‍त हुआ ! कभी वक्‍त ने तो कभी हालात ने इसे मनसूब होने न दिया ः)वो यादें अक्‍सर अच्‍छी और मीठीं होती हैं, जो खुशियों से भरी हुईं रही हों और तभी तो इंसान यादों को आज भी सँजोये रखता है ! कुछ आज की तो कुछ बचपन की यादों में छिपे फर्क को मेहसूस किया है आप की राय की मुंतजिर..... जाने वो कैसे लोग थे कैसा ज़माना था वो जब लोग होली-ईद-दिवाली सब मिलकर मनाते थे कौन कहाँ से आया किसने देखा, खुशियों का एक मेला जैसा लगता था तब मौसम भी सुहाना था वक्‍त जैसे पडा रेहता बिना किसी काम के जिसे चाहे वो उसे उठा लेता और समा जाता उसमें आज कितना बदल सा गया है सब कुछ कितना मुश्‍किल सा न वक्‍त कहीं नज़र आता है न मौसम पुराना सा होली-ईद-दिवाली तो दूर जन्‍मदिन भी नहीं मनाया जाता कौन कहाँ वक्‍त निकाले इन झमेलों में आज हर कोई पूछता है दोस्‍ती का हाथ बढाता है सिर्फ कमाई-साधन के लिए किस दोस्‍ती का फल व्‍यापार बने आज न वक्‍त है न वो लोग जिन्‍हें कभी सादगी पसंद न ही खुशियाँ फिर भी निकल पडे हैं ढुँढने अपने वज़ूद को पैसों की आड में खुशकिस्‍मती बनाने में मैं सोचती रेहती हूँ क्‍या ज़माना...

ज़िंदगी तेरे तो खेल निराले हैं

ये कविता मैंने तब लिखी थी जब लेबन्‌न में लडाई छिङ गई थी । जहॉ बच्‍चों की लाशें गिर रही थीं...और इस तरफ एक मासूम बच्‍चा अपने पापा की ऊँगलियाँ पकड कर पारकींग लॉट पर चला जा रहा था.... ज़िंदगी तुझ से कोई शिकायत नहीं क्‍योंकि, तुने वो सब दिया जो कभी मैंने माँगा नहीं और जो कभी मैंने चाहा भी नहीं कितना इंसाफ है तेरी जूस्‍तज़ू में जो कभी अपना तो क्‍या पराया भी नहीं जताता मैं सोच में रेहती हूँ ज़िंदगी तू मेरा अपना है या पराया? तू तो हवा का झोंका है जो कभी ठंडी हवा से दिल मचला दे तो कभी तूफान बनकर खडा हो जाऐ। ज़िंदगी तेरे तो खेल निराले हैं तुझे मैं क्‍या कहूँ - आ देखें तेरी अगली चाल क्‍या है ।?। ~फ़िज़ा

आज भी लकडियाँ बँटोरता हूँ...

आज के युग में जो भी हो रहा है....उन सभी को मद्‍दे नज़र रखते हुए येही कुछ लिख बन पाया हमसे...आप सभी के इसिलाह की मुंतजि़र..... लकडियॉ बिन ने आया था किसी रोज़ काले बादलों का कॉरवॉ आता देख छोड गया इन्‍हें ये सोच.. कल फिर आॐगा ! आज नया दिन है..पहाडों की परछाई के पीछे से किरण झॉक रही थी और शुश्‍क हवा अँगिठी के पास बैठने का बहाना दे रही थी ! याद आया, आज फिर लकडियॉ बिननी है सुना है इस बार जा़डे की सरदी कुछ लम्‍बी है लकडियों पर ओस की मोतियॉ मानों लडी बनाकर बैठीं हों ! मैंने एक नहीं मानी-गिली ही सही उठा लाया उन्‍हें जलाने के वास्‍ते... सुबह उठा तो देखा लकडियों पर हरी-हरी पत्‍तियों की कोपलें निकल आईं हैं मानो मरे हुये में जान आ गई ! फिर दिल न माना कुछ और सोचने निकाल फेंका बगीचे में, के फूलो-फलो तुम भी बगीया के किसी कोने में बन जाओ एक इसी गुलिस्‍तॉ में ! फिर सोचने लगा मैं -उस दिन बादलों को देख...गर मैं खाली हाथ न चला आता तो शायद ये राख का ढेर बनी रेहतीं मैं कुछ और गरम आँच सेख लेता....लेकिन फिर सोचा - जीवन-दान की जो आँच में सुकून है वो किसी आग की आँच में कहॉ? आज भी लकडियाँ बँटोरता हूँ... लेकिन देख...